विद्वानों की नजर में इस्लाम

महात्मा गाँधी

महात्मा गाँधी
इस्लाम, जो हजरत मुहम्मद द्वारा पेश किया गया,पिछले तमाम उद्घाटित धर्मो का अविच्छिन्न तत्व और उन सबका उत्कर्ष बिन्दु हैं, इसलिए इसे हर युग के लोगो के लिए सर्वथा उचित धर्म समझा जा सकता हैं। इस्लाम के इस महत्व की पुष्टि के लिए कुछ तथ्य नीचे दिए जा रहे हैं।

एक यह कि अब कोई आसमानी किताब ऐसी नही हैं जो अपने मूलरूप में मौजूद हो ।..
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न्याय बोध इस्लाम का सबसे ज्यादा आश्चर्य में डाल देनेवाला आदर्श हैं

न्याय बोध इस्लाम का सबसे ज्यादा आश्चर्य में डाल देनेवाला आदर्श हैं
न्याय बोध इस्लाम का सबसे ज्यादा आश्चर्य में डाल देनेवाला आदर्श हैं, इसलिए कि मैंने कुरआन पढ़ा तो मैने पाया कि इस्लाम ने जीवन के कुछ तथ्यपरक सिद्धांत दिए हैं, जो काल्पनिक नही, बल्कि व्यावहारिक हैं और पूरे जीवन के लिए दैनिक कार्यक्रम निश्चिंत करते हैं। ये सिद्धांत पूरी दुनिया -वालों के लिए हैं, न कि किसी विशेष क्षेत्र और देश के लिए ।
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प्रोफ़ेसर के॰ एस॰ रामाकृष्णा राव

‘‘पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) की शिक्षाओं का ही यह व्यावहारिक गुण है, जिसने वैज्ञानिक प्रवृत्ति को जन्म दिया। इन्हीं शिक्षाओं ने नित्य के काम-काज और उन कामों को भी जो सांसारिक काम कहलाते हैं आदर और पवित्राता प्रदान की। क़ुरआन कहता है कि इन्सान को ख़ुदा की इबादत के लिए पैदा किया गया है, लेकिन ‘इबादत’ (पूजा) की उसकी अपनी अलग परिभाषा है। ख़ुदा की इबादत केवल पूजा-पाठ आदि तक सीमित नहीं, बल्कि हर वह कार्य जो अल्लाह के आदेशानुसार उसकी प्रसन्नता प्राप्त करने तथा मानव-जाति की भलाई के लिए किया जाए इबादत के...
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मुंशी प्रेमचंद

‘‘ इस्लाम की बुनियाद न्याय पर रखी गई है। वहाँ राजा और रंक, अमीर और ग़रीब, बादशाह और फ़क़ीर के लिए ‘केवल एक’ न्याय है। किसी के साथ रियायत नहीं किसी का पक्षपात नहीं। ऐसी सैकड़ों रिवायतें पेश की जा सकती है जहाँ बेकसों ने बड़े-बड़े बलशाली आधिकारियों के मुक़ाबले में न्याय के बल से विजय पाई है। ऐसी मिसालों की भी कमी नहीं जहाँ बादशाहों ने अपने राजकुमार, अपनी बेगम, यहाँ तक कि स्वयं अपने तक को न्याय की वेदी पर होम कर दिया है। संसार की किसी सभ्य से सभ्य जाति की न्याय-नीति की, इस्लामी न्याय-नीति से तुलना कीजिए...
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डॉ॰ बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर

इस्लाम धर्म सम्पूर्ण एवं सार्वभौमिक धर्म है जो कि अपने सभी अनुयायियों से समानता का व्यवहार करता है (अर्थात् उनको समान समझता है)। यही कारण है कि सात करोड़ अछूत हिन्दू धर्म को छोड़ने के लिए सोच रहे हैं और यही कारण था कि गाँधी जी के पुत्र (हरिलाल) ने भी इस्लाम धर्म ग्रहण किया था। यह तलवार नहीं थी....
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पेरियार ई॰ वी॰ रामास्वामी

‘‘...हमारा शूद्र होना एक भयंकर रोग है, यह कैंसर जैसा है। यह अत्यंत पुरानी शिकायत है। इसकी केवल एक ही दवा है, और वह है इस्लाम। इसकी कोई दूसरी दवा नहीं है। अन्यथा हम इसे झेलेंगे, इसे भूलने के लिए नींद की गोलियाँ लेंगे या इसे दबा कर एक बदबूदार लाश की तरह ढोते रहेंगे। इस रोग को दूर करने के लिए उठ खड़े हों और इन्सानों की तरह सम्मानपूर्वक आगे बढ़ें कि केवल इस्लाम ही एक रास्ता है...।’’
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