कुरआन और ज्ञान-विज्ञान

कुछ लोगो का ख्याल है कि धर्म ज्ञान एक जगह नही हो सकते, उनके विचारों मे क्योकि धर्म की रूप-रेखा अंधविश्वास पर आधारित हैं, जहां ज्ञान की रौशनी पहुंच कर हलचल मचा देती हैं। इसलिए धार्मिक पुरूषों ने लोगो के ज्ञान प्राप्त करने पर रोक लगा रखी हैं। यही वजह थी कि जब यूरोप मे ज्ञान रौशनी फैली तो पोप व्याकुल हो उठे और जिन्होने र्इसार्इ मत को बचाने के लिए विद्धानों की कड़ी आलोचना शुरू कर दी, यहां तक कि सैकड़ो वैज्ञानिक फांसी के तख्ते पर लटका दिए गए और उनकी मेहनत के फल को आग में डाल दिया गया, जिसके नतीजे मे ऐसे विचार फैलने लगे कि धर्म और ज्ञान कभी भी एक स्थान पर जमा नही हो सकते और आज फिर इसी विचार को पूरी शक्ति के साथ लोगो मे फैलाया जा रहा हैं।


वैसे हम धार्मिक इतिहास का अध्ययन करते हैं तो पता चलता हैं कि बहुत सारे धर्मो की स्थापना अंधविश्वास पर हुर्इ हैं और धर्म की व्याख्या ख्याली बातों से की गर्इ हैं। इन्हें जब ज्ञान की कसौटी पर रखकर परखा जाता हैं तो दोनो मे बड़ा अन्तर दिखार्इ पड़ता हैं। इसलिए कि आज के ज्ञानी लोग देवी-देवताओं की काल्पनिक कहानियां पर यकीन नहीं रखते। इतिहास के ख्याली सूरमाओं पर से उनका विश्वास उठता जा रहा हैं। धर्म के रस्मों रिवाज में उनको कोर्इ कशिश नही दिखार्इ देती और जब वे पूजा-पाठ से बेजार दिखार्इ देते हैं। उनकी इस हालत ने उनको र्इश्वर का बागी बना दिया हैं
बीसवी शताब्दी मे यह वह स्थान और समय की हद पार कर अपने ज्ञान की रौशनी मे ही अपने भविष्य को प्रत्यक्ष देखना चाहता हैं। अब वह धरती पर रहते हुए आकाश की सैर कर रहा हैं। अब उसका पांव चांद के सौंन्दर्य को भी रौंदने लगा हैं। शायद इसी लिए आज के वैज्ञानिक युग में भी कुछ लोग धर्म को केवल कुछ अंधविश्वासों का पुलिन्दा समझने पर तुले हुए हैं, जिसके कारण धर्म का एक गलत रूप लोगो के सामने आने लगा हैं।

इस समय मैं दूसरे धर्मो से हट कर केवल इस्लाम की उन शिक्षाओं को आपके सामने पेश करना चाहता हूॅं जिनमें ज्ञान प्राप्त करने पर पूरा-पूरा जोर दिया गया हैं और ज्ञान रहित विश्वास को कोर्इ महत्व नही दिया गया है।

इसको पढ़ते हुए आप आज से चौदह सौ साल पहले का माहौल अपने सामने रखें तो आपको अच्छी तरह मालूम हो जाएगा कि इस्लाम की शिक्षा कितनी वैज्ञानिक और सत्यता पर आधारित हैं कि उसने ऐसे समय मे भी ज्ञान प्राप्त करने की शिक्षा दी जब ज्ञान नाम की कोर्इ चीज नही थी। जीवन या तो खाने-पीने का नाम था या फिर कुछ बुतों के प्रति अंधविश्वास प्रकट करने का।
कुरआन की सबसे पहली आयत जो र्इश्वर के पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) पर अवतरित हुर्इ वह यह थी:

‘‘पढ़ अपने पालनहार का नाम लेकर, जिसने पैदा किया। पैदा किया इंसान को एक लोथड़े से। पढ़ और तेरा पालनहार बड़ा ही उदार है, जिसने ज्ञान सिखाया, कलम के द्वारा, ज्ञान दिया इंसान को उस चीज का जिसको वह नहीं जानता था।’’ (कुराअन 96 :1-5)

इन आयतों पर विचार करने से स्पष्ट होता हैं कि इस्लाम शिक्षा पर कितना बल देता है जिसकी पहली प्रकार ही ज्ञान प्राप्त करने से संबंध रखती हैं और सही बात तो यह हें कि जिस धर्म का आरम्भ ही शिक्षा और ज्ञान से हो उसका भविष्य कितना अधिक ज्ञान पूर्ण होगा।

टागे के पृष्ठों मे हम साबित करेंगे कि कुरआन कितना वैज्ञानिक ग्रंथ हैं जिसमे ज्ञान का एक ऐसा भण्डार हैं कि उस पर जितना भी विचार किया जाए, कम हैं।

शिक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा
                कुरआन कहता हैं :
        ‘‘ऐसा क्यों न हुआ कि उनके हर गिरोह मे से एक टोली निकलती ताकि वे धर्म मे समझ पैदा करते और वे अपने लोगो को होशियार करते, जब कि वे उनकी ओर पलटते। इस तरह शायद वे बुरे कामो से बच जाते।’’(कुरआन, 9 : 122)
 
कुरआन की यह एक आयत उन सब अरोपो को झुठलाने के लिए काफी हैं, जिनके अनुसार इस्लाम  ज्ञान और विज्ञान के खिलाफ हैं। अगर ऐसी बात होती तो कुरआन इस तरह पुकार कर आवाज न लगाता कि ऐ लोगो! अपने घरों से शिक्षा प्राप्त करने के लिए निकलों, ताकि संसार को सत्य-असत्य धर्म-अधर्म और अच्छे-बुरे कर्मो से सचेत कर सको।

आज सारा संसार जुल्म की आग मे झुलस रहा हैं, जबकि इंसान धरती पर रहते हुए आकाश का स्पप्न देखने लगा हैं। मगर जिस सुख-चैन के लिए उसने अपनी पूंजी खर्च कर डाली है वह उसको अब तक प्राप्त नहीं हुआ। इसलिए कि वह अपने सत्य-मार्ग तोड़कर किसी और रास्ते पर चल पड़ा है। उसकी शिक्षा का मकसद था कि संसार की सही रहनुमार्इ और मार्ग-दर्शन करे, परन्तु आज वह एटम बम बनाकर उसको गलत जगह इस्तेमाल कर रही हैं और अपनी ताकत को इंसानों की भलार्इ के बजाए उसे नष्ट-विनष्ट करने मे लगा हुआ हैं। अगर शिक्षा इसी का नाम हैं तो वास्तव में इस्लाम इसके खिलाफ हैं, मगर वह शिक्षा जो इंसान को इंसान बनाने के लिए प्राप्त की जाए इस्लाम उसके खिलाफ कभी नही रहा हैं और न रहेगा।

आपको ताज्जुब होगा कि कुरआन अपने नबी को सम्बोधित करके कहता हैं:

‘‘हे (मुहम्मद) जान लो कि अल्लाह के अलावा और कोर्इ इबादत के लायक नही।’’ (कुरआन, 47 : 19)
इसमें इस बात की तरफ इशारा हैं कि र्इश्वर की प्रार्थना और इबादत उस समय तक सही नही होगी जब तक पुजारी को यह न मालूम हो जाए कि उपासना के लायक तो केवल र्इश्वर हैं। दूसरें शब्दों में यह कह सकते हैं कि उपासक को चाहिए कि उपासना करने से पहले अच्छी तरह ज्ञान प्राप्त कर लें अगर ऐसा नही, किया तो उसकी उपासना कोर्इ महत्व नही रखती।

इसमें उन लोगो के लिए चेतावनी हैं जो धर्म को केवल अंधविश्वासो का योग समझते हैं और उसकी वास्तविकता से अच्छी तरह परिचित होने की चेष्टा नही करते। हो सकता हैं कि उनका यह दृष्टिकोण दूसरे धर्मो के बारे में सत्य हो परन्तु इस्लाम इसके बिलकुल विपरीत हैं।

मैं अपनी इस बात को कुछ और स्पष्ट करने के लिए यहां हजरत मुहम्मद (सल्ल0) की कुछ पवित्र शिक्षाएं नकल कर रहा हूं ताकि इस्लाम मे शिक्षा के महत्व को भली-भॉति समझा जा सके।
कैस बिन कसीर कहते हैं कि एक बार मै हजरत अबू दरदा के साथ दमिश्क की मस्जिद मे बैठा था कि इतने में एक आदमी आया और कहने लगा, ऐ अबू दरदा! मैं मदीनें से आपके पास इसलिए आया हूॅ कि मुझे खबर मिली है कि आप मुहम्मद (सल्ल0) की हदीस बयान करते हैं।

अबू दरदा ने फरमाया, मैने अल्लाह के रसूल (सल्ल0) से सुना हैं, आप फरमाते थे:

‘‘जो व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करने के लिए रास्ता तय करके आगे बढ़ता हैं।
उसके रास्ते मे फरिश्ते पर (पंख) बिछाते हैं और र्इश्वर उसके रास्ते को आसान कर देता हैं।’’         (हदीस : अबू दाउद तथा तिर्मिजी)

हजरत अनस (रजि0) बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्ल0) फरमाया :

‘‘ जो व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करने के लिए निकलता हैं वह अल्लाह के रास्ते में हैं, यहॉ तक कि वापस आ जाए।’’ (हदीस: तिर्मिजी)

अब्दुल्लाह बिन अब्बास बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्ल0) ने फरमाया :

‘‘जिसके साथ र्इश्वर भलार्इ करना चाहता हैं उसको धर्म में सूझबूझ प्रदान कर देता हैं। ‘‘ (हदीस :तिर्मिजी)
अबू दरदा कहते है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल0) का उपदेश है कि :
‘‘शिक्षित व्यक्ति की विशेषता सारे सितारों पर। और शिक्षित लोग नबियों के वारिस हैं और नबी दीनार तथा दिरहम नहीं छोड़कर जाते बल्कि वे शिक्षा और ज्ञान छोड़ते हैं, इसलिए हैं, जिसने शिक्षा ग्रहण की उसने बहुत बड़ा भाग्य प्राप्त किया।’’ (हदीस:तिर्मिजी)

अबू हुर्ररह कहते है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल0) ने फरमाया:

‘‘ज्ञान की बात मोमिन की खोर्इ हुर्इ सम्पत्ति है। इसलिए वह उसको जहां भी पाए उसका वही हकदार हैं’’ (हदीस : तिर्मिजी)

ये तो कुछ वे हदीसें हुर्इ जो शिक्षा प्राप्त करने पर उभारती हैं। अब आइए आपको कुछ ऐसी हदीसे भी सुनाउ जो ज्ञान छिपाने और उसको दूसरों तक न पहुंचाने पर कहीं अलोचना करती हैं। इस प्रकार आपको मालूम हो जाएगा कि इस्लाम शिक्षा प्राप्त करने पर पर किस तरह उभराता हैं और दूसरे शब्दों मे इस्लामी कितना वैज्ञानिक धर्म हैं।



ज्ञान छिपानेवालों की कड़ी आलोचना
                    शिक्षा की इसी विशेषता के कारण कुरआन उन लोगो की कड़ी आलोचना करता है जो ज्ञान रखते हुए भी उसको दूसरों से छिपाते हैं और उसको समाज मे फैलाने की कोशिश नही करते ताकि और लोग उससे लाभ उठा सकें, इससे यह बात भली-भॉति स्पष्ट हो जाती हैं कि इस्लाम मे शिक्षा का कितना महत्व हैं।
आइए आपके सामने कुरआन की कुछ ऐसी आयतों का अर्थ स्पष्ट कर दूॅ जो ज्ञान छिपानेवालों की कड़ी आलोचना करती हैं।
‘‘और उससे बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जिसके पास र्इश्वर की ओर से गवाही हो और वह उसे छिपाए।’’   (कुरआन, 2:140)

गवाही का अर्थ उलमा यह लेते हैं कि यहुदियों और र्इसार्इयों की किताबों में मुहम्मद (सल्ल0) के आने की खबर दी गर्इ थी, परन्तु उन्होने उसको छिपा दिया और नबी (सल्ल0) ने अपने नबी होने का दावा किया तो उन्होने उनको ठुकरा दिया।

यह अर्थ अपने स्थान पर सही है मगर आप इसको और भी विस्तृत कीजिए और उसमें हर उस गवाही को शामिल कर लीजिए जो अल्लाह ने आपको सौंपी हैं, चाहे वह शिक्षा हो या किसी विशेष वस्तु का ज्ञान जो मानव-समाज के लिए लाभदायक हो।
‘‘ सत्य को असत्य से गड-मड न करो और जानते-बूझते सत्य को न छिपाओं।’’(कुरआन, 2 : 42)
‘‘रसूल पर पहुचा देने के अलावा और कोर्इ जिम्मेदारी नही, और अल्लाह सब जानता है जो कुछ तुम खुले करते हो और जो छिपाते हो।(कुरआन 5 : 99)


‘‘और याद करो जब अल्लाह ने उन लोगो से, जिन्हे किताब दी गर्इ थी, यह पक्का वादा लिया कि तुम इस किताब को लोगो के सामने भली-भांति स्पष्ट करोगे और छिपाओगे नही तो उन्होने उसे पीठ पीछे डाल दिया और थोड़े और मूल्य पर उसका सौदा किया तो क्या ही बुरा सौदा हैं जो ये करते है।        (कुरआन, 3 : 187)

इन आयतों ये यह बात अच्छी तरह स्पष्ट हो जाती हैं कि पिछली जातियां ने अल्लाह की ओर से दी गर्इ किताब को लोगो से छिपाए रखा और उसको भली-भांति उन तक नही पहुचाया और यह एक प्रकार का बहुत बड़ा अत्याचार है क्योकि यह किताब ज्ञान का भण्डार थी उसको छिपानेवाला बहुत बड़ा अत्याचारी और धर्म-विरोधी व्यक्ति हैं।

कुरआन में हैं :

‘‘निस्संदेह जो लोग हमारी उतारी हुर्इ खुली-खुली निशानियां और मार्गदर्शन को छिपाते हैं, जब कि हम उसे लोगो की रहनुमार्इ के लिए अपनी किताब मे खोलकर बयान कर चुके हैं, वही है। जिन पर अल्लाह की फटकार पड़ती हैं और फटकारने वाले जिन्हें फटकारते हैं। (कुरआन, 2 : 159)

‘‘निस्सन्देह जो लोग उस चीज को छिपाते हैं जो अल्लाह ने अपनी किताब मे उतारी हैं, और उसके बदले थोड़ा मूल्य प्राप्त करते हैं, वे अपने पेट मे आग के सिवा किसी और चीज का नही भर रहे हैं और कियामत के दिन न तो अल्लाह उनसे बात करेगा और न उन्हें पाक करेगा। उनके लिए दुखदायिनी यातना है।’’ (कुरआन, 2:174)

ये वे कुछ आयते हैं जो ज्ञान छिपानेवालों पर कड़ी आलोचना करती हैं इनसे भली प्रकार स्पष्ट हो जाता हैं कि इस्लाम मे शिक्षा का कितना महत्व है। अब आइए अल्लाह के रसूल (सल्ल0) के कथनों की रौशनी मे इस बात को और स्पष्ट करूं।

अब हुरैरह (रजि0) से उल्लिखित है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल0) ने फरमाया :

‘‘जिससे कोर्इ ज्ञान की बात पूछी गर्इ हो और वह उसको जानता हो, मगर उसने उसे छिपा दिया, उसे प्रलय के दिन आग की लगाम लगार्इ जाएगी।’’ (हदीस : तिर्मिजी तथा अबू दाउद)
इस हदीस मे उन लोगो की कड़ी आलोचना है जो ज्ञान रखते हुए भी उसको लोगो तक नहीं पहुंचाते जिसके कारण वह ज्ञान रखते हुए भी उसको लोगो तक नही पहुचसते जिसके कारण वह ज्ञान कुछ लोगो तक ही रूक जाता हैं। और उसका लाभ दूसरों को नही पहुंचता, क्योकि दूसरों तक ज्ञान पहुंचाने मे उसकी बढोत्तरी हैं और अपने तक रख लेना उसके लिए नुकसान हैं। यह भी हो सकताहैं कि ज्ञान जिसे दूसरे तक पहुंचाया गया हैं, वह उससे अधिक समझ रखनेवाला हो और उसके द्वारा अधिक फायदा उठाए जैसा कि एक दूसरी हदीस मे आया है :

अब्दुल्लाह बिन मसउद (रजि0) का कहना है कि मैने अल्लाह के रसूल (सल्ल0) को यह कहते हुए सुना :

‘‘अल्लाह उस बन्दे को खुश रखे जिसने मेरी बात सुनी, उसे याद रखा और ठीक रूप् मे लोगो तक पहुचाया, क्योकि प्राय: ऐसा होता हैं कि समझ और विवेक की बात का पहुॅचानेवाला स्वयं समझदार नही होता और ऐसा भी होता हैं कि समझ और विवेक की बात का पहुॅचानेवाला ऐसे व्यक्ति तक पहुॅचा देता हैं जो कि उससे कहीं ज्यादा विवेकशील होता हैं।’’(हदीस : तिर्मिजी, अबू दाउद)

ठस हदीस से जिस बात की ओर इशारा किया गया हैं वह यह हैं कि ज्ञानवालों को ज्ञान छिपाना नही चाहिए। इसकी वजह से पूरे समाज का नुकसान होता हैं, क्योकि ज्ञान धारक प्राय: अपने ज्ञान का लाभ नही समझता। इसलिए अगर वह दूसरों तक वह ज्ञान पहुॅचा देता हैं तो दूसरे उससे इच्छानुसार लाभ उठा सकते हैं, क्योकि र्इश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति मे यह सलाहियत नही रखी हैं कि अच्छी बातों को समाज मे लागू कर सके।

इसलिए इस हदीस मे एक प्रकार से उन लोगो की आलोचना हैं जो ज्ञान को दूसरों तक नही पहुॅचाते।

हॉ इतनी बात जरूर याद रखनी चाहिए कि ज्ञान पहुॅचाते हुए उस व्यक्ति को भी अच्छी तरह देख लेना चाहिए, जिसको शिक्षा दी जा रही हैं कि कहीं वह उस शिक्षा के कारण फितने मे न पड़ जाए जैसा कि एक हदीस मे आया हैं :

अब्दुल्लाह बिन मसउद से उल्लिखित है कि उन्होने कहा :
‘‘लोगो को हदीस सुनाते समयउनकी समझ-बूझ का ख्याल रखों। कहीं
ऐसा न हो तुम उनको ऐसी बाते बता दो जो उनकी समझ से उची हो और उनके कारण एक प्रकार का फितना पैदा हो जाए।’’ (हदीस : मुस्लिम)

यद्यपि यह नबी (सल्ल0) की हदीस नही हैं, परन्तु इससे यह बात भली प्रकार स्पष्ट होती हैं कि हदीस बयान करते समय लोगो की समझ-बूझ का सदैव ख्याल जान चाहिए।
यह बाते हमारे समाज के लिए कितनी वैज्ञानिक हैं कि आज संसार में जो हंगामा और शोर मचा हुआ हैं उसका एक कारण यह भी हैं कि हमारे नेता भाषण करते समय यह भूल जाते हैं कि उनकी बातों से समाज पर क्या बुरा असर पड़ेगा।

इस बारे मे इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि आप जरा कुरआन पर एक नजर डालकर देंखं। इसमें बहुमूल्य हीरे आपको मिलेंगे, जिसका अगर विस्तारपपूर्वक वर्णन किया जाए तो संसार के सारे कागज और रोशनार्इ समाप्त हो जाएॅ फिर भी उनकी तह तक मनुष्य नही पहुॅच सकता। इसी ओर कुरआन संकेत करता हें।
‘‘धरती मे जितने वृक्ष हैं, यदि वे कलम हो जाएं और यह समुद्र उसकी स्याही हो जाए उसके बाद सात और समुद्र हो तब भी अल्लाह के बोल समाप्त न हो सकेंगे। निश्चय ही अल्लाह प्रभुत्वशाली और तत्वदश्र्ाी हैं।’’ (कुरआन, 31 : 27)

Author Name: कुरआन की शीतल छाया :डॉ0 मुहम्मद जियाउर्रहमान आजमी(एम.ए.एच.डी.)