हज

‘हज्ज’ का अर्थ हैं तीर्थ-दर्शन करना। ‘हज्ज’ एक ‘इबादत’ हैं, जिस में मनुष्य अल्लाह के घर अर्थात कअब: के दर्शन करने की इच्छा से मक्का जाता हैं। ‘हज्ज-ए-बैत-उल्लाह’ र्इश्वर के प्रति अपार श्रद्धा, प्रेम, बंदगी और र्इश-प्रशंसा का द्योतक हैं। कअब: अल्लाह की इबादत का केन्द्र और शांति का स्थान हैं।1 परिस्थिति, अर्थ और स्वास्थ्य की दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति पर हज्ज फर्ज है।2 कुरआन में हज्ज के महत्व की व्यापक चर्चा की गर्इ हैं।3 कअब: दर्शन से अल्लाह के स्मरण के साथ बहुत सी विस्मृत घटनाएं जीवन के साथ पुन: जुड़ जाती हैं। यह अल्लाह की बहुमूल्य देन, धरोहर और निशानी-तौहीद और रसूलों के जिहाद और सब्र-का द्योतक हैं। हज्ज इस्लामी राष्ट्रीयता की विजय का प्रतीक हैं जहां सारे भेद मिटकर केवल एकता शेष रहती हैं। यहां पहुच कर समस्त इस्लामी जातियां अपनी जातीय और राष्ट्रीय वेशभूषा को जो उनकी विशेष पहचान हैं, जिससे जातिगत विषमता उत्पन्न होती हैं त्याग कर एक सा लिबास घारण करती हैं जिसे ‘अहराम’ कहा जाता हैं सब मिलकर बड़ी नम्रता और विनय के साथ भाषा मे एक भाषा मे एक नारा लगाते हैं-
‘अल्लाहुम्मा लब्बैक-लब्बैक ला शरीक लका लब्बैक-इन्नल हम्द वन्नेमता लका वल मुल्क ला शरीक लका।’
(हाजिर हूं, ऐ अल्लाह! मै तेरे हुजूर हू, तेरा कोर्इशरीक नहीं। मै तेरे हुजूर हाजिर हू, निश्चय ही प्रशंसा तेरे ही लिए हैं। सारे उपकार तेरे ही हैं। बादशाही सर्वथा तेरी हैं। तेरा कोर्इ शरीक नही।)

अस्तु, उक्त पांच धार्मिक अनुष्ठानों पर इस्लाम की बुनियाद निर्भर हैं। इसके व्यक्ति अंतजंगत और बहिजंगत दोनो मे सन्तुलन स्थापित करने की अपूर्व क्षमता उत्पन्न कर लेता हैं।

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और याद करो जब कि हमने इस पर (काबा) को लोगो के लिये केन्द्र और शांति स्थल बनाया और हुक्म दिया कि इब्राहीम के वासस्थान को ‘नमाज’ की एक जगह बनाओं। इब्राहीम और इस्मार्इल को जिम्मेदार बनाया कि मेरे घर का ‘तवाफ’ (परिक्रमा) और ‘एतकाफ’ और रूकूअ ‘सजदा’ करने वालों के लिए पाक रखो।
            -2 : सूर-ए-अल-बकरा : 125।

2.’निस्संदेह पहला घर जो लोगो के लिए बनाया गया वही हैं जो मक्का में हैं, सारे संसार के लिये बरकत और मार्ग दर्शन का केन्द्र हैं। वहां स्पष्ट निशानयां हैं, इब्राहीम का वासस्थान हैं, जिसने उसमें प्रवेश किया वह सुरक्षित हो गया और लोगो पर अल्लाह का हक हैं कि जो वहां तक वहुंचने की सामथ्र्य रखते हैं उस घर का हज्ज करें और जिसने कुफ्र किया तो अल्लाह सारे संसार से बे-परवाह हैं। -3 : सूर-ए-आले इमरान : 96, 97।

3. और लोगो को हज्ज्ा के लिए पुकार दो कि वे प्रत्येक गहरे मार्गो से पैदल और हल्के शरीर की (छरहरी) उटनियों पर तेरे पास आएं, ताकि वे अपने फायदों को देखे (जो यहां उनके लिये रखे गये हैं) और कुछ मालूम (निश्चित) दिनों मे उन मवेशी-चौपायों पर अल्लाह का नाम ले जो उसने उन्हें दिये हैं। फिर उस मे से स्वंय खाओ और तंगहाल मोहताज को भी खिलाओं। फिर अपना मैल-कुचैल दूर करें। अपनी मन्नतों को पूरा करें और इस पुरातन घर (काबा) का ‘तवाफ’ (परिक्रमा) करें।    -22 : सूर-ए-अल-हज्ज् : 27, 28, 29।

Author Name: इस्लाम एक अध्ययन:डॉ जमील आली जाफरी