मुर्दा जलाना उचित है या दफन करना?

मुसलमानों के मुर्दा दफन करने को अवैज्ञानिक कहा जाता हैं, किन्तु मुर्दे को जलाने से दफनाना अधिक वैज्ञानिक तथा बुद्धिसंगत हैं। र्इसार्इ, मुसलमान और यहूदी दफन-पद्धति अपनाते हैं और हिन्दू, बौद्ध और सिख अपने मुर्दो को जलाते हैं। पूरी संसार की आबादी के बहुसंख्यक अपने मुर्दो के लिए दफन-पद्धति (Burial) अपनाए हुए हैं। विज्ञान प्रमुख और प्रभुत्व वाले यूरोप और अमेरिका मे जब दफन पद्धति प्रचलित है, तो यह कहना कहां तक उचित हैं कि इस पद्धति (Cremation) से वायु और जल प्रदूषण होता हैं। शव के जलने से बचे अंग को जल में फेंक देने से जल दूषित होता हैं। अधिकतर शव अधजला ही रहता है। इस मंहगार्इ के युग में हिन्दू पद्धति का शवदाह असम्भव हैं। घी, चन्दन, अगर और अन्य सुगन्धित पदार्थो का प्रयोग अब दाह क्रिया मे सम्भव नहीं। डाक्टरों की रिपोर्ट है हिन्दू सन्यासियों के लिए समाधि प्रथा क्यों अवैज्ञानिक नही हैं? समाधि और दफन एक ही हैं। हिन्दुओं की दाह-पद्धति बड़ी व्ययशील हैं। दफन-पद्धति सरल, कम खर्चीली, सार्वदेशिक और सर्वग्राहा हैं। यह पद्धति उत्तरी धु्रव तक के लिए सरल पद्धति हैं। ठण्डवासी कैसे हिन्दू पद्धति से अपने मुर्दो को जला सकते हैं। इतिहास के अनुसार मुर्दो का गाड़ना मूल पद्धति है।

Author Name: इस्लाम एक स्वयं सिद्ध र्इश्वरीय जीवन व्यवस्था:राजेन्द्र नारायण लाल