दया की शिक्षा

‘‘दया करनेवालों पर महादयावान (र्इश्वर) दया करता हैं। तुम धरतीवालों पर दया करो, तुम पर आकाशवाला दया करेग। (मिशकात)

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘तुम जब एक-दूसरे पर दया न करो कदापि मुसलमान नही हो सकते।’’ लोगो ने कहा- ‘‘ऐ अल्लाह के पैगम्बर! हम सभी दया करनेवाले हैं।’’ आपने फरमाया- ‘‘तुममे से किसी व्यक्ति का केवल अपनों के साथ दया करना पर्याप्त नही हैं, बल्कि तुम्हारी दया सर्वसाधारण के लिए होनी चाहिए।’’        (तबरानी)


4 नम्रता की शिक्षा
            पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘ अल्लाह नम्र स्वभाव का हैं और वह नम्रता को प्रिय रखता है, और वह नम्रता पर जो फल देता हैं वह न कठोरता पर देता हैं और न नम्रता के सिवा किसी अन्य चीज पर।’’                (बुखारी)

‘‘ जो व्यक्ति नम्रता ग्रहण करने से वंचित रहा, वह तमाम भलार्इयों से वंचित हो गया।’’        (मुसलिम)

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘जिस व्यक्ति मे तीन बातें होगी उस पर अल्लाह (अपनी कृपा का) हाथ रखेगा और उसको स्वर्ग मे दाखिल करेगा। निर्बलों पर नरमी करना, मां-बाप से प्रेमपूर्ण व्यवहार करना और दास (सेवक) के साथ भलार्इ करना।’’         (तिरमिजी)




5. दोष क्षमा करने की शिक्षा
                एक व्यक्ति ने पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) से पूछा कि मैं अपने दास के दोष कहां तक क्षमा करूं? आप (सल्ल0) ने फरमाया-
‘‘प्रतिदिन सत्तर बार।’’ (अबू दाउद)

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘अल्लाह के पैगम्बर हजरत मूसा ने अल्लाह से निवेदन किया कि ऐ पालनहार। तेरे बन्दों में तेरे निकट सबसे प्रिय कौन हैं? अल्लाह न उत्तर दिया कि वह व्यक्ति जो बदला लेने की शक्ति होते हुए भी (प्रतिद्वंद्वी को) क्षमा कर दें।’’(बैहकी)

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘दान करने से धन में कमी नही होती और जो व्यक्ति (किसी को) क्षमा करता और उसके दोष से दृष्टि हटा लेता हैं तो उसके इस कर्म से र्इश्वर उसका सम्मान बढ़ा देता हैं और जो व्यक्ति विनय करता और र्इश्वर के लिए नम्रता से काम लेता हैं, उसका पद उंचा कर देता हैं।’’ (मुसलिम)





6.सहिष्णुता की शिक्षा

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल) ने फरमाया-

‘‘पहलवान वह नही हैं जो अधिक भार उठाए या लोगो को पछाड़ता फिरे। वास्तव में पहलवान वह हैं जो क्रोध को सहन करे और क्रोध के कारण अल्लाह की अवज्ञा न करें। ‘‘ (बुखारी, मुसलिम)

एक व्यक्ति ने पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) से निवेदन किया-’’मुझे कुछ उपदेश कीजिए।’’

आप (सल्ल0) ने फरमाया-’’गुस्सा न किया करो।’’ उसने कहा-’’कुछ और उपदेश कीजिए।’’ पैगम्बर (सल्ल0) ने फिर फरमाया, ‘‘ गुस्सा न किया करो।’’ उसने फिर वही निवेदन किया और पैगम्बर (सल्ल0) ने फिर वही जवाब दिया।     (बुखारी)

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए गुस्से के घूंट को पी जाने से बढ़की कोर्इ दूसरा घूंट नही हैं।’’ (इब्ने माजा)

7 सच्चार्इ और प्रतिज्ञा-पालन की शिक्षा

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘अल्लाह के निकट सबसे प्रिय चीज आदमी की सच्ची बात हैं।’’ (बुखारी)

‘‘ मैं तुमको अल्लाह से डरने और सच बोलने की ताकीद करता हूं।’’
                                    (तजरीदुल अहादीस)
पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘मुझे अपनी ओर से छ: बातों की जमानत दो, (यानी इनके पालन की जिम्मेदारी स्वीकार करो) तो मैं तुम्हारे लिए जन्नत की जमानत देता हूॅं। जब बात करो तो सच बोलो। जब प्रतिज्ञा करो तो उसे पूरा करों। जब तुम्हें धरोहर सौंपी जाए तो उसे अदा करो। अपनी कामेंद्रियों की (व्यभिचार से) रक्षा करों। (अनुचित व अश्लील दृश्य से बचने के लिए ) अपनी दृष्टि नीची रखों, तथा अपने हाथ (अत्याचार से) रोको।’’ (हदीस)


8 झूठ और वचन-भंग से बचने की शिक्षा

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘ तीन चीजे मुनाफिक (कपटाचारी) मनुष्य के लक्षण हैं चाहे वह नमाज पड़ता हो, रोजा रखता हो और अपने को मुसलमान समझता हो। (वे तीन बाते ये हैं) बात करे तो झूठ बोले, वचन दे तो उसका पालन न करे और किसी से प्रतिज्ञा करें तो उसे भंग कर डाले। (सिहाह सित्ता)

अर्थात ऐसा व्यक्ति नाम का मुसलमान हैं, सच्चा मुसलमान नही।

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘ जो व्यक्ति किसी ऐसी वस्तु का दावा करे जो उसकी नही हैं तो वह हममे से नही हैं। उसे चाहिए कि वह अपना ठिकाना नरक में बना लें। (मुसलिम)

अर्थात ऐसा व्यक्ति भी मुसलमान कहलाने के योग्य नही।


9 आम लोगों के साथ भलार्इ की शिक्षा

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘सारी सृष्टि अल्लाह का परिवार हैं; अत: अल्लाह उस व्यक्ति को प्रिय रखता है जो उसके परिवार के साथ भलार्इ करता हैं।’’ (मिशकात)

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘तेरा अपने भार्इ से मुस्कान भरे मुख के साथ मिलना भी तेरे लिए दान हैं (अर्थात् इसपर तुझे दान का पुण्य प्राप्त होगा,) अच्छे कामो का आदेश देना और बुरी कामों से रोकना भी तेरे लिए दान हैं। रास्ते से भटके हुए आदमी को रास्ते पर लगा देना भी तेरे लिए दान हैं। अंधे को रास्ता बता देना भी तेरे लिए दान हैं। रास्ते से कंकड़ पत्थर, कांटा और हड्डियां आदि दूर कर देना भी तेरे लिए दान हैं और अपने डोल से अपने भार्इ के डोल में पानी डाल देना भी तेरे लिए दान हैं।’’ (तिरमिजी)



पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘किसी ने ऐसा कुआं खुदवाया जिससे ( मनुष्यो के अलावा) पशु भी पानी पी सकें तो र्इश्वर कुआं खुदवानेवाले को प्रलय प्रयन्त पुण्य देता रहेगा।’’ ( बुखारी)

हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘(प्रलय के दिन) र्इश्वर कहेगा कि ऐ आदम की संतान! मैं बीमार पड़ा, परन्तु तूने मेरा हाल न पूछा।’’ इन्सान निवेदन करेगा-’’ऐ पालनहार! मैं तेरा हाल कैसे पूछता? तू तो स्वंय सारी सृष्टि का पालनहार हैं।’’ र्इश्वर कहेगा-’’मेरा अमुक बन्दा बीमार हुआ परन्तु उसका हाल न पूछा! क्या तुझे मालूम नही कि यदि तू उसका हाल पूछने जाता तो मुझे उसके पास पाता।’’ फिर पूछेगा- ‘‘ऐ आदम की संतान! मैने तुझसे खाना मांगा परन्तु तूने मुझे खाना न दिया।’’ मनुष्य निवेदन करेगा-’’ऐ पालनहार! मैं तुझे भोजन कैसे देता? तू स्वंय सारी सृष्टि का पालनहार हैं।’’ र्इश्वर कहेगा-’’मेरे अमुक बन्दे ने तुझसे खाना मांगा, परन्तु तूने उसे खाना नही दिया, क्या तू नही जानता कि यदि तू उसे खाना देता तो उसका पुण्य मुझसे पाता।’’ (मुसलिम)

10 पड़ोसी के साथ भलार्इ करने की शिक्षा

हजरत अब्दुल्लाह-बिन-अब्बास कहते हैं कि मैने हजरत मुहम्मद (सल्ल0) को कहते सुना हैं-

‘‘वह व्यक्ति मुसलमान नही हैं जो स्वंय तो पेट भरकर खाए और उसकी बगल में उसका पड़ोसी भूखा रहें।’’        (मिशकात )   

हजरत अबू जर (रजि0) कहते हैं कि एक दिन हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने मुझसे फरमाया- 
‘‘अबू जर! जब तुम शोरबा (दाल, तरकारी, सालन आदि) पकाओं तो उसमें पानी ज्यादा डाल दिया करों और पड़ोसियों के घर की खोज-खबर ले लिया करो और रीति के अनुसार शोरबे से उनकी सहायता किया करो।’’ (मुसलिम)

एक दिन हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने वुजू किया तो सहाबा (आपके साथी) आपके वुजू के बचे हुए पानी को लेकर (अपने-अपने चेहरो पर) मलने लगे। हुजूर ने पूछा-’’तुमको कौन-सी भावना इसके लिए उत्प्रेरित करती हैं?’’सहाबा (रजि0) ने निवेदन किया-’’खुदा और उसके रसूल से प्रेम की भावना।’’हूजूर ने फरमाया-

‘‘जिसको यह बात प्रिय लगती हो कि वह खुदा और उसके रसूल से प्रेम करें या खुदा और रसूल उससे प्रेम करें तो उसे चाहिए कि जब बात करें तो सच बोले और जब कोर्इ धरोहर उसको सौंपी जाए तो उसे अदा कर दिया करें और जिसके पड़ोस मे बसता हो उसके प्रति एक अच्छे पड़ोसी का व्यवहार करें।’’ (मिशकात)

हजरत अबू हुरैरा (रजि0) कहते हैं कि एक व्यक्ति ने पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) से निवेदन किया-

‘‘ऐ अल्लाह के रसूल! एक स्त्री हैं जो रात-रात-भर नमाज पढ़ती हैं और दिन को रोजा (व्रत) रखती हैं, दान-पुण्य करती हैं, परन्तु कटु वचनों से अपने पड़ोसियों को सताती हैं।’’ हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-
‘‘उस स्त्री में कोर्इ भलार्इ नही, वह नरक में जानेवाली हैं।’’ उस व्यक्ति ने निवेदन किया-’’एक अन्य स्त्री हैं जो केवल फर्ज (अनिवार्य) नमाजें पढ़ती हैं, केवल रमजान मास के रोजे रखती हैं और कुछ कपड़े दान कर दिया करती हैं परन्तु किसी को कष्ट नही पहुचाती ।’’ पैगम्बर ने फरमाया-’’वह स्वर्ग मे जानेवाली हैं। (अहमद)

11 परस्पर बुरार्इ और दुव्र्यवहार की मनाही

हजरत अबू हुरैरा (रजि0) कहते हैं-

‘‘एक बार पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने लोगो से पूछा कि तुम जानते हो कि मुफलिस (दरिद्र) कौन हैं? लोगो ने निवेदन किया कि हमारे बीच तो मुफलिस उसको समझा जाता हैं जिसके पास न रूपया पैसा हो और न (जीवन-यापन की अन्य) साधन-सामग्री हो। पैगम्बर (सल्ल0) ने फरमाया-’’मेरी उम्मत (अनुयायियों) में मुफलिस वह हैं जो इस अवस्था में (प्रलय के दिन र्इश्वर के सम्मुख) उपस्थित होगा कि उसके साथ नमाज, रोजा और दान-पुण्य (आदि सभी सत्कर्म) होंगे, परन्तु उसने किसी को गाली दी होगी, किसी पर झूठा आरोप लगाया होगा, किसी का धन (अनुचित रूप से) खाया होगा, किसी की हत्या की होगी और किसी को मारा-पीटा होगा। उसके सब सत्कर्म इन अत्याचार पीड़ितों में बांट दिए जाएंगे और जब सभी मामले चुकता होने से पहले ही उसके सत्कर्म समाप्त हो तो अत्याचार पीड़ितो के दोष उसके जिम्मे डाल दिए जाएंगे, फिर उसको नरक में फेंक दिया जाएगा।’’ (मुसलिम)

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘तुममें से कोर्इ व्यक्ति मुसलमान नही हो सकता जब तक अपने भार्इ (अर्थात दूसरे लोंगो) के लिए वही कुछ न पसंद करें जो कुछ अपने लिए वही कुछ न पसंद करे जो कुछ अपने लिए पसंद करता हैं।’’(बुखारी)


पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘जो व्यक्ति किसी औचित्य के बिना किसी की भूमि ले लेगा उसको प्रलय के दिन (उस भूमि के अनुसार) सात भूतियों (की गहरार्इ) तक धंसा दिया जाएगा। (बुखारी)
 
12.व्यापार में र्इमानदारी शिक्षा

 पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘जो व्यक्ति झूठी कसम खाकर माल बेचता हैं, प्रलय के दिन र्इश्वर उसकी ओर दृष्टि उठाकर भी न देखेगा।’’ (बुखारी)

हजरत रूफआ (रजि0) कहते हैं-

‘‘एक बार हजरत मुहम्मद (सल्ल0) नमाज के लिए मस्जिद की ओर निकले तो देखा कि लोग क्रय-विक्रय में व्यस्त हैं। आपने फरमाया-

‘ऐ व्यापारियों!’ इसके उत्तर में व्यापारियों ने अपनी गर्दन और अपनी आंखे आपकी ओर उठार्इ, आपने फरमाया-व्यापारी वर्ग प्रलय के दिन र्इश्वर के अवज्ञाकारियों की अवस्था मे उठाए जाएंगे। केवल वे लोग से अवस्था से अलग होंगे जिन्होने र्इश्वर का भय रखा और नेकी और सच्चार्इ से काम लिया।’’        (तिरमिजी)

वसिला बिन असकअ (रजि0) कहते हैं कि मैने हजरत मुहम्मद (सल्ल0) को फरमाते हुए सुना हैं-

‘‘ जो व्यक्ति कोर्इ दोषपूर्ण वस्तु बेचे और (ग्राहक से) उसका दोष न प्रकट कर दे, वह हमेशा अल्लाह के क्रोध का भागी रहता हैं और अल्लाह के फरिस्ते उस पर धिक्कार करते रहते हैं।’’ (इब्न माजा)

‘‘एक बार पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) का गुजर (बाजार में) अनाज के एक ढेर के पास से हुआ। अपने उस ढेर में हाथ डाला तो आपकी उंगलियों में गीलापन अनुभव हुआ। आपने फरमाया -

‘‘ ऐ अनाजवाले! यह क्या है? ‘‘उसने कहा-’’ऐ अल्लाह के रसूल। इस पर वर्षा हो गर्इ हैं। ‘‘पैगम्बर ने फरमाया-’’तो उसे उपर क्यो न रखा कि लोग उसे देख लेते। याद रखों, जिसने धोखे से काम लिया वह मुझमें से नही हैं।’’ (मिशकात)

आज हमारे देश की समस्याओं मे से यह एक बड़ी समस्या हैं कि वस्तुओ के दाम तो अत्यधिक चढ़ गए हैं, इसपर भी अधिकतर वस्तुओं का केवल नाम ही बाकी रह गया हैं परन्तु वह असली मिलती नही। न दूध शुद्ध मिलता हैं न घी, हद तो यह है कि तेल भी खालिस नसीब नही होता। स्वास्थ्य तथा जीवन दवाओं पर निर्भर होकर रह गया है, परन्तु दवांए भी विश्वास योग्य नही रही और यह अनर्थ सबसे ज्यादा वर्ग कर रहा है।

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘बेचने और खरीदने में सच बोला जाता हैं तो (लेन-देन में) बरकत अर्थात बढ़ोत्तरी होती है और जब झूठ बोलते है और (वस्तुओं के ) दोष को छिपाते है तो सौदे की बरकत चली जाती हैं।’’ (मुसलिम)

13 अनुचित रूप से माल खाने की निन्दा

        हजरत साद बिन वक्कास (रजि0) ने पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) से निवेदन किया-

‘‘ऐ र्इश्वर के पैगम्बर! मेरे लिए र्इश्वर से दुआ कीजिए कि मेरी दुआएं स्वीकृत हो जाया करे।’’
हूजूर (सल्ल0) ने फरमाया-’’अपनी जीविका को शुद्ध कर लो। अल्लाह की कसम! अब कोर्इ व्यक्ति अपने पेट मे हराम (अनुचित) निवाला डालता है तो अल्लाह चालीस दिनों तक उसका कोर्इ (अच्छा) कर्म स्वीकार नही करता। जिस व्यक्ति का शरीर हराम माल से बढ़ा उसका ठिकाना नरक के सिवा और कुछ नही है।’’ (तबरानी)

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘मुंह में धूल डाल लेना इससे अच्छा हैं कि कोर्इ व्यक्ति हराम वस्तु मुंह मे डाले।’’(अहमद)

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘अगर किसी ने हराम का माल एकत्र किया और उसमें से दान दिया या पुण्य कार्य मे खर्च किया तो उसका कुछ फल न मिलेगा बल्कि उल्टा दण्ड का भागी होगा।’’ (बुखारी, मुस्लिम)

आजकल एक तो लोग र्इश्वर, परलोक और पुण्य तथा दण्ड को मानते ही नही और जो मानने का दावा भी करते हैं और दानी तथा धर्मात्मा भी कहलाना चाहते हैं, वे दोनो हाथों से अनुचित और हराम धन समेटते हैं और उसमें से थोड़ा-सा परमार्थ में खर्च करके समझते हैं कि उन्होने सारी नेकियां समेट ली।

 
14 रिश्वत व घूसखोरी की निंदा

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘ रिश्वत लेना काफिर (विधर्मी) होने के समान हैं। लोगो में रिश्वत की ‘‘रिश्वत लेना काफिर (विधर्मी होने के समान हैं। लोगो मे रिशवत की रीति हराम की रीति हैं।’’(तबरानी)



पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘ जो व्यक्ति किसी समाज का अधिकारी और न्यायकर्ता (जज) नियुक्त हुआ, वह प्रलय के दिन (खुदा के सम्मुख) इस दशा मे उपस्थित होगा कि उसका हाथ उसकी गर्दन से बंधा होगा, फिर अगर वह रिश्वत खानेवाला न था और उसके तमाम निर्णय  न्याय के साथ होते थे तो वह मुक्त कर दिया जाएगा, परन्तु यदि वह रिश्वत खाता था और लोगो से माल लेकर न्याय के विरूद्ध निर्णय किया करता था तो उसको नरक में डाल दिया जाएगा और वह पांचा वर्ष के मार्ग के बराबर गहरार्इ में जो पड़ेगा          (तबरानी)
इस्लाम की शिक्षा यह हैं। परन्तु आजकल सरकारी दफतरों, कचहरियों तथा न्यायलयों की क्या स्थिति है?
पिछले पन्नों मे अत्यंत संक्षेप मे मानवता संबंधी इस्लामी शिक्षा प्रस्तुत करने की कोशिश की गर्इ हैं जिसको इस्लामी जीवन का केवल नमूना समझना चाहिए। आरंभ मे बताया गया हैं कि इस्लाम की शिक्षा र्इश्वर, पैगम्बर और परलोक की धारणाओं और उनपर अड़िग विश्वास कीधुरी पर धूमती हैं। उपर इस्लाम की जितनी भी शिक्षा प्रस्तुत की गर्इ हैं उसकी नींव में आप से तीनों धारणाएं विद्यमान पाएंगे। इस्लामी शिक्षा की यही विशेषता हैं जो उसे अत्यंत मनोहर तथा प्रभावकारी बना देती हैं। यदि आपने उपरोक्त इस्लामी शिक्षाओं का मनोहर तथा प्रभावकारी बना देती हैं। यदि अवश्य इस नतीजे पर पहुंचे होंगे कि आज हमारे देश को इन शिक्षाओं की कितनी आवश्यकता हैं। फिर इस्लाम की जो शिक्षा प्रस्तुत की गर्इ हैं उसमें वे उसमें वे सभी बाते पार्इ जाती हैं जिनकों श्रीकृष्ण जी और मनु महाराज ने मानव-धम्र या साधारण कर्तव्य बताया हैं और उनसे कुछ अधिक भी।ं परन्तु वे सारी ही शिक्षाएं मानव-धर्म की कसौटी पर पूरी उतरती हैं। हिन्दू, मुसलमान, सिख, र्इसार्इ, जैनी, बौद्ध, पारसी आदि प्रत्येक पंथ के अनुयायी और प्रत्येक वर्ग एवं कोटि वर्ग एवं कोटि के लोग जिनपर आचरण कर सकते हैं।यह वे शिक्षाएं है जो हर धर्म की संयुक्त संपत्ति हैं।
इन शिक्षाओं का देश के लिए पंचवष्र्ाीय योजनाओं से भी अधिक महत्व हैं।जब तक देश मे सच्चार्इ, र्इमानदारी और शुद्ध आचरण तथा व्यवहार प्रचलित न हो और देश से बेर्इमानी, छल-कपट, स्वार्थपरता, अनुचित मुनाफाखोरी, रिश्वत गबन, लूट-खसोट दूर न हो और दूसरे शब्दो मे मानवता न स्थापित हो,कोर्इ योजना वास्तविक अर्थ मे सफल न होगी। और अगर इन खराबियों के रहते हम उन्नति कर भी लें तो यह अस्थार्इ और अत्याचारपूर्ण ही होगी।

Author Name: कुरआन मानवता का राजमार्ग:अबू-मुहम्मद इमामुद्दीन रामनगरी व मुहम्मद जैनुल आबिदीन मंसूरी