कुरआन पुकारता हैं

ऐ लोगो, बन्दगी इख्तियार करो अपने उस रब की जो तुम्हारा, और तुमसे पहले जो लोग हुए है उन सबका पैदा करनेवाला है, तुम्हारे बचने की आशा’ इसी प्रकार हो सकती है।                                 (कुरआन, 2:21)

(1. अर्थात दुनिया मे गलत देखने और गलत काम करने से, और आखिरत (परलोक) में अल्लाह की यातना (अजाब) से बचने की आशा।)

    ऐ लोगो, धरती मे जो हलाल (वैद्य) और अच्छी-सुथरी चीजे हैं उन्हे खाओं और शैतान के बताए हुए रास्तों पर न चलो। वह तुम्हारा खुला दुश्मन है।

    ऐ लोगो, अपने रब से डरो, (या अपने रब की नाफरमानी से बचो) जिसने तुमको ‘एक जान’’ से पैदा किया और उसी जान से उसका जोड़ा बनाया और उन दोनो से बहुत मर्द और औरत दुनिया मे फैला दिए। उस अल्लाह से डरो जिसका वास्ता देकर तुम एक-दूसरे से अपने हक मांगते हो और नाते-रिश्तों के संबंधो को बिगाड़ने से बचों। यकीन जानो कि अल्लाह तुम पर निगररानी कर रहा है। (कुरआन, 4:1)

(1. अर्थात प्रथम मनुष्य ‘आदम’ (अलैहि0) 12. अर्थात प्रथम स्त्री, आदम की पत्नी ‘हव्वा’ (अलैहि0))

ऐ लोगो, यह रसूल तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से ‘सत्य’ लेकर आ गया है, र्इमान ले आओ, तुम्हारे ही लिए बेहतर है, और अगर इन्कार करते हो तो जान लो कि आसमानों और जमीन मे जो कुछ है सब अल्लाह का हैं और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला भी हैं और गहरी समझवाला भी। (कुरआन, 4:170)

(1. रसूल (र्इश-दूत) अर्थात हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ।
2.अर्थात तुम्हारा खुदा न तो बेखबर हैं कि उसके राज्य मे रहते हुए तुम शरारते और सरकशी करो और उसे मालूम न हो, और न वह नादान है कि उसे अपने आदेशों का उल्लंघन करनेवालों से निपटना न आता हो।)

    ऐ लोगो, तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारे पास खुला प्रमाण आ गया हैं। और हमने तुम्हारी ओर ऐसा प्रकाश’ भेज दिया हैं जो साफ-साफ रास्ता दिखानेवाला हैं।  (कुरआन, 4:174)

(1. अर्थात् यह मार्गदर्शक ग्रंथ कुरआन और यह पथ-प्रदर्शक रसूल हजरत मुहम्मद सल्ल0।)
    (ऐ मुहम्मद, कहो), ‘‘ऐ लोगो, मैं तुम सबकी ओर उस अल्लाह का पैगम्बर हू     जो जमीन और आसमानों की बादशाही का मालिक हैं, उसके सिवा कोर्इ र्इश्वर नही है, वही जिन्दगी प्रदान करता हैं और वही मौत देता हैं, अत: र्इमान लाओ अल्लाह पर और उसके भेजे हुए उम्मी नबी पर जो अल्लाह और उसके आदेशों को मानता है, और उस (नबी) के अनुयायी बनो, ताकि तुम सीधा मार्ग पा जाओं।’’ (कुरआन, 7:158)

(’उम्मी नबी’ अर्थात ‘बे पढ़े-लिखे’, निरक्षर व अनपढ़ नबी। हजरत मुहम्मद (सल्ल0) उम्मी थे, अत: इस बात की कोर्इ संभावना न थी (यद्यपि वे पढ़े-लिखे होते तब भी यह संभव न था) कि कुरआन जैसे महान, अदभुत और अभूतपूर्व ग्रंथ की रचना वे स्वंय कर लेते। इसी कारण, आगे कहा गया कि आप (सल्ल0) अल्लाह क आदेशों को मानते हैं। स्वंय कोर्इ दार्शनिक, या धर्म-प्रवर्तक नही हैं, जो कुछ भी कहते या करते है, जो आदेश-निर्देश देते हैं अपने स्वंय-अर्जित ज्ञान और अपने स्वच्छंद चिन्तन-मनन से नही, बल्कि अल्लाह के उस आदेश के अनुसार जो र्इश-प्रकाशना (वह्य) के रूप में (फरिश्ता ‘जिबरील’ के माध्यम से) आप (सल्ल0) पर अवतरित होता है।)
    वह अल्लाह ही है जो तुम्हे जल और थल की सैर कराता है। अतएव जब तुम नौका से सवार होकर अनुकूल हवा पर प्रसन्नता, और खुशी के साथ सफर कर रहे होते हो और फिर अचानक प्रतिकूल हवा (तूफान) का जोर होता है और हर ओर से मौजो के थपेड़े लगते है, तो उस समय सब अपने दीन-धर्म को अल्लाह के लिए खालिस (एकाग्र) करके उससे दुआए     मांगते हो कि ‘‘अगर तूने हमको इस बला से निकाल दिया तो हम शुक्रगुजार बन्दे बनेगें।’’ मगर जब वह उनको बचा लेता है तो फिर वही लोग सत्य से हटकर जमीन मे विद्रोह (और उपद्रव) करने लगते हैं। ऐ लोगो, तुम्हारा यह विद्रोह तुम्हारे ही खिलाफ पड़ रहा हैं। दुनिया की जिन्दगी के थोड़े दिनो के मजे हैं (लूट लो), फिर तुम्हे हमारी ओर पलट कर आना है, उस समय हम तुम्हे बता देंगे कि (सांसारिक जीवन में) तुम क्या कुछ करते रहे हो। (कुरआन, 10:23-24)

(1. मुसीबत की घड़ियों में, जब कहीं से सहायता की आस न रह जाए, सारे उपास्यों को छोड़कर मात्र अल्लाह, र्इश्वर से सहायत की बिनती, प्रार्थना व दुआ करना सामान्य मानव-व्यवहार हैं। यहां तक कि आस्तिक तो आस्तिक, नास्तिक व्यक्ति भी ऐसा ही करता हैं। दुर्घटना में तबाह हो जानेवाले एक रूसी वायुयान के ‘‘ब्लैक-बाक्स’’ से नास्तिक पायलट की यह अन्तिम पुकार सुनी गर्इ, ‘‘ हे र्इश्वर, मुझे बचा ले!’’),, (Oh God, Save me!””)

2.उपर्युक्त दोगलेपन का रवैया अपनानेवाले लोग यह न समझ बैठे कि अल्लाह की अवज्ञा, नाशुक्रगुजारी और विद्रोह वाली, मौज-मस्ती की जिन्दगी खत्म होते ही सब कुछ यही खत्म हो जाएगा। वास्तव मे वह दिन आना ही है जब परलोक मे हर व्यक्ति वापस अल्लाह के समक्ष उपस्थित होगा। वह जो कुछ भी यहां करता रहा हैं उसे बता और दिखा दिया जाएगा। उसके साथ पूरे का पूरा इन्साफ होगा, वह अपने कर्मानुसार, पुरस्कार (स्वर्ग) या यातना व प्रकोप (नरक) का भागी होगा।
    ऐ लोगो, तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से आदेश आ गया हैं। यह वह चीज है जो दिलों के रोग को चंगा करने के लिए है और जो इसे स्वीकार कर लें उनके लिए मार्गदर्शन और दयालुता हैं। (कुरआन, 10:57)

(1. आदेश अर्थात र्इश्वरीय आदेश-निर्देश का ग्रंथ ‘कुरआन’।)
    (ऐ नबी) कह दो, ‘‘ ऐ लोगो, अगर तुम अभी तक मेरे धर्म (’दीन’) के बारे मे किसी शक मे हो तो सुन लो कि तुम अल्लाह के सिवा जिसकी बन्दगी (और उपासना) करते हो, मैं उनकी बन्दगी नही करता बल्कि सिर्फ उसी अल्लाह की बन्दगी करता हूं जिसके अधिकार में तुम्हारी मौत हैं। मुझे (अल्लाह की ओर से) आदेश दिया गया है कि मै र्इमानवालों मे से हू    ।’’ (कुरआन, 10:104)

(1. इस्लाम और गैर-इस्लाम मे मूल अन्तर यही हैं और यही इस्लाम की विशिष्टता है जिसका एलान अल्लाह अपने रसूल, हजरत मुहम्मद (सल्ल0) के द्वारा और पूरी मानव-जाति के लिए करा रहा हैं। इसके अनुसार किसी को इस शक मे नही रहना चाहिए कि इस्लाम की शिक्षा में, विशुद्ध एकेश्वरवाद (तौहीद Monotheism) के सिवा बहु-र्इश्वरवाद या बहुदेववाद (Polytheism).....अथवा त्रि-र्इश्वरवाद (Trinity) की भी कोर्इ गुंजाइश हैं। यह ‘र्इश्वरत्व में साझेदारी’ (शिर्क), इस्लाम की मूल धारणा ‘तौहीद’ (विशुद्ध एकेश्वरवाद) के बिल्कुल प्रतिकूल हैं और कुरआन में इसे घोर अत्याचार-बहुत ही बड़ा जुल्म कहा गया हैं।    (कुरआन, 31:13)

(ऐ मुहम्मद) कह दो, ‘‘ऐ लोगो, तुम्हारे रब की ओर से ‘सत्य’ आ चुका हैं। अब जो सीधा मार्ग अपनाए उसका सीधा मार्ग ग्रहण करना उसी के लिए लाभदायक हैं और जो (यह सीधा मार्ग न अपना कर) गुमराह रहे उसकी गुमराही उसी के लिए विनाशकारी हैं। और मै तुम्हारे ऊपर कोर्इ हवालेदार नही हू    ।’’    (कुरआन, 10:108)

(1. इस्लाम का मूल सिद्धांत और मुसलमानों की सुनिश्चित नीति यही है कि सत्य-धर्म ‘इस्लाम’ का प्रचार-प्रसार किया जाए। इसे स्वीकार करना या अस्वीकार कर देना दूसरों की मरजी पर छोड़ दिया जाए। जोर-जबरदस्ती और बलात धर्म-परिवर्तन की न आवश्यकता है न औचित्य।)

    ऐ लोगो, अपने रब से डरो (और उसके गजब व प्रकोप से बचो), वास्तविकता यह है कि कियामत का जलजला (प्रलय का भूकम्प) बड़ी (भयंकर) चीज (घटना) हैं। जिस दिन तुम (अर्थात उस समय के मनुष्य) उसे देखोगे। हाल यह होगा कि हर दूध पिलानेवाली अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाएगी, हर गर्भवती का गर्भ गिर जाएगा और लोग तुम्हे ऐसे दिखेंगे जैसे कि नशे मे हो, जबकि वे नशे मे न होगे, बल्कि अल्लाह का अजाब ही कुछ ऐसा कठोर होगा। (कुरआन, 22:1,2),
    ऐ लोगो, अगर तुम्हे मौत के बाद की जिन्दगी (पुनरूज्जीवन) के बारे में कुछ शक है तो तुम्हे मालूम हो कि हमने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया है, फिर वीर्य से, फिर खून के लोथड़े से, फिर मांस की बोटी से, जो शक्लवाली भी होती है और बेशक्ल भी। (यह हम इसलिए बता रहे हैं) ताकि तुम पर सच्चार्इ को स्पष्ट कर दें। हम जिस (वीर्य) को चाहते हैं एक नियत समय तक गर्भाशय मे ठहराए रखते हैं, फिर तुम को एक बच्चे के रूप में निकाल लाते हैं (फिर तुम्हारा पालन-पोषण करते हैं) ताकि तुम अपनी जवानी (युवावस्था) को पहुंचों। और तुम मे से कोर्इ पहले ही वापस ही वापस बुला लिया जाता हैं और कोर्इ निकृष्टतम आयु की ओर फेर दिया जाता हैं, ताकि सब कुछ जानने के बाद फिर कुछ न समझों । और तुम देखते हो कि जमीन सूखी पड़ी हैं, फिर जहां हमने उस पर पानी बरसाया कि यकायक वह फबक उठी और फूल गर्इ और उसने हर तरह की सदृश्य वनस्पतियां उगलनी शुरू कर दीं। यह सब कुछ इसलिए (प्रमाणस्वरूप बताया जा रहा) हैं कि अल्लाह ही सत्य है। और वह मुर्दो को जिन्दा करता हैं और उसे हर चीज का सामथ्र्य हैं। और (यह इस बात का प्रमाण है कि) कियामत की घड़ी आकर रहेगी, इसमें किसी शक की गुंजाइश नही, और अल्लाह जरूर उन लोगो को (पुनरूज्जीवित करके) उठाएगा जो कब्रो मे जा चुके हैं।, (कुरआन, 22:56),

(1. प्रथम मानव, हजरत आदम (अलैहि0) को मिट्टी के गारे से पैदा किया, उनकी पत्नी..... हजरत हव्वा (अलैहि0) को चामत्कारिक  रूप से पैदा किया। फिर आगे की मानव-संरचना स्त्री- पुरूष के यौन-मिलाप की सामान्य प्रक्रिया के अन्तर्गत, होती रहने का शाश्वत नियम बना दिया जिसमें उस ‘वीर्य’ को प्राथमिक स्थान प्राप्त हैं जिसके सारे तत्व (आहार व जल के माध्यम से) मानव-शरीर में, मिट्टी से ही पहुंचते और उसमें रहकर प्रजनन-गुण के धारक बनते हैं।),

2. अर्थात बुढ़ापे की उम्र का वह चरण जब आदमी का याददाश्त बहुत कमजोर हो जाती है और बहुत भूलने लगता है।

3. यहॉ से एक उदाहरण शुरू होता है जिसके द्वारा यह समझाया जा रहा है कि बजाहिर कुछ चीजे बिल्कुल जीवन-रहित हो जाती हैं लेकिन अल्लाह के सामथ्र्य और क्षमता से उनमें फिर से जिन्दगी फूट पड़ती हैं। यह एक निशानी और प्रमाण हैं कि अल्लाह जब चाहे मृत को जीवन प्रदान कर सकता हैं। अत: परलोक के लिए मनुष्यों को पुन: जीवित कर देना उसके लिए कौन कहे, जरा-सा भी मुश्किल नही हैं।

4. अर्थात मुर्दा-समान हैं।

5. और उन्हे भी जो कब्रो मे दफन नही हैं बल्कि उनके पार्थिव शरीर जलकर राख हो गए, या छिन्न-भिन्न हो गए या उन्हे किसी पशु-पक्षी ने खा लिया, क्योकि शरीर के समस्त भौतिक तत्व उसी धरती, वातावरण, वायुमण्डल मे तो विद्यमान है जो र्इश्वर के सामथ्र्य  व सत्ता के अंतर्गत हैं।

    (ऐ नबी) कह दो, ऐ लोगो, मै तुम्हारे लिए सिर्फ वह व्यक्ति हूं जो (कठिन पड़ी, अर्थात् प्रलय आने से पहले) साफ-साफ सावधान करने वाला (चेतावनी देनेवाला) हों।’’ फिर जो र्इमान लाएंगे, और उसी र्इमान के अनुकूल काम करेंगे उनके लिए (परलोक में) माफी हैं और सम्मानपूर्ण आजीविका; और जो हमारी को नीचा दिखाने की कोशिश करेगें वे दोजख (नरक) के यार हैं। (कुरआन, 22:49-51)
    (1. अर्थात इन्कार करने, उपहास करने, गलत व झूठा सिद्ध करने और मानव-कृत साबित करने की कोशिश।),

    ऐ लोगो, एक मिसाल दी जाती हैं,ध्यान से सुनो! जिन पूज्यों को तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो वे सब मिलकर एक मक्खी भी पैदा करना चाहे तो नही कर सकते, बल्कि मक्खी उनसे कोर्इ चीज छीन ले जाए तो वे उसे छुड़ा भी नही सकते। मदद चाहनेवाले भी कमजोर और जिनसें मदद चाही जाती हैं वे भी कमजोर।     (कुरआन, 22:73)
    ऐ लोगो, बचो अपने रब के प्रकोप से और डरो उस दिन से जब कोर्इ बाप अपने बेटे की ओर से बदला न देगा और न कोर्इ बेटा ही अपने बाप की ओर से कुछ बदला देनेवाला होगा। निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है। अत: यह दुनिया की जिन्दगी तुम्हे धोखे मे न डाले। और न धोखेबाज तुम्हे अल्लाह के बारे मे धोखा देने पाए।  (कुरआन, 31:33), 

(1. परलोक में तमाम इन्सानों के इकटठा किए जाने का दिन जब हर एक को उसका कर्म-पत्र दिया जाएगा, अच्छे कामों और बुरे कामों के बदले मे स्वर्ग या नरक का फैसला सुनाया जाएगा। उस दिन सबको अपनी पड़ी होगी, रिश्ते-नाते एक-दूसरे के काम न आऐंगे।)            (कुरआन, 80:34-37)

2.अर्थात् कियामत और परलोक का वादा।

3.    कि जो कुछ है यही का जीवन है। अत: खाओ, पियो मौज-मस्ती करो (Eat Drink and be Merry)।
4. अर्थात उनसे सचेत रहो जो जीवन की वास्तविक के बारे मे भ्रम और धोखे मे डालते है।

    ऐ लोगो, तुम पर अल्लाह के जो उपकार हैं उन्हे याद रखो । क्या अल्लाह के अलावा भी कोर्इ और स्रष्टा है जो तुम्हे आसमान और जमीन से रोजी (आजीविका) देता हो? कोर्इ उपास्य उसके सिवा नही, आखिर तुम कहां से धोखा खा रहे हो?          (कुरआन, 35:3)

    ऐ लोगो, अल्लाह का वादा यकीनन सच्चा हैं, अत: दुनिया की जिन्दगी तुम्हे धोके मे न डाले और न वह बड़ा धोखेबाज तुम्हे अल्लाह के बारे मे धोखा देने पाए। वास्तव मे शैतान तुम्हारा दुश्मन हैं, इसलिए तुम भी उसे अपना दुश्मन ही समझों। वह तो अपने अनुयायियों को अपनी राह पर इसलिए बुला रहा है कि व नरक मे जानेवालों मे शामिल हो जाएं। (कुरआन, 35, :5,6),

(1.     अर्थात शैतान।)

2.     विवरण के लिए देखे कुरआन 2:168, 208; 6:142; 7:22; 12:5; 28:15; 36:60; 43:62; 170:53

ऐ लोगो, तुम्ही अल्लाह के मुहताज हो और अल्लाह तो निराश्रित, सम्पन्न और प्रशंस्य हैं। वह चाहे तो तुम्हे हटाकर कोर्इ नर्इ सृष्टि तुम्हारी जगह ले आए, ऐसा करना अल्लाह के लिए कुछ भी कठिन नही हैं। कोर्इ बोझ उठानेवाला किसी दूसरे को बोझ न उठाएगा। और अगर कोर्इ (बोझ से) लदा हुआ प्राणी अपना बोझ उठाने बोझ उठाने के लिए पुकारेगा तो उसके बोझ का एक छोटा-सा हिस्सा भी बटाने के लिए कोर्इ न आएगा, चाहे वह बहुत ही निकट-संबंधी हो क्यो न हो।...(कुरआन, 35:15-18)

(1. अर्थात परलोक में हिसाब-किताब के दिन, दुनिया की जिन्दगी के बुरे कामों का बोझ जिस पर होगा, ऐसे व्यक्ति का।)

    ऐ लोगो, हमने तुमको एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और फिर तुम्हारी कौमे और बिरादरियां बना दी, ताकि तुम एक-दूसरे की पहचान कर सको। वास्तव मे अल्लाह की दृष्टि में तुममे सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित वह हैं जो तुम मे सबसे ज्यादा  परहेजगार और र्इशपरायण हैं। यकीनन अल्लाह सर्वज्ञानी और बाखबर हैं।         (कुरआन, 49:13)

    (1. यहां उस सबसे बड़ी बुरार्इ का सुधार किया गया हैं जो हमेशा से सार्वभौमिक बिगाड़ का कारण बनी हुर्इ हैं, अर्थात नस्ल, रंग, भाषा, देश और जातीय (कौमी) पक्षपात। यहां अल्लाह ने सारे इन्सानों को संबोधित करके तीन अत्यंत महत्वपूर्ण मौलिक तथ्यों का उल्लेख किया है। एक : तुम सब का मूल एक ही हैं। एक ही मर्द (आदम) और एक ही औरत (हव्वा) पूरी मानवजाति का आविर्भाव हुआ हैं। दूसरे : अपने मूल की दृष्टि से एक होने के बावजूद तुम्हारा कौमों और कबीलो मे विभक्त हो जाना एक स्वाभाविक बात थी, इस अन्तर और विभेद का उद्देश्य यह कदापि न था कि इसके आधार पर उ    च-नीच, भद्र और अभद्र, श्रेष्ठ और क्षुद्र की सीमा-रेखाए     खींची जाएं। स्रष्टा ने जिस कारण इन्सानी समुदायों को कौमों और कबीलो ंका रूप दिया था वह सिर्फ यह था कि उनके बीच पारस्परिक सहयोग और परिचय का स्वाभाविक रूप् स्थित रहे। तीसरे : इन्सान और इन्सान के बीच श्रेष्ठता और उच्चता का आधार केवल नैतिक श्रेष्ठता हो सकती हैं अर्थात र्इश-भय, र्इशपरायणता, नेकी तथा अल्लाह की नाफरमानी से बचना यानी परहेजगारी अपनाना। यही बात इस्लाम के पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने अन्तिम हज के अवसर पर अपने ऐतिहासिक भाषण मे यूं कही थी : ‘‘..लोगो, सुनों! तुम्हारा रब (प्रभु) एक हैं तुम्हारा पिता एक हैं। तुम सब आदम की संतान हो और आदम मिटटी से बने थे। तुममें अल्लाह के निकट प्रतिष्ठित वह हैं जो ज्यादा परहेजगार हैं। किसी अरबी को गैर-अरब पर, किसी गोरे को किसी काले पर, किसी गोरे पर परहेजगारी (र्इशपरयणता) के सिवाय कोर्इ श्रेष्ठता प्राप्त नही हैं़़़़़।’’)




‘‘ ऐ आदम की सन्तान...’’

    ऐ आदम की सन्तान, हमने तुम पर वस्त्र उतारा है कि तुम्हारे शरीर के गुप्त अंगो को ढांके और तुम्हारे लिए शरीर की रक्षा और सौंदर्य का साधन भी हो, और बेहतरीन वस्त्र परहेजगारी (बुरार्इयों से और अल्लाह की नाफरमानी के कामों और बातों से बचने) का वस्त्र है। यह अल्लाह की निशानियां में से एक निशानी हैं ताकि लोग इससे शिक्षा ग्रहण करें। (कुरआन, 7:26)

(1.    इस्लाम में गुप्त अंगो को ढांकना वस्त्र पहनने का मूलोद्देश्य हैं। इस्लाम के अनुसार पुरूष की नाभि से नीचे धुटनों तक और नारी के चेहरे और हथेलियों को छोड़कर पूरा शरीर ‘‘गुप्त-अंग’’ की परिभाषा (सतर) के अंतर्गत आता हैं। जब इन्सान तकवा (परहेजगारी) के वस्त्र से महरूम या रिक्त होता जाता हैं तो वह शारीरिक वस्त्र भी कम करता चला जाता हैं, विशेषत: परिणामस्वरूप अथाह एवं अनंत नैतिक व चारित्रिक बुरार्इयां व्यक्ति मे पनपने और समाज में फैलने लगती हैं। इसी लिए यहां बताया गया कि बेहतरीन वस्त्र ‘परहेजगारी का वस्त्र हैं)

    ऐ आदम की सन्तान, ऐसा न हो कि शैतान तुम्हें फिर उसी तरह प्रलोभन-परीक्षा (फितना) में डाल दे जिस तरह उसने तुम्हारे मां-बाप (आदम एवं हव्वा) को जन्नत से निकलवाया था और उनके वस्त्र उन पर से उतरवा दिए थे, ताकि उनके गुप्त-अंग एक-दूसरे के सामने खोले। (कुरआन, 7:27)

(1. विवरण के लिए देखिए कुरआन...7:26 पूरी आयत का अर्थ।)

आज के युग मे शैतान मर्दो और विशेषत: औरतों को आधुनिकता, उन्नति, सम्पन्नता आदि का प्रलोभन देकर उनके शरीर पर से उनके वस्त्र उतरवा रहा हैं। नाइट क्लब कल्चर, फैशन शो कल्चर, राष्ट्र सुन्दरी व विश्व सुन्दरी कल्चर और अश्लीलता एवं नग्नतापूर्ण विज्ञापन कल्चर का बढ़ता-चढ़ता रिवाज इसी शैतानों प्रलोभन परीक्षा का एक रूप हैं।

    ऐ आदम की सन्तान, हर इबादत के अवसर पर अपनी सज्ज्ाा से सुशोभित रहो और खाओ-पियों और सीमा से आगे न बढ़ो, अल्लाह सीमा से बढ़नेवालों को पसन्द नही करता।

ऐ नबी, इनसे कहो किसने अल्लाह की उस सज्जा को हराम कर दिया हैं जिसे अल्लाह ने अपने बन्दों के लिए निकाला था और किसने अल्लाह की प्रदान की हुर्इ पाक चीजें हराम कर दीं?                (कुरआन, 7:31-32)


(1. अल्लाह की इबादत की गलत परिकल्पना और चरम-पंथ (Extremism) पर आधारित कुछ धर्मो के अनुयायियों मे रिवाज यह था कि वे गन्दे रहते, नहाना-धोना और स्वच्छ वस्त्र पहनना छोड़ देते। यानी वे नंगे रहते या केवल लंगोटी बांधे रहते, बुरी तरह बाल बढ़ाए रहते, इत्यादि। इसी प्रकार ठीक से भोजन न करते, कुछ खा-पीकर बस जिन्दा रहते  और अल्लाह की दी हुर्इ खाद्य-सामग्रियों व पेय-पदार्थो को अपने लिए हराम (त्याज्य) कर लेते। यहां अल्लाह ने इस अस्वाभाविकता और चरम-पंथ से मना किया और स्वाभाविक व संतुलित रवैया अपनाने का आदेश दिया हैं।)

(और यह बात अल्लाह ने सृष्टि के आरंभ में ही, आदम की संतान की आत्माओं से कह दी थी कि) ऐ आदम की सन्तान, याद रखो जब तुम्ही में से ऐसे रसूल आएं जो तुम्हे मेरी आयते सुना रहे हो तो जो कोर्इ नाफरमानी से बचेगा और अपने रवैये (व्यवहार व चाल-चलन) का सुधार कर लेगा उसके लिए किसी डर और चिंता का कोर्इ अवसर नही हैं। (कुरआन, 7:35)

    और (ऐ नबी, लोगो को याद दिलाओं वह समय) जब तुम्हारे रब ने आदम की सन्तान की पीठों से उनकी नस्ल को निकाला था और उन्हें स्वंय उन्ही पर गवाह बनाते हुए पूछा था, ‘‘ क्या मैं तुम्हारा रब नही हूं?’’ उन्होने कहा, ‘‘जरूर, आप ही हमारे रब हैं, हम इस पर गवाही देते हैं।’’ यह हमने इसलिए किया कि कही तुम कियामत के दिन यह न कहने लगो कि ‘‘हम तो इससे बेखबर थे’’ , या यह न कहने लगो कि ‘‘शिर्क (बहुदेव-पूजा) का आरंभ तो हमारे बाप-दादा ने हमसे पहले किया था और हम उसके पश्चात उनकी नस्ल से पैदा हुए। फिर आप हमें उस अपराध में पकड़ते है जो दोषी लोगो ने किया था? ‘‘ देखो, इस तरह हम बाते स्पष्ट करके पेश करते हैं और इसलिए करते हैं कि ये लोग (शिर्क को त्याग कर मेरी ओर) पलट आएं।
(कुरआन, 7:172-174)
(1.यह इहलौकिक घटना और ऐतिहासिक वार्ता नही हैं, अत: र्इश-प्रकाशना के तह) हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने इसकी व्याख्या की। यह व्याख्या इस्लाम की द्वितीय श्रेणी के मूल ग्रंथ.....हदीस ‘‘....अर्थात  आप (सल्ल0) के वचनों का कथन-संग्रह में, जो कि पूर्णत: प्रामाणिक एवं विश्वसनीय हैं, इस तरह आर्इ हैं कि आदम को बनाने के बाद, अल्लाह ने आदम की पूरी भावी नस्ल की आत्माओं को एक ही समय पर अपने सामने उपस्थित किया था (और यह काम उसके लिए कुछ भी कठिन या असंभव हरगिज न था), और उनसे, अपने रब होने की गवाही ली थी।

2. यद्यपि यह घटना इहलौकिक नही हैं, फिर भी इसी का प्रभाव व परिणाम हैं कि कोर्इ भी मानव-प्राणी इस तथ्य से बेखबर नही हैं कि उसका एक स्रष्टा व रब (पालनहार) हैं, जो अल्लाह (प्रभु, र्इश्वर, God) के सिवा और कोर्इ नही हैं। इहलौकिक जीवन में हर मनुष्य की चेतना (या अन्त: करण) में ‘‘ अल्लाह के रब होने’’ की अनुभूति  मौजूद हैं। अल्लाह ने संसार मे आदिकाल से ही अपने दूतों (नबियों, रसूलों) को नियुक्त करने और उन पर अपनी वाणी अवतरित करने का जो आयोजन किया उसका मूल उद्देश्य यही रहा हैं कि आदम की संतान को उसकी वह गवाही याद दिखार्इ जाए। उसके चेतना-पटल पर ‘अल्लाह के रब होने’ की अवधारण, विश्वास और र्इमान व यकीन की रूप-रेखा उभारी जाए तथा उसे शिर्क से रोका जाए।

    हमने आदम की सन्तान को श्रेष्ठता प्रदान की और उन्हे खुश्की (जमीन) और तरी (समुद्र) में सवारियां प्रदान की और उनको पाक चीजों से रोजी दी और अपने बहुत से पैदा किए हुओं पर स्पष्ट श्रेष्ठता प्रदान की।(कुरआन, 17:70)
    (1. बुद्धि, विवके, चेतना, आध्यात्मिक, सभ्यता,नैतिकता, बन्दगी और नेकी आदि की श्रेष्ठता।
2. जमीन और नदियों व समुद्रो पर चलनेवाली सवारियों में से कुछ को इन्सान बनाता है, लेकिन यहां अल्लाह कहता हैं कि इन्हे हमने प्रदान किया है। तात्पर्य यह है कि इनमें काम आनेवाली सामग्री, सवारी बनाने की बुद्धि, तकनीक की कुशलता और उपयोग व उपभोग की क्षमता, सब कुछ र्इश-प्रदत्त (God Gifted) है। साथ ही अनेक पशुओं (जैसे उ    ट, घोड़ा, गधा, बैल, भैंस, हाथी.... और टुण्ड्रा मे एस्कीमों का कुत्ता आदि)  को सवारी के लिए इन्सान के अनुकूल और उसके वश में अल्लाह ही ने बनाया हैं।

3. धरती और समुद्रो मे जितने भी जीवधारी है, मनुष्य शरीर, मस्तिष्क, और आध्यात्म के हर पहलू से, और क्षमता व सामथ्र्य के पहलू में भी उन सबसे श्रेष्ठ हैं। कुरआन में अल्लाह ने एक जगह फरमाया, ‘‘हमने इन्सान को सर्वोत्तम संरचना के साथ बनाया।’’)  (कुरआन, 95:4)

ऐ आदम की सन्तान, क्या मैने तुम्हें आदेश न दिया था कि शैतान की बन्दगी न करना, वह तुम्हारा खुला दुश्मन हैं। और मेरी ही बन्दगी करना, यही सीधा मार्ग है? मगर फिर भी तुममें से एक बड़े गिरोह को उस (शैतान) ने पथ-भ्रष्ट कर दिया। क्या तुम बुद्धि नहीं रखते थे? (कुरआन, 36:60-62)

(1. देखें-कुरआन 2:168, 208; 6:142; 7:22, 12:5; 28:15; 35:6; 36:60; 43:62; 170:53)




‘‘    ऐ इन्सान...’’


ऐ इन्सान, किस चीज़ ने तुझे अपने उस उदार रब के प्रति धोखे मे डाल दिया जिसने तुझे पैदा किया, तुझे नख-शिख से दुरूस्त किया, तुझे सन्तुलित बनाया, और जिस रूप में चाहा, तुझे जोड़ कर तैयार किया? हरगिज नही बल्कि (वास्तविक बात यह हैं कि) तुम लोग (’पुरस्कार’ या ‘यातना’ के रूप में परलोक मे मिलनेवाले) बदला को झुठलाते हो, हालांकि तुम पर (हर क्षण) निगरानी करनेवाले (फरिस्ते) नियुक्त हैं, ऐसे प्रतिष्ठावान लिपिक जो तुम्हारे हर कर्म को जानते हैं।
(कुरआन, 82:6-12)

(1. अर्थात नहीं! कोर्इ बुद्धिसंगत कारण इस धोखे मे पड़ने का बिल्कुल नही है।

2.    अर्थात वास्तव में जिस बात ने तुम लोगो को धोखे में डाला हैं वह कोर्इ बुद्धिसंगत तर्क व प्रमाण नही है, बल्कि सिर्फ तुम्हारा यह मूर्खतापूर्ण विचार है कि दुनिया के इस कर्मक्षेत्र के बाद, बदला पाने का कोर्इ स्थल नही हैं। इसी गलत और निराधार गुमान ने तुम्हें अल्लाह से गाफिल, उसके न्याय से निर्भय व निश्चित, तथा अपने नैतिक व्यवहार व नीति में गैरजिम्मेदार बना दिया है।
3. जो इन्सान के हर छोटे-बड़े, अच्छे या बुरे कर्म को रिकार्ड करते रहते हैं चाहे वह अंधेरे में किया गया हो या उजाले में, चाहे एकांत में किया गया हो, चाहे किसी की उपस्थिति में। इसी रिकार्ड (कर्मपत्र) को आखिरत में देखकर इन्सान भौचक्का रह जाएगा और जो कुछ कहेगा कुरआन उसे बयान करता हैं (18:49)। इस रिकार्ड के बारे मे भी कुरआन बयान करता हैं (50:18; 8:49; 13:10))।

    (प्रलय अर्थात कियामत के दिन) जब जमीन फैला दी जाएगी और जो कुछ उसके भीतर हैं उसे बाहर फेंक कर खाली हो जाएगी और अपने रब के आदेश का पालन करेगी और उसके लिए हक यही हैं (कि उसका पालन करे)। ऐ इन्सान, तू जबरदस्ती खिंचते हुए अपने रब की ओर चला जा रहा हैं और उससे मिलनेवाला हैं। (कुरआन, 84:3-6)

1-    अर्थात, समुद्र और दरिया पाट दिए, जाएंगे, पहाड़ चूर्ण-विचूर्ण करके बिखेर दिए जाएंगे (69:14, 70:9; 73:14; 77:10; 101:5) और जमीन की सारी उंच-नीच बराबर करके एक समतल मैदान बना दिया जाएगा। (यह काम अल्लाह के लिए भी मुश्किल न होगा। वह तो बस यह कहता हैं ‘हो जा’ और वह काम हो जाता हैं।)    
(कुरआन, 16:40; 19:35; 36:82)
2-    अर्थात जितने मरे हुए इन्सान किसी भी रूप में उसके अन्दर समाहित होंगे सबकों वह बाहर निकाल डालेगी और इसी तरह उनके कर्मो के जो प्रमाण किसी भी रूप में उसके मौजूद होंगे उन्हें भी। कोर्इ चीज भी उसमें छिपी और दबी न रह जाएगी।

    इन्सान का हाल यह हैं कि जब हम उसे अपनी दयालुता व कृपा का मजा देते हैं तो उस पर फूल जाता हैं और अगर उसके अपने हाथों का किया-धरा किसी मुसीबत के रूप में उस पर उलट पड़ता हैं तो वह बड़ा कृतध्न और नाशुक्रा बन जाता हैं। 
(कुरआन, 42:48)
1.अर्थात र्इश्वर का कृतज्ञ व आभारी, शुक्रगुजार बनने के बजाय घमंड एवं अहंकार से फूलने, ऐंठने और शेखी बघारने लगता हैं और कहता हैं कि यह उपलब्धि तो मेरे अपने सामथ्र्य, गुण, मेहनत, कुशलता, निपुणता, क्षमता और शक्ति का परिणाम हैं (र्इश्वर की इसमें क्या भूमिका?।)

हमने इन्सान को ताकीद की कि वह अपने मां-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करे। उसकी मां ने कष्ट उठाकर उसे पेट में रखा और कष्ट उठाकर ही उसे जन्म दिया, और उसके गर्भ-धारण तथा दूध छुड़ाने में तीस माह लग गए।.....(कुरआन, 46:15)

अत्यन्त मेहरबान (अल्लाह) ने इस कुरआन की शिक्षा दी। उसी ने इन्सान को पैदा किया और उसे बोलना सिखाया। (कुरआन, 55:1-4)

    क्या इन्सान यह समझ रहा हैं कि हम उसकी हड्डियों को एकत्र न कर सकेंगे? क्यो नही! हम तो उसकी उंगलियों की पोर-पोर तक को ठीक बना देने का सामथ्र्य रखते हैं। (कुरआन, 75:3-4)

(1. कुरआन के अवतरण-काल मे जब आखिरत के पुनरूज्जीवन का आहान किया जाता तो इन्कार करनेवाले यह कहते (और आज भी यही कहते) है कि शरीर का मांस है, हड्डियॉ भी सड़-गलकर समाप्त हो जाएंगे, तब भला यह कैसे संभव होगा कि हम फिर से जीवित कर दिए जाएंगे।
3-    अर्थात हमारे सामथ्र्य मे हैं कि हड्डियों को मात्र एकत्र ही न करे बल्कि एक-एक जोड़ और उंगलियां का पोर-पोर भी पुन: पहले ही की तरह बना दें  (और हम ऐसा ही करके रहेंगे।) जो लोग र्इश्वर को सर्व-सासथ्र्य (Omnipotent) मानते और देखते हैं, उनके पास अल्लाह की इस क्षमता व सामाथ्र्य में शक या इन्कार की कोर्इ गुंजाइश नही हैं, हां हठधर्मी की बात और हैं, लेकिन बुद्धि-विवके रखनेवाले मनुष्य को हठधर्म नही ं होना चाहिए।)



    (इन्सान) पूछता है, ‘‘आखिर कब आना हैं वह कियामत का दिन ?’’तो (इन्सान को मालूम हो कि) जब (वह दिन आएगा तब) दीदे पथरा जाएंगे और चांद प्रकाशहीन हो जाएगा और चांद-सूरज मिलाकर एक कर दिए जाएंगे। उस समय यही इन्साफ कहेगा,
‘‘कहां भागकर जाउं?’’हरगिज नही (भागने की, और) पनाह व शरण लेने की कोर्इ जगह न होगी, उस दिन तेरे रब ही के सामने जाकर ठहरना होगा। उस दिन इन्सान को उसका सब अगला-पिछला किया-कराया बजा दिया जाएगा। (कुरआन, 75:6-13)

(1. ज्ञान और जानकारी के लिए यह प्रश्न नही करता है, बल्कि इन्कार और व्यंग्य के तौर पर।)

क्या इन्सान ने यह समझ रखा हैं कि वह यू ही आजाद छोड़ दिया जाएगा? क्या वह एक-तुच्छ पानी का वीर्य न था जो (मां के गर्भाशय में) टपकाया जाता है? फिर वह एक लोथड़ा बना, फिर अल्लाह ने उसका शरीर बनाया और उसके अंग ठीक किए, फिर उससे मर्द और औरते की दो किस्में बनार्इ। क्या उस (अल्लाह) को इसका सामथ्र्य नही हैं कि मरनेवालों को फिर से जिन्दा कर दें। (कुरआन, 75:36)

(1. अर्थात उसे, इस जीवन के कर्मो का लेखा-जोखा देने के लिए उत्तरदायी बनाकर, इस जीवन के बाद पकड़ा न जाएगा? यह तो सामान्य बुद्धि और साधारण तर्क का तथा इन्साफ का तकाजा हैं-और न्याय व इन्साफ का तकाजा, अल्लाह से बेहतर और कौन पूरा कर सकता है-कि हर पापी, दुष्कर्मी, अत्याचारो को आजाद न छोड़ दिया जाए बल्कि उसे पकड़ा जाए और उसके अपराध के अनुकूल सजा दी जाए, और नेक, र्इमानदार, सत्कर्मी व र्इशपरायण लोगो को पुरस्कार व इनाम से नवाजा जाए। परलोक में जहन्नम (नरक) और जन्नत (स्वर्ग) का र्इश्वरीय वादा इसी लिए हैं।)

फिटकार हो (उस) इन्सान पर जो ‘सत्य’ का इन्कार करनेवाला हैं। किस चीज से अल्लाह ने उसे पैदा किया? वीर्य की एक बूंद से अल्लाह ने उसे पैदा किया, फिर उसका भाग्य नियत किया; फिर उसके लिए जीवन-पथ आसान किया; फिर उसे मौत दी और क्रब में पहु    चाया। फिर वह जब चाहे उसे दोबारा उठा खड़ा करें। (कुरआन, 80:17-22)

Author Name: मुहम्मद जैनुल-आबिदीन मंसूरी