इस्लाम की जीवन व्यवस्था

इस्लाम की जीवन व्यवस्था

मानव के अन्दर नैतिकता की भावना एक स्वाभाविक भावना है जो कुछ गुणों को पसन्द और कुछ दूसरे गुणों को नापसन्द करती है। यह भावना व्यक्तिगत रूप से लोगो में भले ही थोड़ी या अधिक हो किन्तु सामूहिक रूप से सदैव मानव-चेतना ने नैतिकता के कुछ मूल्यों को समान रूप से अच्छार्इ और कुछ को बुरार्इ की संज्ञा दी हैं। सत्य, न्याय, वचन पालन और अमानत को सदा ही मानवीय नैतिक सीमाओं में प्रशंसनीय माना गया हैं और कभी कोर्इ ऐसा युग नही बीता जब झूठ, जुल्म, वचन भंग और खियानत को पसन्द किया गया हो। हमदर्दी, दयाभाव, दानशीलता और उदारता को सदैव सराहा गया तथा स्वार्थपरता, क्रूरता, कंजूसी और संकीर्णता को कभी आदर योग्य स्थान नही मिला। धैर्य, सहनशीलता, स्थैर्य, गम्भीरता, दृढ़संकल्पता व बहादुरी वे गुण हैं जो सदा से प्रशंसनीय रहे है।


इसके विपरीत धैर्यहीनता, श्रुद्रता, विचार की अस्थिरता, निरूत्साह और कायरता पर कभी भी श्र्रद्धा-सुमन नही बरसाएं गए। आत्मसंयम, स्वाभिमान, शिष्टता और मिलनसारी की गणना सदैव उत्तम गुणों में ही होती रही और कभी ऐसा नही हुआ कि भोग-विलास, ओछापन और अशिष्टता ने नैतिक गुणों की सूची में कोर्इ जगह पार्इ हो। कर्तव्यपरायणता, विश्वसनीयता, तत्परता एवं उत्तरदायित्व की भावना का सदा सम्मान किया गया तथा कर्तव्य विमुख, धोखाबाज, कामचोर तथा गैर जिम्मेदार लोगो को कभी अच्छी नजर से नही देखा गया। इसी प्रकार सामूहिक जीवन के सदगुणों व दुर्गुणों के मामले मे भी मानवता का फैसला एक जैसा रहा हैं। आदर की दृष्टि से वही समाज देखा गया हैं जिसमें अनुशासन और व्यवस्था हो, आपसी सहयोग तथा सहकारिता हो, आपसी प्रेमभाव तथा हितचिन्तन हो, सामूहिक न्याय व सामाजिक समानता हो। आपसी फूट, बिखराव, अव्यवस्था, अनुशासनहीनता, मतभेद, परस्पर, द्वेषभाव, अत्याचार और असमानता की गणना सामूहिक जीवन के प्रशंसनीय लक्षणों मे कभी भी नही की गर्इ। ऐसा ही मामला चरित्र की अच्छार्इ और बुरार्इ का भी हैं। चोरी, व्यभिचार, हत्या, डकैती, धोखाधड़ी और धूसखोरी कभी सत्कर्म नही माने गए। अभद्र भाषण, उत्पीड़न, पीठ पीछे बुरार्इ, चुगलखोरी, र्इष्र्या, दोषारोपण तथा उपद्रव फैलाने को कभी ‘पुण्य’ नही समझा गया। मक्कार, घमण्डी, आडम्बरवादी, कपटाचारी, हठधर्म, और लोभी व्यक्ति कभी भले लोगो में नही गिने गए। इसके विपरीत मां-बाप की सेवा, संबंधियों की सहायता, पड़ोसियों से अच्छा व्यवहार, मित्रों से हमदर्दी, निर्बलो की हिमायत, अनाथो और बेसहारो की देखरेख, रोगियो की सेवा तथा पीड़ितो की मदद सदैव नेकी समझी गर्इ है। स्वच्छ चरित्र वाला मधुर भाषी, विनम्र भाव व्यक्ति और सब की भलार्इ चाहनेवाले लोग सदा आदरणीय रहे। मानवता उन्ही को अपना उत्तम अंश मानती रही हैं जो सच्चे और शुभ-चिन्तक हो, जिनपर हर मामले मे भरोसा किया जा सके, जिनका बाहर और भीतर एक सामान हो, किसी कथनी, करनी में समानता हो, जो अपने हितों की प्राप्ति में संतोष करनेवाले और दूसरों के अधिकारों और हितो को देने में उदार हृदय हो, शान्तिपूर्वक रहे और दूसरों को शान्ति प्रदान करे, जिनके व्यक्तित्व से प्रत्येक को ‘भलार्इ’ की आशा हो और किसी को बुरार्इ की आशंका न हो। इससे मालूम हुआ कि मानवीय नैतिकताएं वास्तव में ऐसी सर्वमान्य वास्तविकताएं हैं जिन्हे सभी लोग जानते हैं और सदैव जानते चले आ रहे हैं। अच्छार्इ और बुरार्इ कोर्इ ढकी-छिपी चीजे नही हैं कि उन्हे कही से ढूॅढकर निकालने की आवश्यकता हो। वे तो मानवता की चिरपरिचित चीजे है जिनकी चेतना मानव की प्रकृति में समाहित कर दी गर्इ हैं। यही कारण हैं कि कुरआन अपनी भाषा में नेकी और भलार्इ को ‘मारूफ’ (जानी-पहचानी हुर्इ चीज़) और बुरार्इ को ‘मुनकर’ (मानव की प्रकृति जिसका इनकार करे) के शब्दों से अभिहित करता हैं।
अर्थात भलार्इ और नेकी वह चीज हैं जिसे सभी लोग भला जानते हैं और ‘मुनकर’ वह हैं जिसे कोर्इ अच्छार्इ और भलार्इ के रूप में नही जानता। इसी वास्तविकता का कुरआन दूसरे शब्दों में इस प्रकार वर्णन करता हैं:

इस्लाम का जवाब यह हैं कि इस सृष्टि का स्वामी ‘र्इश्वर’ हैं और वह एक ही स्वामी हैं। उसी ने इस सृष्टि को पैदा किया। वही इसका एकमात्र प्रभु, शासक और पालनहार हैं। उसी के आदेशानुपालन के कारण यह सारी व्यवस्था चल रही हैं। वह तत्वदश्र्ाी, सर्वशक्तिमान हैं, प्रत्यक्ष और परोक्ष का जानने वाला हैं। सभी दोषो, भूलों, निर्बलताओं तथा कमियों से मुक्त हैं। उनकी व्यवस्था मे लोग लपेट या टेढ़ापन बिलकुल नही हैं। मनुष्य उसका जन्मजात बन्दा (दास) हैं। उसका कार्य यही हैं कि वह अपने स्रष्टा की बन्दगी (गुलामी) और आज्ञापालन करें।

उसके जीवन का लक्ष्य र्इश्वर के प्रति समर्पण और आज्ञापालन हैं जिनकी पद्धति निर्धारित करना मनुष्य का अपना काम नही बल्कि उस र्इश्वर का काम है जिसका वह दास हैं। र्इश्वर ने उसके मार्गदर्शन हेतु अपने दूत (पैगम्बर) भेजे हैं और ग्रन्थ उतारे है। मनुष्य का कर्तव्य है कि अपनी जीवन-व्यवस्था इसी र्इश्वरीय मार्गदर्शन के स्रोत से प्राप्त करें। मनुष्य अपने सभी कार्यकलापों के लिए र्इश्वर के सामने उत्तरदायी हैं और इस उत्तरदयित्व के सम्बन्ध में उसे इस लोग में नही बल्कि परलोक मे हिसाब देना हैं। वर्तमान जीवन तो वास्तव मे परीक्षा की अवधि है। इसलिए यहां मनुष्य के सम्पूर्ण प्रयास इस लक्ष्य की ओर केन्द्रित होने चाहिए कि वह आखिरत की जवाब देही में अपने प्रभु के समक्ष सफल हो जाए। परलोक की इस परीक्षा मे मनुष्य अपने पूरे अस्तित्व के साथ सम्मिलित हैं। उसकी सभी शक्तियों एवं योग्यताओं की परीक्षा हैं। पूरे विश्व की जो चीजे भी मनुष्य के सम्पर्क में आती हैं उसके बारे में निष्पक्ष जांच होती हैं कि मनुष्य ने उन चीजों के साथ कैसा मामला किया और यह जॉच करनेवाली वह सत्ता है जिसने धरती के कण-कण पर, हवा और पानी, विश्वात्मक तरंगो पर और खुद इन्सान के दिल व दिमाग और हाथ-पैर पर, उसकी गतिविधियों का ही नही बल्कि उसके विचारों तथा इरादों तक का ठीक-ठीक उपलब्ध कर रखा है।

यह हैं वह उत्तर जो इस्लाम ने जीवन के मूलभूत प्रश्नों का दिया हैं। सृष्टि और मनुष्य के संबंध मे उक्त अवधारणा उस वास्तविक और परम कल्याण के लक्ष्य को निर्धारित कर देती हैं जिसे प्राप्त करने का भरपूर प्रयास मनुष्य को करना चाहिए, और वह हैं र्इश्वर की प्रसन्नता। यही वह मानदण्ड हैं जिसपर इस्लाम की नैतिक व्यवस्था में किसी कार्य शैली को परखकर यह निर्णय किया जाता हैं कि वह ‘भला’ हैं या ‘बुरा’। इसके निर्धारिण से नैतिकता को वह धुरी मिल जाती हैं जिसके चारों ओर सम्पूर्ण नैतिक जीवन धूमता हैं और उसकी स्थिति लंगर रहित जहाज की-सी नही रहती कि हवा के झोंके और समुन्द्र की लहरों के थपेड़े उसे इधर-उधर दौड़ते फिरे। यह निर्धारण एक केन्द्रिय उद्देश्य सामने रखता हैं जिसके परिणामस्वरूप जीवन मे सभी नैतिक गुणों की उचित सीमाएं उचित स्थान और उपयुक्त व्यावहारिक रूप निश्चित हो जाते हैं। हमे वह स्थायी मूल्य मिल जाते हैं जो परिवर्तनशील परिस्थितियों मे भी अपनी जगह अटल रह सकें। फिर सबसे बड़ी बात यह हैं कि र्इश प्रसन्नता का लक्ष्य प्राप्त कर लेने से नैतिकता को एक उच्चतम परिणाम मिल जाता हैं जिसके फलस्वरूप नैतिक उत्थान की सम्भावनाएं
असीम हो जाती हैं और किसी चरण में भी स्वार्थपरता का प्रदूषण उसे दूषित नही कर सकता।

मापदण्ड प्रदान करने के साथ इस्लाम अपने इसी विश्व तथा मानव अवधारणा पर आधारित नैतिक सौन्दर्य तथा असौन्दर्य के ज्ञान का एक स्थायी स्रोत भी हमे प्रदान करता हैं। उसने हमारे नैतिकता के ज्ञान को मात्र हमारी बृद्धि या इच्छाओं या अनुभवों अथवा मानवीय ज्ञान के भरोसे नही छोड़ा हैं कि यदि से चीजें अपने निर्णय बदल दे तो हमारे नैतिक सिद्धान्त भी बदल जाएं और उन्हे कोर्इ स्थायित्व न मिल सके, बल्कि इस्लाम ने हमे दो निश्चित स्रोत (र्इशग्रन्थ और र्इशदूत का आदर्श) प्रदान किए हैं जिससे हमे हर युग तथा प्रत्येक परिस्थिति में नैतिक निर्देश प्राप्त होते हैं। ये निर्देश ऐसे व्यापक हैं कि घरेलू जीवन के छोटे से छोटे मामलात से लेकर बड़ी-बड़ी अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक समस्याओं तक जीवन के हर पक्ष और प्रत्येक विभाग में वे हमारा मार्गदर्शन करते हैं। उनके अन्दर जीवन संबंधी विषयों पर नैतिक सिद्धान्तों का वह व्यापक निरूपण (Widest Application) पाया जाता हैं जो किसी स्तर पर किसी अन्य साधन की आवश्यकता ही प्रतीत नही होने देता।

सृष्टि व मानव सम्बन्धी इस्लाम की इसी अवधारणा में वह क्रियान्वयन शक्ति (Sanction) भी मौजूद हैं जिसका होना नैतिक कानून को लागू करने के लिए जरूरी हैं और वह हैं र्इशभय, परलोक की पूछताछ का डर और शाश्वत भविष्य की असफलता  का खतरा । यद्यपि इस्लाम एक ऐसी शक्ति और जनमत (Public Opinion) भी तैयार करना चाहता हैं जो सामाजिक जीवन में व्यक्तियों एवं समुदायों को नैतिक नियमों की पाबन्दी पर विवश करने वाले हो और एक ऐसी राजनैतिक व्यवस्था भी बनाना चाहता हैं जिसके द्वारा नैतिकता संबंधी आचार संहिता बलपूर्वक लागू करे परन्तु इसमे दबाव की अपेक्षा आन्तरिक प्रेरणा अधिक शक्तिशाली हो जो र्इश्वर और परलोक के विचार पर आधारित हो। नैतिकता संबंधी निर्देश देने से पहले इस्लाम आदमी के दिल में यह बात बिठाता हैं कि तेरा मामला वास्तव में उसे अल्लाह के साथ है जो हर समय हर जगह तुझे देख रहा हैं। तू दुनिया भर से छिप सकता हैं मगर उससे नही छिप सकता। दुनिया भर को धोखा दें सकता है मगर उसे धोखा नही दे सकता। दुनिया भर से भाग सकता हैं मगर उसकी पकड़ से बचकर कही नही जा सकता। दुनिया केवल तेरा बाहरी रूप देख सकती है मगर र्इश्वर मेरी नीयत तथा तेरे इरादों तक को देख लेता हैं। दुनिया के थोड़े से जीवन मे तू जो चाहे कर ले मगर तुझे अन्तत: मरकर उसकी अदालत मे उपस्थित होना हैं जहां वकालत, रिश्वत , सिफारिश, झूठी गवाही, धोखा कुछ भी न चल सकेगा और तेरे भविष्य का निष्पक्ष फैसला हो जाएगा। इस विश्वास के द्वारा इस्लाम मानो हर व्यक्ति के दिल में पुलिस की एक चौकी स्थापित कर देता है जो अन्दर से उसको आदेश पालन पर विवश करती हैं। चाहे बाहर उन आदेशों की पाबन्दी करानेवाली पुलिस, अदालत और जेल मौजूद हो या न हो। इस्लाम के नैतिक कानून के पीछे यहां वास्तविक शक्ति है जो उसे लागू कराती हैं। जनमत और शासन का समर्थन भी इसे प्राप्त हो तो कहना ही क्या ! वरना मात्र यही र्इमान और विश्वास मुसलमानों को व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से सीधा चला सकता हैं शर्त यही हैं कि सच्चा र्इमान दिलों मे बैठा हुआ हों।





इस्लाम की राजनीतिक व्यवस्था

इस्लामी राजनीतिक व्यवस्था की बुनियाद तीन सिद्धान्तों पर रखी गर्इ है- तौहीद, रिसालत और
खिलाफत । इन सिद्धान्तो को भली-भांति समझे बिना इस्लामी राजनीति की विस्तुत व्यवस्था को समझना कठिन है। इसलिए सर्वप्रथम इन्हीं की संक्षिप्त व्याख्या प्रस्तुत हैं।

तौहीद (एकेश्वरवाद) का अर्थ यह हैं कि र्इश्वर इस संसार और इसमें बसने वालों का स्रष्टा, पालक और स्वामी हैं। सत्ता और शासन उसी का हैं। वही हुक्म देने और मना करने का हक रखता हैं। आज्ञापालन तथा पूर्णसमर्पण केवल उसी के लिए हैं। हमारा यह अस्तित्व, हमारे ये शारीरिक अंग एवं शक्तियां जिनसे हम काम लेते है, हमारे उपयोग की वस्तुएं तथा उनसे संबंधित हमारे अधिकार जो हमे संसार की सभी चीजों पर प्राप्त हैं और स्वंय वे चीजें जिन पर हमारा अधिकार हैं, उनमें से कोर्इ चीज भी न हमारी पैदा की हुर्इ है और न हमने उसे प्राप्त किया हैं, सबकी र्इश्वर द्वारा ही पैदा की गर्इ हैं और उसी हमे सब कुछ प्रदान किए हैं, जिसमें अन्य कोर्इ हस्ती भागीदार नही हैं। इसलिए अपने अस्तित्व का उद्देश्य और अपनी क्षमताओं का प्रयोजन और अपने अधिकारों का सीमा-निर्धारण करना न तो हमारा अपना कार्य हैं और न किसी अन्य व्यक्ति को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार हैं, यह केवल उस र्इश्वर का कार्य हैं जिसने हमको इन शक्तियों तथा अधिकारों के साथ पैदा किया और दुनिया की बहुत-सी चीजे हमारे अधिकार में दी हैं। यह सिद्धान्त मानवीय प्रभुसत्ता (Sovereignty) को पूर्ण रूपेण नकार देता हैं। एक इन्सान हो या एक परिवार, एक वर्ग हो या एक समुदाय अथवा पूरी दुनिया के लोग हो किसी को प्रभुसत्ता का अधिकार नहीं। हाकिम (सम्प्रभु) केवल अल्लाह हैं, उसी का हुक्म ‘कानून’ हैं।
रिसालत (र्इशदूतत्व) उस माध्यम का नाम है ंजिसके द्वारा र्इश्वरीय विधान मानव तक पहुंचता हैं। इस माध्यम से हमे दो चीजें मिलती हैं- ‘एक किताब’, जिसमें स्वयं र्इश्वर ने अपना कानून बताया हैं; दूसरे किताब की प्रामणिक एवं विश्वसनीय व्याख्या जो र्इशदूत ने र्इश्वर के प्रतिनिधि के रूप में अपनी कथनी और करनी के द्वारा प्रस्तुत की हैं। र्इशग्रन्थ मे उन सभी नियमों तथा सिद्धान्तों का उल्लेख कर दिया गया हैं जिन पर मानवीय जीवन-व्यवस्था आधारित होनी चाहिए और र्इशदूत (रसूल) ने किताब के अनुकूल व्यावहारिक रूप में एक जीवन-व्यवस्था बनाकर, चलाकर और उसके आवश्यक विवरण बताकर हमारे लिए एक नमूना स्थापित कर दिया हैं। इन्ही दो चीजो के समूह का नाम इस्लामी पारिभाषिक शब्दावली में ‘शरीअत’ हैं और यही वह आधारभूत संविधान हैं जिसपर इस्लामी राज्य की स्थापना होती हैं।

अब ‘खिलाफत’ को लीजिए। यह शब्द अरबी भाषा में प्रतिनिधित्व के लिए बोला जाता हैं। इस्लामी दृष्टिकोण से दुनिया में इन्सान की हैसियत यह हैं कि वह धरती पर अल्लाह का प्रतिनिधि हैं अर्थात उसके राज्य में उसके दिए अधिकारों का प्रयोग करता हैं। आप जब किसी व्यक्ति को अपनी सम्पत्ति का प्रबन्ध सौंपते हैं तो निश्चित रूप से आपके सामने चार बाते होती हैं-एक यह कि सम्पत्ति के वास्तविक स्वामी आप स्वंय हैं न कि वह प्रबन्धक व्यक्ति; दूसरे यह कि उस व्यक्ति को आपकी आयदाद मे आपके निर्देशानुसार कार्य करना चाहिए; तीसरे यह कि उसे अपने अधिकारों को आपके द्वारा निर्धारित सीमाओं के अन्दर ही प्रयोग करना चाहिए; चौथे यह कि आपकी जायदाद में उसे आपकी इच्छा और मन्तव्य को पूरा करना होगा न कि अपना। ये चार शर्ते प्रतिनिधत्व की अवधारणा में इस प्रकार शामिल है कि नायब (प्रतिनिधि) इन चार शर्तो को पूरा न करे तो आप कहेंगे कि प्रतिनिधित्व की सीमाओं को लांघ गया हैं और उसने वह अनुबंध तोड़ दिया है जो प्रतिनिधित्व के मूल अर्थ में सन्निहित था। ठीक इन्ही अर्थो में इस्लाम इन्सान को खुदा का खलीफा ठहराता है और इस खिलाफत की अवधारणा। में यही चारो शर्ते सम्मिलित हैं। इस राजनीतिक विचारधारा के आधार पर जो राज्य बनेगा वह वास्तव में, र्इश्वर की संप्रभुता (Sovereignty) के अंतर्गत इन्सानी खिलाफत होगी, जिसे ख़्ाुदा के मुल्क (राज्य) में उसके निर्देशानुसार निर्धारित सीमाओ के भीतर कार्य करके उसकी इच्छा पूरी करनी होगी।

खिलाफत की इस व्याख्या के संबंध में इतनी बात और समझ लीजिए कि इस्लाम की राजैतिक विचारधारा किसी व्यक्ति या परिवार या वर्ग को खलीफा घोषित नही करती बल्कि पूरे समाज को खिलाफत (प्रतिनिधित्व) का पद सौंपती हैं जो तौहीद (एकेश्वरवाद) और रिसालत के आधारभूत सिद्धान्तो को स्वीकार करके (प्रतिनिधित्व की शर्ते पूरी करने को तैयार हो। ऐसा समाज सामूहिक रूप से खिलाफत के योग्य हैं और यह खिलाफत उसके प्रत्येक सदस्य तक पहुंचती हैं। यही वह बिन्दू हैं जहां इस्लाम में लोकतन्त्र की शुरूआत होती हैं। इस्लामी समाज का प्रत्येक व्यक्ति खिलाफत के अधिकार रखता हैं। ये अधिकार सबको समान रूप से प्राप्त हैं जिसके संबंध में किसी को दूसरे पर वरीयता नही दी जा सकती और न ही किसी को इनसे वंचित किया जा सकता हैं। राज्य का प्रशासन चलाने के लिए जो हूकूमत बनार्इ जाएगी वह इन्ही व्यक्तियों की सहमति से बनेगी। यही लोग अपने प्रतिनिधित्व का एक भाग हूकूमत को सौंपेंगे। उसके बनने में उनकी राय शामिल होगी और उनके परामर्श ही से वह चलेगी। जो उन लोगो का विश्वास प्राप्त करेगा वही उनकी ओर से खिलाफत के कर्तव्य निभाएगा और जो उनका विश्वास खो देगा उसे सत्ता के पद से हटना पड़ेगा। इस दृष्टि से इस्लामी लोकतन्त्र एक पूर्ण लोकतन्त्र हैं, उतना ही पूर्ण जितना कोर्इ लोकतन्त्र हो सकता हैं। तथापि जो चीज इस्लामी लोकतन्त्र को पाश्तन्त्र लोकतन्त्र से अलग करती हैं वह यह हैं कि पश्चिम का राजनीतिक दृष्टिकोण जनता की प्रभुसत्ता (Sovereignty of people) को मानती हैं जबकि इस्लाम लोकतन्त्रीय खिलाफत को मानता हैं। वहां जनता स्वयं संप्रभु हैं और संप्रभुता र्इश्वर की हैं और जनता उसकी खलीफा और प्रतिनिधि हैं। वहां लोग अपने लिए खुद शरीअत (कानून) बनाते है, यहां उन्हे उस शरीअत (कानून) का अनुपालन करना पड़ता हैं जिसको र्इश्वर ने अपने दूत के माध्यम से दिया हैं। वहॉं हुकूमत काम जनता की इच्छा की पूर्ति करना हैं, यहां हुकूमत और उसके बनानेवाले सबका काम अल्लाह की इच्छा पूरी करना होता हैं। संक्षेप में पश्चिम लोकतन्त्र एक निरंकुश खुदार्इ हैं जो अपनी शक्तियों और अधिकारों को निर्बाध प्रयोग करती हैं। इसके विपरीत इस्लामी लोकतंत्र कानून के प्रति पूर्ण समर्पित है जो अपने अधिकारों को र्इश्वरीय निर्देशानुसार सीमाओं के भीतर ही इस्तेमाल करती हैं।







..............................................................................................................................................इस्लाम की सामाजिक व्यवस्था
                    इस्लाम की सामाजिक व्यवस्था की आधारशिला यह सिद्धान्त हैं कि दुनिया के सब इन्सान एक नस्ल के हैं। र्इश्वर ने सर्वप्रथम एक इन्सानी जोड़ा पैदा किया था, फिर उसी जोड़े से वे सारे पैदा कर दिए जो दुनिया में बसे हैं। आरम्भ मे इस जोड़े की सन्तान काफी समय तक एक ही समुदाय बनी रही । उनका धर्म, उनकी भाषा एक ही थी। उनके बीच कोर्इ भेद न था। मगर जैसे-जैसे उनकी संख्या बढ़ती गर्इ वे धरती पर फैलते गए और इस फैलाव के कारण स्वाभाविक रूप से विभिन्न नस्लों, समुदायों तथा वंशो मे विभक्त हो गए। उनकी भाषाएं अलग हो गर्इ, उनके पहनावे बदल गए और रहन-सहन के ढंग अलग हो गए। जगह-जगह की विविध जलवायु के कारण उनके रंगरूप और डील-डौल भी परिवर्तित हो गए । ये सब विविधताएं स्वाभाविक हैं जो वास्तविक के धरातल मे मौजूद हैं। इसलिए इस्लाम इनको एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार करता है, वह उनको मिटाना नही चाहता, बल्कि उनका यह लाभ मानता हैं कि मनुष्यों का आपसी परिचय और सहयोग इसी प्रकार से संभव हैं। परन्तु इन अन्तरों के कारण इन्सानों में भाषा, राष्ट्रीयता और वतन सम्बन्धी जो पक्षपात उत्पन्न हो गए हैं उन सबको इस्लाम अनुचित ठहराता है। इन्सान और इन्सान के बीच ऊंचा-नीच, अपने-पराए,
कुलीन और नीच सम्बन्धी जितने भेदभाव जन्म के आधार पर अपना लिए गए है, इस्लाम के निकट ये सब अज्ञानता की बाते हैं। वह सम्पूर्ण विश्व के इन्सानों से कहता हैं कि तुम सब एक मां एक बाप की संतान हो, अत: एक-दूसरे के भार्इ हो और इन्सान होने के नाते बराबर हो।

मानवता के इस दृष्टिकोण को अपनाने के पश्चात् इस्लाम कहता हैं कि इन्सानों के बीच वास्तविक अन्तर रंग, नस्ल, वतन और भाषा का नही, बल्कि विचार, नैतिक आचरण तथा सिद्धान्तों का हो सकता हैं। एक मां के दो बच्चे अपनी नस्ल की दृष्टि से चाहे एक हो परन्तु अगर उनके विचार और आचरण भिन्न-भिन्न है तो उनके जीवन-मार्ग अलग-अलग हो जाएंगे। इसके विपरीत पूर्व और पिश्चम के दूरस्थ छोरो पर बसने वाले दो मुख्य यद्यपि बाह रूप से एक दूसरे से कितने ही दूर हो, परन्तु यदि वे एक जैसे विचार रखते हैं और उनके आचरण एक दूसरे से मिलते है तो उनके जीवन का मार्ग एक होगा। इस अवधारणा के आधार पर इस्लाम संसार के सभी नस्ल, वतन, और कौम पर आधारित समाजो के विपरीत एक वैचारिक, नैतिक तथा सैद्धान्तिक समाज का निर्माण करता हैं, जिसमें इन्सानों का आपस में मिलने का आधार उनका जन्म नही बल्कि एक आस्था और एक आचार संहिता हैं। हर वह व्यक्ति जो र्इश्वर को अपना मालिक व पूज्य माने और पैगम्बरों द्वारा लार्इ हुर्इ शिक्षा और मार्गदर्शन को अपने जीवन का कानून मान ले, इस समाज मे शामिल हो सकता हैं, चाहे वह अफ्रीका का रहनेवाला हो या अमेरिका का, चाहे वह सामी नस्ल का हो या आर्य नस्ल का हो या, चाहे वह काला हो या गोरा, चाहे वह हिन्दी बोलता हो या अरबी । जो लोग भी इस समाज मे सम्मिलित होंगे उन सबके अधिकार तथा सामाजिक स्तर बराबर होंगे। किसी भी प्रकार के जातीय, कौमी या वर्गीय भेद उनके बीच न होंगें। कोर्इ उंचा या नीचा न होगा, कोर्इ छूत-छात उनमें न होगी और किसी का हाथ लगने से कोर्इ अपवित्र न होगा।

शादी-विवाह, खान-पान तथा मेल-जोल में उनके बीच किसी प्रकार की बाधाएं  न होगी। कोर्इ अपने जन्म अथवा पेशे के आधार पर तुच्छ या हीन न होगा। किसी की अपनी जाति या गोत्र के आधार पर कोर्इ विशेषाधिकार प्राप्त न हो सकेंगे। आदमी की श्रेष्ठता उसके गोत्र अथवा उसके धन के कारण न होगी बल्कि केवल इस कारण होगी कि उसका चरित्र अधिक उंचा हैं तथा वह दयालुता तथा र्इशभय में अन्य लोगो से बढ़ा हुआ हैं।

यह एक ऐसा समाज है जो जाति, रंग भाषा तथा भोगोलिक सीमाओं को तोड़कर धरती के प्रत्येक भाग में फैलसकता हैं तथा उसके आधार पर इन्सानों की एक अन्तराष्ट्रीय बिरादरी की स्थापना हो सकती हैं। जाति तथा देश के आधार पर बने समाजो में तो केवल वे लोग सम्मिलित हो सकते हैं जो किसी जाति या देश में जन्मे हो। इससे बाहर के व्यक्तियों पर प्रत्येक ऐसे समाज का द्वार बन्द होता हैं। परन्तु इस वैचारिक तथा सैद्धान्तिक समाज में हर वह व्यक्ति समान अधिकारों सहित सम्मिलित हो सकता हैं जो एक अकीदे (आस्था) तथा एक आचार संहिता को माने। रहे वे लोग जो इस अकीदे और नियम को न माने तो यह समाज उन्हे अपनी परिधि में नही लेता मगर इनसानी भार्इचारे का सम्बन्ध उनके साथ जोड़े रखने तथा मानवधिकार उन्हे देने के लिए तैयार है। स्पष्ट है कि अगर एक मां के दो बच्चों के विचारों में अन्तर हैं तो उनके जीने के ढंग भी निश्चित रूप से अलग होंगे, मगर इससे उनके भार्इ होने का रिश्ता समाप्त नही हो जाएगा।
ठीक इसी प्रकार मानव-जाति के दो गिरोह भी अगर आस्था तथा सिद्धान्त में अन्तर रखते हैं तो उनके समाज निश्चय ही अलग होगे मगर हर हाल में मानवता उनके बीच उभयनिष्ठा (Common) रहेगी। इस उभयनिष्ठ मानवता के आधार पर अधिक से अधिक जिन अधिकारों की कल्पना की जा सकती हैं वह सब इस्लामी समाज ने गैर इस्लामी समाजों के लिए स्वीकार किए हैं।
इस्लामी सामाजिक व्यवस्था की इन बुनियादों को समझ लेने के बाद आइए देखे कि  वे क्या सिद्धान्त और तरीके हैं जो इस्लाम ने इन्सानी मेल-मिलाप के विभिन्न रूपों के लिए बनाए हैं।






.............................................................................................................................................इस्लाम की आर्थिक व्यवस्था
                    इनसान के आर्थिक जीवन को इन्सान और सच्चार्इ पर बनाए रखने के लिए इस्लाम ने कुछ सिद्धान्त और सीमाएं निर्धारित कर दी हैं, ताकि धन की उत्पत्ति उपयोग और वितरण (Circulation) की सम्पूर्ण व्यवस्था उन्ही सीमा रेखाओं के अन्तर्गत चले जो उसके लिए खींच दी गर्इ हैं।

धनोपार्जन की विधियां और उसके वितरण के रूप क्या हो, इस्लाम की इस प्रश्न से कोर्इ रूचि नही हैं। ये चीजें तो विभिन्न युगो में सभ्यता के विकास के साथ-साथ बनती और बदलती रहती हैं। उनका निर्धारण मानव की परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार खुद ही हो जाता हैं। इस्लाम जो कुछ चाहता है वह यह हैं कि सभी युगो और परिस्थितियों में मानव की आर्थिक क्रियाएं जो रूप भी धारण करें उनमें ये सिद्धान्त स्थायी रूप से लागू रहे और उन निर्घारित प्रतिबन्दों का अनिवार्यत: पालन किया जाए।


इस्लामी दृष्टिकोण से धरती तथा उस पर स्थित सभी चीजे र्इश्वर ने मानव-जाति के लिए बनार्इ है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य का यह जन्मसिद्ध अधिकार हैं कि धरती से अपनी आजीविका प्राप्त करने का यत्न करें। इस अधिकार में सभी मानव समान रूप से भागीदार हैं, किसी को इस अधिकार से वंचित नही किया जा सकता और न किसी को इस सम्बन्ध में दूसरों की तुलना में प्राथमिकता ही प्राप्त हो सकती हैं। किसी व्यक्ति या जाति या वर्ग पर ऐसा कोर्इ वैधानिक प्रतिबन्ध नही लगाया जा सकता जिससे वह आर्थिक संसाधनों में से कुछ को इस्तेमाल करने का अधिकारी ही न रहे, अथवा कुछ पेशों का द्वार उसके लिए बन्द कर दिया जाए। इसी प्रकार ऐसे भेदभाव भी धार्मिक नियम के आधार पर नही बरते जा सकते जिनके आधार पर किसी आर्थिक संसाधन या आजीविका के साधन पर किसी विशेष वर्ग या जाति या परिवार का एकाधिकार स्थापित हो जाए। र्इश्वर की बनार्इ हुर्इ धरती पर उसके पैदा किए हुए संसाधनों में से अपना हिस्सा हासिल करने की कोशिश करना सब इन्सानों का समान अधिकार हैं। सभी को जीविकोपार्जन के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए।

प्रकृति की जिन नेमतों को उपयोगी बनाने में किसी के परिश्रम तथा योग्यता का प्रयोग न हो उन पर सभी लोगो को समान अधिकार प्राप्त हैं। प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त हैं कि उनसे अपनी आवश्यकतानुसार लाभान्वित हो। नदियों और झरनो का पानी, जंगल की लकड़ी , प्राकृतिक रूप से उगनेवाले पेड़ो के फल, स्वतन्त्ररूप से उगी घास और चारा हवा, पानी, मरूभूमि के जानवर, धरती की सतह पर खुली हुर्इ खाने आदि पर न तो किसी का एकाधिकार स्थापित हो सकता हैं और न ही ऐसे प्रतिबन्ध लगाए जा सकते हैं कि आम जनता कुछ भुगतान किए बिना उनसे अपनी आवश्यकताएं पूरी न कर सके। हां जो लोग व्यावसायिक उद्देश्य से बड़े पैमाने पर उनमें से किसी चीज को उपयोग में लाना चाहे तो उनपर टैक्स लगाया जा सकता हैं।

र्इश्वर ने जो चीजे इन्सान के लाभ के लिए बनार्इ हैं उन्हे बेकार डाल देना उचित नही हैं। या तो उनसे स्वंय लाभ उठाओं या फिर दूसरों को लाभ उठाने के लिए छोड़ दो। इसी सिद्धान्त के आधार पर कानून यह निर्णय करता है। कि कोर्इ व्यक्ति अपनी भूमि को तीन वर्ष से अधिक अवधि तक बेकार नही रख सकता। यदि वह उसको कृषि या भवन निर्माण अथवा किसी दूसरे प्रयोजन में न लाए तो तीन वर्ष बीत जाने के पश्चात वह परित्यक्त भूमि समझी जाएगी। अन्य कोर्इ व्यक्ति उसे अपने काम मे ले आए तो उसपर आपत्ति नही की जाएगी और इस्लामी प्रशासन को भी यह अधिकार होगा कि ऐसी भूमि किसी को आवंटित कर दे।



जो व्यक्ति सीधे प्रकृति के खजाने में से किसी चीज को लेकर अपने परिश्रम तथा अपनी योग्यता से उसको उपयोगी बनाए तो वह उस वस्तु का मालिक हैं। उदाहरणार्थ किसी बेकार पड़ी जमीन को जिसपर किसी का स्वामित्व साबित न हो, यदि कोर्इ व्यक्ति अपने अधिकार मे लेकर किसी लाभकारी कार्य में इस्तेमाल करने लगे तो उसे बेदखल नही किया जा सकता। इस्लामी दृष्टिकोण के अनुसार दुनिया में स्वामित्व सम्बन्धी सभी अधिकारों की शुरूआत इसी प्रकार हुर्इ हैं। पहले पहल जब पृथ्वी पर इन्सानी आबादी आरम्भ हुर्इ तो सभी चीजे सब लोगो के प्रयोग के लिए आम थी। फिर जिस व्यक्ति ने किसी आम चीज को अपने अधिकार मे लेकर किसी प्रकार उपयोगी बना लिया तो वह उसका मालिक हो गया। अर्थात उसे यह अधिकार प्राप्त हो गयाा कि वह उसे अपने लिए आरक्षित कर ले और दूसरे लोग यदि उसको प्रयोग करना चाहे तो उनसे बदले में धन प्राप्त करें। यह चीज मनुष्य के सारे आर्थिक मामलों की स्वाभाविक बुनियाद हैं और इस बुनियाद को यथा स्थिति बना रहना चाहिए।

इस्लाम केवल इतना ही नही चाहता कि सामाजिक जीवन मे यह आर्थिक दौड़ ़ खुली और निष्पक्ष हो बल्कि यह भी चाहता है कि इस मैदान में दौड़ने वाले एक दूसरे के लिए निर्दयी और निष्ठुर न हो, हमदर्द और मददगार हो। इस्लाम एक ओर तो अपनी नैतिक शिक्षा से लोगो में यह भावना उजागर करता हैं कि वे अपने दबे और पिछड़े भाइयों को सहारा दें तथा दूसरी ओर वह मांग करता हैं कि  सोसाइटी में एक स्थायी संस्था ऐसी मौजूद रहे जो अपंग लोगो की सहायता का जिम्मा ले। जो लोग आर्थिक दौड़ में भाग लेने योग्य न हो वे इस संस्था से अपना हिस्सा पाएं। जो लोग परिस्थिति और संयोगवंश इस दौड़ में गिर पड़े हो उन्हे यह संस्था उठाकर फिर चलने योग्य बनाए और जिन लोगो को संघर्ष में उतरने के लिए सहारे की आवश्यकता हो उन्हे इस संस्था से सहारा मिले। इस उद्देश्य के लिए इस्लाम ने कानून के आधार पर यह निश्चित किया हैं कि देश के धन की कुल जमा राशि तथा सम्पूर्ण व्यापारिक पूंजी पर ढार्इ प्रतिशत वार्षिक जकात (Poor Due) वसूल की जाएं। सभी कृषि-भूमि की उपज का पांच या दस प्रतिशत, कुछ खनिज पदार्थो की उपज का बीस प्रतिशत भाग वसूल किया जाए। पशुओं की एक निश्चित संख्या में से एक निश्चित अनुपात में वार्षिक जकात निकाली जाए और यह सम्पूर्ण धन निर्धनों, अनाथों तथा असम्पन्न लोगो की सहायतार्थ इस्तेमाल किया जाए। यह एक ऐसा ‘सामूहिक बीमा’ हैं जिसकी उपस्थिति मे ंइस्लामी सोसाइटी में कोर्इ व्यक्ति जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं से कभी वंचित नही रह सकता। कोर्इ श्रमिक कभी इतना मजबूर नही हो सकता कि भूखों मरने के डर से मजदूरी की वही शर्ते मान ले जो फैक्ट्री मालिक या जमीदार पेश कर रहा हैं। जकात की इस व्यवस्था की मौजूदगी में किसी व्यक्ति की शक्ति उस न्यूनतम स्तर से कभी नीचे नही गिर सकती जो आर्थिक दौड़ में भाग लेने के लिए आवश्यक हैं।

.............................................................................................................................................इस्लाम की आध्यात्मिक व्यवस्था
                    इस्लाम की आध्यात्मिक व्यवस्था क्या हैं और सम्पूर्ण जीवन-व्यवस्था से उसका क्या संबंध हैं? इस प्रश्न को समझने के लिए जरूरी हैं कि पहले हम आध्यात्म की इस्लामी अवधारणा तथा अन्य धर्मो और दार्शनिक प्रणालियों की अवधारणाओं के अन्तर को समझ ले। यह अन्तर स्पष्ट न होने के कारण अधिकतर ऐसा होता हैं कि इस्लाम की आध्यात्मिक व्यवस्था पर चर्चा करते हुए आदमी के दिमाग में बिना इरादे के वह अवधारणाएं धूमने लगती हैं जो प्राय: ‘रूहानियत’ या ‘अध्यात्म’ शब्द के साथ जुड़ गर्इ हैं। फिर इस उलझन में पड़कर आदमी के लिए यह समझना कठिन हो जाता हैं कि इस्लाम की यह आध्यात्मिक व्यवस्था किस प्रकार की हैं जो आत्मा के जाने-पहचाने क्षेत्र से निकलकर भौतिकता तथा शारीरिक क्षेत्र में दखल देती हैं और केवल दखल ही नही देती बल्कि उसपर शासन करना चाहती हैं।

दर्शन ओर धर्म की दुनिया में साधारणतया जो विचार पाया जाता हैं वह यह हैं कि आत्मा और शरीर एक दूसरे के प्रतिरोधी हैं, दोनो की दुनिया अलग-अलग हैं, दोनो की मांगे अलग बल्कि परस्पर विरोधी हैं। इन दोनो का विकास एक साथ संभव नही हैं। आत्मा के लिए शरीर और पदार्थ की दुनिया एक बन्दीगृह हैं।
सांसारिक जीवन के संबंध और आकर्षण वे हथकड़िया और बेड़ियां हैं जिनमें आत्मा जकड़ जाती हैं। दुनिया के कारोबार और क्रियाएं वह दलदल है। जिसमें फंसकर आत्मा की उड़ान समाप्त हो जाती हैं। इस सोच का अनिवार्यत: परिणाम यह हुआ कि आध्यात्मिकता तथा सांसारिकता के मार्ग एक दूसरे से बिलकुल अलग हो गए। जिन लोगो ने दुनियादारी अपनार्इ वह पहले पग पर ही निराश हो गए कि यहां रूहानियत उनके साथ न चल सकेगी। इस चीज ने उन्हे भौतिकता मे डुबो दिया। जीवन के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक तात्पर्य यह कि सांसारिक जीवन के सारे अंग अध्यात्म के प्रकाश से वंचित रह गए। परिणामस्वरूप पृथ्वी अत्याचार से भर गर्इ । दूसरी ओर जो लोग अध्यात्म प्रेमी हुए उन्होने अपने आत्मिक उत्थान के लिए ऐसे मार्ग चुने जो दुनिया के बाहर ही बाहर से निकल जाते हैं, क्योंकि उनके दृष्टिकोण से आत्मिक उन्नति का कोर्इ ऐसा मार्ग संभव ही न था जो दुनिया के अन्दर से होकर गुजरता हो। उनके निकट आत्मा की उन्नति के लिए शरीर को कमजोर करना जरूरी था इसलिए उन्होने ऐसी तपस्याएं र्इजाद की जो नफस (वासना) को मारने और शरीर को चेतनाशून्य और बेकार कर देनेवाली हो। तपस्या के लिए उन्होने जंगलो, पहाड़ो और एकान्तवास को अत्यन्त उपयुक्त स्थान समझा ताकि आबादी का कोलाहल ज्ञान-ध्यान में विध्न न डालने पाए। आत्मिक विकास के लिए उन्हे इसके अतिरिक्त कोर्इ उपाय न सूझा कि संसार तथा उसकी गतिविधियों से हाथ खींच ले तथा उन सभी संबंधों को काट फेंके जो उन्हे भौतिक संसार से जोड़े हुए हैं।

शरीर और आत्मा के इस परस्पर विरोध ने इन्सान के लिए उन्नति के शिखर के दो भिन्न-भिन्न अर्थ एवं लक्ष्य प्रस्तुत कर दिए। सांसारिक जीवन की उन्नति का सर्वोच्च बिन्दु यह निश्चित हुआ कि इन्सान केवल भौतिक सुख-सुविधाओं से मालामाल हो, और अन्तिम लक्ष्य यह ठहरा कि मनुष्य एक अच्छा पक्षी, एक बढ़िया मगरमच्छ, एक श्रेष्ठ घोड़ा और एक सफल भेड़िया बन जाए। दूसरी ओर आध्यात्मिक जीवन की उंचार्इ यह तय हुर्इ कि इन्सान कुछ अलौकिक शक्तियां का मालिक बन जाए और लक्ष्य यह ठहरा कि एक अच्छा रेडियों सेट, एक शक्तिशाली  दूरबीन और एक बढ़िया माइक्रोस्कोप बन जाए अथवा नजर और उसके शब्द एक पूर्ण औषधालय का काम देने लगे।

इस्लाम का दृष्टिकोण इस मामले मे दुनिया की सभी धार्मिक व दार्शनिक व्यवस्थाओं से भिन्न हैं। वह कहता हैं कि इन्सानी आत्मा को र्इश्वर ने धरती पर अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया हैं। कुछ कर्तव्य और उत्तरदायित्व उसे सौंपे हैं और उनको पूरा करने के लिए श्रेष्ठतम एवं उपयुक्ततम शारीरिक संरचना प्रदान की हैं। यह शरीर उसको दिया ही इसलिए गया हैं कि वह अपने अधिकारों के प्रयोग तथा अपने कर्तव्यों के निर्वाह में उससे काम ले। इसलिए यह शरीर आत्मा के लिए जेल नही बल्कि उसका कारखाना हैं और यदि आत्मा का कोर्इ विकास संभव है तो वह इसी प्रकार कि इस कारखाने के औजारों तथा उर्जा का उपयोग करके अपनी योग्यताओं का प्रदर्शन करे। फिर यह दुनिया कोर्इ यातनागृह भी नही हैं जिसमे इन्सानी आत्मा किसी प्रकार आकर फैंस गर्इ हो, बल्कि यह तो वह कर्मस्थली हैं जिसमें काम करने के लिए र्इश्वर ने उसे भेजा हैं। यहां कि अनगिनत चीजे उसके अधीन कर दी गर्इ हैं। यहां दूसरे बहुत-से इन्सान इसी खिलाफत (प्रतिनिधित्व) के कर्तव्य निभाने के लिए उसके साथ पैदा किए गए हैं। यहां प्रकृति की मांगों से सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक तथा जीवन के अन्य विभाग उसके लिए अस्तित्व में आए हैं। यहां अगर कोर्इ रूहानी तरक्की संभव हैं तो उसका उपाय यह नही हैं कि आदमी इस कर्मस्थली से मुख मोड़कर किसी एकान्त में जा बैठे, बल्कि उसका उपाय यह हैं कि वह इसके अन्दर कार्य करके अपनी योग्यता का परिचय दे। यह उसके लिए परीक्षा-भवन है। जीवन का प्रत्येक पक्ष परीक्षा के प्रश्न-पत्र के समान है। घर, मुहल्ला, बाजार, मंडी, दफतर, कारखाना, पाठशाला, कचहरी, थाना, छावनी, पार्लियामेन्ट, अमन कान्फ्रेन्स, (शांति सम्मेलन) और युद्ध के मैदान सब विभिन्न विषयों के प्रश्न पत्र हैं जो उसे करने के लिए दिए गए हैं। वह अगर उनमें से कोर्इ प्रश्न पत्र न करे या अधिकतर विषयों की उत्तरपुस्तिका खाली छोड़ दे तो परीक्षाफल में शून्य के अतिरिक्त और क्या पा सकता हैं?

सफलता और उन्नति की संभावना अगर हो सकती है तो इसी तरह कि वह अपना सारा समय और पूरा ध्यान परीक्षा देने पर केन्द्रित करे और जितने पर्चे भी उसे दिए जाए उन सबमें कुछ करके दिखाए।

इस प्रकार इस्लाम ‘सन्यास’ के विचार को रद् कर देता है और मानव के लिए आत्मिक उत्थान का मार्ग दुनिया के बाहर से नही बल्कि दुनिया के अन्दर से निकालता हैं। आत्मा की उन्नति, विकास और सफलता प्राप्ति का वास्तविक स्थान उसके अनुसार जीवन की गतिविधियो के ठीक बीच मे हैं, न कि उसके किनारे पर।

अब मै संक्षेप मे आपको बनाउंगा कि इस्लाम सांसारिक जीवन के बीच से इन्सान के आत्मिक उत्थान का मार्ग किस प्रकार बनाता हैं।

1-    इस मार्ग की प्रथम चरण र्इमान हैं, जिसका आशय यह हैं कि आदमी के मन-मस्तिष्क मे यह बात बैठ जाए कि र्इश्वर ही उसका मालिक, शासक, और पूज्य हैं। र्इश-प्रसन्नता ही उसके सारे प्रयत्नों का मूल उद्देश्य हो और र्इश्वर का आदेश ही उसके जीवन का विधान हो। यह विचार जितना अधिक दृढ़ और पक्का होगा उतनी ही अधिक इस्लामी मानसिकता पूर्णता लिए होगी और उतने ही स्थायित्व और दृढ़ निश्चय के साथ इन्सान आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर चल सकेगा।
2-    इस रास्ते की दूसरी मंजिल आज्ञापालन हैं। अर्थात मनुष्य का व्यवहारत: अपनी स्वतन्त्रता को त्याग देना और उस र्इश्वर के प्रति व्यावहारिक रूप से समर्पित हो जाना जिसे वह धारणा के रूप में अपना र्इश्वर मान चुका है। इसी आज्ञापालन और समर्पण का नाम कुरआन की शब्दावली में ‘इस्लाम’ हैं।
3-    तीसरी मंजिल तकवा (र्इशभय) की हैं जिसे साधारण भाषा मे कर्तव्यपरायण और उत्तरदायित्व की भावना से व्यक्त करते हैं। र्इशभय यह हैं कि आदमी अपने जीवन के प्रत्येक पहलू मे यह समझते हुए कार्य करें कि उसे अपनी विचारधाराओं, कथनों और कर्मो का हिसाब र्इश्वर को देना हैं। हर उस काम से रूक जाए जिससे खुदा ने मना किया हैं, हर उस सेवा के लिए तत्पर हो जाए जिसका खुदा ने हुक्म  दिया हैं और पूर्ण विवेकशील ढंग से वैध-अवैध, सही-गलत और भलार्इ-बुरार्इ के बीच अन्तर करके जीवन व्यतीत करे।


अंतिम और उससे ऊंचा मंजिल ‘एहसान’ (अति उत्तम आचरण) की हैं। एहसान का अर्थ यह हैं कि मनुष्य की इच्छा र्इश्वर की इच्छा के साथ एकाकार हो जाए। जो कुछ र्इश्वर की पासन्द है वही उसके दास की अपनी पसन्द भी हो और जो कुछ र्इश्वर को नापसन्द हैं, दास का अपना  दिल भी उसे नापसन्द करे। र्इश्वर जिन बुरार्इयों को अपनी धरती पर देखना नहीं चाहता मनुष्य न केवल यह कि स्वयं उनसे बचे बल्कि उन्हे दुनिया से मिटा देने के लिए अपनी सम्पूर्ण क्षमताएं और सभी साधन लगा दें। र्इश्वर जिन भलार्इयों से अपनी धरती को सुसिज्ज्ात देखना चाहता है, मनुष्य उनको अपने जीवन में अपनाने तक ही सीमित न रहे बल्कि अपनी अपनी जान लड़ाकर दुनियाभर मे उन्हे फैलाने और स्थापित करने का प्रयास करे। इस स्थान पर पहुचकर मनुष्य को अपने र्इश्वर का निकटतम सामीप्य प्राप्त होता हैं और इसी लिए यह इन्सान की आत्मिक उन्नति और विकास का उच्चतम शिखर हैं।

आध्यात्मिक उन्नति का यह रास्ता व्यक्तियों के लिए ही नही बल्कि वर्गो और समूहों के लिए भी हैं। एक व्यक्ति की भांति एक कौम (राष्ट्र) भी र्इमान, आज्ञापालन और र्इशभय की मंजिलों से गुजरकर एहसान की सर्वोच्च मंजिल तक पहुंच सकती है और एक राज्य भी अपनी पूर्ण व्यवस्था के साथ र्इमानवाला, इस्लाम का अनुगामी, र्इशभय धारण करनेवाला ओर एहसानवाला बन सकता हैं। बल्कि वास्तव में इस्लाम का उद्देश्य तभी पूर्ण हो सकता है जब एक पूरी कौम इसी मार्ग पर चले और दुनिया में एक र्इशभय रखनेवाला उत्तम आचरण से सुसज्जित राज्य स्थापित हो जाए।

अब अध्यात्मिक प्रशिक्षण की उस व्यवस्था को भी देख लिया जाए जो व्यक्ति और समाज को इस रूप में तैयार करने के लिए इस्लाम ने पेश की हैं। इस व्यवस्था के चार स्तंभ है-


(1) पहला स्तंभ नमाज है। यह प्रतिदिन पांच बार आदमी के मस्तिष्क में खुदा की याद को ताजा करती हैं, उसका भय दिलाती है, उसका प्रेम पैदा करती हैं, उसके आदेश बार-बार सामने लाती है और आज्ञापालन का अभ्यास कराती है। यह नमाज केवल व्यक्तिगत नही है बल्कि सामूहिकता के साथ अनिवार्य की गर्इ ताकि पूरी सोसाइटी सामूहिक रूप से आध्यात्मिक उन्नति के इस मार्ग पर चलने के लिए तैयार हो जाए।

(2) दूसरा स्तंभ रोजा हैं जो हर वर्ष पूरे माह तक मुसलमान व्यक्ति को अलग-अलग और मुस्लिम सोसाइटी को सामूहिक रूप से र्इशभय का प्रशिक्षण देता रहता है।

(3) तीसरा स्तंभ जकात हैं जो मुसलमान व्यक्तियों में आर्थिक त्याग भाव, आपसी हमदर्दी और मदद की भावना उत्पन्न करती है। आजकल के लोग भ्रमवश जकात को कर (Tax) के अर्थ मे लेते हैं, जबकि ‘जकात’ की आत्मा कर की आत्मा से सर्वथा भिन्न है। जकात का मूल शाब्दिक अर्थ वृद्धि विकास और शुद्धता है। इस शब्द से इस्लाम आदमी के मन मे यह तथ्य बैठाना चाहता हैं कि अल्लाह की मुहब्बत में अपने भाइयों की तुम जो आर्थिक सहायता करोगे,
इससे तुम्हारा आत्मिक उत्थान होगा और तुम्हारे आचरण में पवित्रता और शुद्धता  आएगी।

(4) चौथा स्तंभ हज हैं यह र्इशभक्ति की धुरी पर र्इमानवाले और आस्थावान मनुष्यों की एक अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी बनाता है और एक ऐसा विश्वव्यापी आन्दोलन चलाता हैं जो दुनिया में सदियों से ‘सत्य’ के आहवान पर एक जुटता का ऐलान कर रही है और र्इश्वर ने चाहा तो रहती दुनिया तक वह ऐलान करता रहेगा।

Author Name: मौलाना सैयद अबुलआला मौदूदी