इस्लाम शब्द का अर्थ

इस्लाम शब्द का अर्थ‘

इस्लाम’ अरबी भाषा का शब्द हैं। अरबी भाषा में इस्लाम का अर्थ हैं, हुक्म मानना, आत्मसमर्पण (Surrender) एवं आज्ञापालन(Submission) इस्लाम धर्म का नाम ‘इस्लाम’ इस लिए रखा गया हैं कि यह अल्लाह के आदेशों का अनुवर्तन और उसका आज्ञापालन हैं।

 

कुफ्ऱ की वास्तविकता

इसके मुक़ाबले में दूसरा मनुष्य वह हैं जो मुस्लिम पैदा हुआ और अपने जीवन भर अचेतन रूप में मुस्लिम ही रहा, परन्तु अपने ज्ञान और बुद्धि की शक्ति से काम लेकर, उसने र्इश्वर को न पहचाना और अपने स्वतंत्र क्षेत्र में उसने अल्लाह का हुक्म मानने से इनकार कर दिया। यह व्यक्ति काफ़िर हैं। कुफ्ऱ मूल रूप से अरबी का शब्द हैं जिसका मौलिक अर्थ हैं छिपाना और परदा डालना। ऐसे व्यक्ति को इस लिए ‘काफ़िर’ कहा जाता हैं कि उसने अपनी सहज प्रकृति पर नादानी का परदा डाल रखा हैं। उसकी जन्मजात प्रकृति और स्वभाव इस्लाम की प्रकृति के अनुरूप हैं। उसका सारा शरीर और शरीर का हर भाग इस्लाम की प्रकृति के अनुसार काम कर रहा हैं। उसके चारों ओर सारी दुनिया इस्लाम पर चल रही हैं, परन्तु उसकी अक़्ल पर परदा पड़ गया हैं। सम्पूर्ण संसार की ओर स्वयं अपनी प्रकृति उससे छिप गर्इ हैं। वह उसके विरूद्ध सोचता है और उसके विरूद्ध चलने की कोशिश करता हैं। अब आप समझ सकते हैं कि जो व्यक्ति काफ़िर हैं, वह कितनी बड़ी गुमराही में पड़ा हुआ है।

 

कुफ्ऱ की हानियॉ

कुफ्ऱ एक प्रकार की अज्ञानता हैं, बल्कि वास्तविक अज्ञानता कुफ्ऱ ही हैं। इससे बढ़कर और क्या अज्ञानता हो सकती हैं कि मनुष्य र्इश्वर से अपरिचित हो। एक व्यक्ति दुनिया के इतने कारख़ाने को दिन-रात चलते हुए देखता हैं, परन्तु नही जानता कि कारख़ाने को बनाने और चलानेवाला कौन हैं और वह कौन कारीगर हैं, जिसने कोयले और लोहे और कैल्शियम और सोडियम और ऐसी ही कुछ चीजों को मिलाकर जैसे अनुपम प्राणी की रचना कर दी। एक व्यक्ति संसार में हर ओर ऐसी चीजें और ऐसे काम देखता हैं, जिनमें अद्वितीय इंजीनियरी, गणितज्ञता, रसायन ज्ञान और समस्त प्रतिभाओं के चमत्कार दिखार्इ देते हैं, परन्तु वह नही जानता कि वह ज्ञान, तत्वदर्शिता (Wisdom) और बुद्धिमत्तावाली सत्ता कौन-सी हैं, जिसने विश्व में ये समस्त कार्य किये हैं। सोचिए और विचार कीजिए ऐसे व्यक्ति के लिए वास्तविक ज्ञान के द्वार कैसे खुल सकते हैं, जिसको ज्ञान का पहला सिरा ही न मिला हो ? चाहे वह कितना ही सोच-विचार करें और कितना ही तलाश और खोज में सिर खपाए, उसको किसी विभाग में ज्ञान का सीधा और यथार्थ मार्ग न मिलेगा, क्योंकि उसे आरंभ में भी अज्ञान का अंधेरा दीख पड़ेंगा और अंत में भी वह अंधेरे के सिवा कुछ ने देखेगा। कुफ्ऱ एक जुल्म हैं, बल्कि सबसे बड़ा जुल्म कुफ्र ही हैं। आप जानते हैं कि जुल्म किसे कहते हैं? जुल्म यह है कि किसी चीज से उसके स्वभाव और प्रकृति के विरूद्ध जब़रदस्ती काम लिया जाए। आपकों मालूम हो चुका हैं कि दुनिया में जितनी चीजें हैं सब र्इश्वरीय आज्ञा के अधीन हैं और उनकी प्रकृति ही ‘‘इस्लाम’’ अर्थात् र्इश्वरीय विधि एवं नियम का पालन करना हैं। स्वयं मनुष्य का सम्पूर्ण शरीर और उसका प्रत्येक भाग इसी प्रकृति के अनुरूप पैदा हुआ हैं। खुदा ने इन चीजों पर मनुष्य को शासन करने का थोड़ा-सा इख्तियार तो अवश्य प्रदान किया हैं, परन्तु हर चीज़ की प्रकृति यह चाहती हैं कि उससे र्इश्वरीय इच्छा के अनुसार काम लिया जाए, किन्तु जो व्यक्ति कुफ्ऱ करता हैं वह इन सब चीजों से उनकी प्रकति के विरूद्ध काम लेता हैं, वह अपने दिल में दूसरों की बड़ार्इ, प्रेम और भय को जगह देता हैं, हालांकि दिल की प्रकृति यह चाहती हैं कि उसमें र्इश्वर की बड़ार्इ और उसका प्रेम और उसका भय हो। वह अपनी समस्त इन्द्रियों और अंगो से और दुनिया की उन सब चीजों से, जो उसके अधिकार में हैं, र्इश्वरीय र्इच्छा के विरूद्ध काम लेता हैं।

हालाकि हर चीज़ की प्रकृति यह चाहती हैं कि उससे र्इश्वरीय विधि एवं नियम के अनुसार काम लिया जाए। बताइए ऐसे व्यक्ति से बढ़कर और कौन जालिम होगा जो अपने जीवन में हर समय ही चीज़ पर यहॉ तक कि स्वयं अपने-आप पर भी जुल्म करता रहे। कुफ्र केवल जुल्म़ ही नही, विद्रोह और अकृतज्ञता और नमकहरामी भी हैं। तनिक साचिए मनुष्य के पास उसकी अपनी क्या चीज़ हैं? अपने मस्तिष्क कों उसने बनाया या र्इश्वर ने? अपने दिल, अपनी ऑखों और अपनी जुबान और अपने हाथ-पॉव और अपने समस्त अंगो का वह स्वयं बनानेवाला हैं या र्इश्वर? उसके चारों ओर जितनी चीजें हैं, उनको पैदा करनेवाला स्वयं मनुष्य हैं या र्इश्वर? इन सब चीजों को मनुष्य के लिए लाभदायक और उपयोगी बनाना और मनुष्य को उनके उपयोग की शक्ति देना मनुष्य का अपना काम हैं या र्इश्वर? आप कहेंगे ये सब चीजें, र्इश्वर ही ने इनकों पैदा किया हैं, र्इश्वर ही इनका मालिक हैं और र्इश्वर ही के प्रदान करने से ये मनुष्य को प्राप्त हुर्इ हैं। जब असल सच्चार्इ यह हैं तों उससे बड़ा विद्रोही कौन होगा जो र्इश्वर के दिए दिमाग़ से र्इश्वर ही के विरूद्ध सोचे, र्इश्वर के दिए हुए दिल में र्इश्वर ही के विरूद्ध भावनाओं को जगह दें। र्इश्वर ने जो ऑखें, जो ज़बान, जो हाथ-पॉव और जो दूसरी चीजें़ उसकों प्रदान की हैं, उनकों र्इश्वर की ही पसन्द और उसकी इच्छा के विरूद्ध प्रयोग में लाए। यदि कोर्इ नौकर अपने मालिक का नमक खाकर उसके साथ विश्वासघात करता हैं तो आप उसकों नमकहराम कहते हैं। यदि कोर्इ सरकारी कर्मचारी हुकूमत के दिए हुए अधिकारों का प्रयोग हुकूमत ही के विरूद्ध करता हैं, तो आप उसे विद्रोही कहते हैं। यदि कोर्इ व्यक्ति अपने उपकारकर्ता के साथ विश्वासघात करता हैं, तो आप उसे कृतध्न कहते हैं, परन्तु मनुष्य के प्रति मनुष्य की नमकहरामी, विश्वासघात व ग़ददारी और कृतध्नता की क्या वास्तविकता हैं, मनुष्य दूसरे को कहॉ से जीविका देता हैं? वह र्इश्वर की ही दी हुर्इ जीविका तो हैं। हुकूमत अपने कर्मचारियों को जो अधिकारी देती हैं वे कहॉ से आए हैं? र्इश्वर ही ने तो उसकों सत्ता-प्रदान की हैं। कोर्इ उपकार करनेवाला दूसरे व्यक्ति पर कहॉ से उपकार करता है? सब-कुछ र्इश्वर ही का तो दिया हुआ हैं। मनुष्य पर सबसें बड़ा हक़ उसके मॉ-बाप का है, परन्तु मॉ-बाप के दिल मे संतान के प्रति प्रेम किसने पैदा किया? मॉ के सीने में दूध किसने उतारा? बाप के दिल में यह बात किसने डाली कि अपने गाढ़े पसीने की कमार्इ खाल-मॉस के एक बेकार लोथड़े पर खुशी-खुशी लुटा दें और उसके पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा में अपना समय, अपना धन, अपना आराम-चैनसब कुछ निछावर कर दें? अब बताओं कि जो र्इश्वर मनुष्य का वास्तविक उपकारकर्ता हैं, वास्तविक सम्राट हैं, सबसे बड़ा पालनकर्ता हैं यदि उसी के साथ मनुष्य कुफ्र करें, उसको र्इश्वर न मानें, उसकी बन्दगी से इन्कार करें और उसके आज्ञापालन से मुॅह मोड़े, तो यह कैसा घोर विद्रोह हैं, कितनी बड़ी कृतध्नता और नमकहरामी हैं।

Author Name: इस्लाम धर्म: सैयद अबुल आला मौदूदी (रह0)