बलात् धर्म परिवर्तन और इस्लाम

संसार के जिन सम्प्रदायों से इस्लाम को सबसे पहले वास्ता पड़ा वे यहूदी और र्इसार्इ सम्प्रदाय थें। यहूदियों की इस्लाम के केन्द्र मदीने के आस-पास बड़ी-बड़ी बस्तियां थी और उनका अरबों पर बड़ा प्रभाव था और र्इसाइयों के विशाल साम्राज्य का क्षेत्र मदीना निवासियों की सीमा तक फैला हुआ था और और उसके प्रभाव से लाखों अरब र्इसार्इ हो गए थें। सीमा प्रान्त में कुछ अरब रियासतों भी स्थापित हो गर्इ थी। यमन का नजरान प्रान्त र्इसाइयों का केन्द्र था।
यहूदी और र्इसार्इ अगर अपने-अपने धर्म का ठीक-ठीक पालन करते होते और अपने-अपने धर्मग्रन्थों के अनुसार चलते होते तो दोनो को मुसलमान होना चाहिए था, क्योकि इस्लाम के सिद्धान्त और इतिहास के अनुसार संसार के विभिन्न देशों और जातियों में जितने भी नबी, रसूल और र्इशदूत हुए थे, उन सबने इस्लाम ही की शिक्षा दी थी और इसी की ओर लोगो का मार्गदर्शन किया था और उन्ही में हज़रत मूसा और हज़रत र्इसा (अलै0) भी थे, लेकिन यहूदियों और र्इसार्इयों मे से कोर्इ सम्प्रदाय भी अपने रसूलो की दी हुर्इ शिक्षा पर कायम न था। यहूदी ‘तौरात’ से विमुख हो गए थे और र्इसार्इ ‘इंजील’ से। इतना ही नहीं, दोनो ने इन ग्रन्थों में हेर-फेर भी कर दिया था और इनको अपनी इच्छा और स्वार्थ के अनुसार बना लिया था।

कुरआन ने इस्लाम के सिद्धान्त के अनुसार तौरात और इंजील दोनो को र्इश्वरीय ग्रन्थ माना और हज़रत मूसा और हज़रत र्इसा (अलै0) दोनो को (उनपर र्इश्वर की दया और कृपा हो) र्इश्वर का सच्चा सन्देशदाता स्वीकार किया और इसी के साथ यहूदियों और र्इसार्इयों के आलिमों ने अपने स्वार्थो की सिद्धि के लिए तौरात और इं्रजील में जो कांट-छांट कर दी थी, उसको भी प्रकट  कर दिया और इस प्रकार यहूदियों और र्इसार्इयों के विद्वानों का पोल खुल गया। उनकी महात्मार्इ धूल में मिल गर्इ तथा उनका खाने-कमाने और भोग-विलास का अधिकार खत्म हो गया। इस कारण अनिवार्य था कि यहूदी और र्इसार्इ सम्प्रदाय इस्लाम के शत्रु बन जाएं।

यहूदियों और र्इसार्इयों के विद्धानों और धर्मगुरूओं ने र्इश्वर के दिए नियम और कानून, हराम और हलाल को उठाकर अलग रख दिया था और र्इश्वर के नाम से अपने नियम और अपनी आज्ञा चला रहे थें। कुरआन ने उन दोनों के भ्रष्टाचार के बारे में कहा-
    ‘‘यहूदियों के पंडितों और र्इसार्इयों के सन्तों में बहुत से ऐसे है जो लोगो के धन को अवैध  रूप से खाते हैं और उनको खुदा के रास्ते पर चलने से रोकते हैं।’’        कुरआन -9:34

यहूदी आज की तरह उस काल में भी बड़े पूंजीपति थे और सूद-ब्याज, छल-कपट और अत्याचार हर प्रकार से धन प्राप्त कर लेने के लिए लालायित रहते थे, हालांकि उनके धर्म मे सूद लेना मना था। कुरआन ने कहा-

‘‘यहूदियों के सूद लेने पर हांलाकि उनको इससे मना कर दिया गया था और उनके भ्रष्ट रीति से धन खाने पर (उनको यह दण्ड दिया गया कि पवित्र चीजे भो जो उनपर हलाल थीं हराम ठहरा दी गर्इ)।’’        कुरआन,-4:161

तौरात और इंजील में हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) का पूरा परिचय दिया हुआ था और उन धर्मग्रन्थों के पण्डित और विद्वान इस परिचय से भली-भांति अवगत थें। उनको आशा थी कि आप उन्हीं की जाति में पैदा होंगे। इसलिए वे आपके आने की प्रतीक्षा भी कर रहे थे, लेकिन आपका जन्म दूसरे वंश में हुआ तो यहूदी और र्इसार्इ दोनो आपके विरोधी बन गए। इस सम्बन्ध में एक जगह कुरआन में कहा गया है-

    ‘‘हमने जिन लोगो को ग्रन्थ दिया था वे (अपने ग्रन्थ द्वारा) उनकों उसी तरह पहचानते हैं जिस तरह वे अपनी सन्तान को पहचानते हैं, मगर उनमें से एक समुदाय जान-बूझकर सत्य को छिपा रहा हैं।’’    कुरआन-2:146

उन्ही मे जो सत्यप्रिय थे उन्होने हजरत मुहम्मद (सल्ल0) को और कुरआन शरीफ को मान लिया। उनके सम्बन्ध में कुरआन में कहा गया हैं-

    ‘‘(इनमें ऐसे भी है कि) जब वे उन बातों को सुनते हैं जो रसूल (मुहम्मद सल्ल0) पर उतारी गर्इ हैं, तो तू उनकी आंखों को देखता हैं कि उनसे आंसू बहने लगते हैं, इस वजह से कि सत्य से परिचित हो गए। कुरआन, 5:83
यहूदी इस्लाम को हानि पहुंचने के लिए तरह-तरह के छल-कपट से काम लेते। कुरआन में हैं-

    ‘‘किताबवालों मे एक समुदाय ऐसा हैं जो आपस में कहता है कि मुसलमानों पर जो ग्रन्थ उतारा गया है, उसपर दिन के आरम्भ में र्इमान लाओ और दिन के अन्त में उससे इनकार कर दो, शायद (इस तरकीब से) मुसलमान भी इस्लाम से पलट आएं।’’    कुरआन,-3:72,


धार्मिक स्वतन्त्रता,
            महार्इश-दूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) और उनके उत्तराधि कारियों के समय में गैर-मुस्लिम से बहुत-सी संधियां हुर्इ और उनके लिए प्रतिज्ञा-पत्र लिखे गए। हम उनके धार्मिक स्वतन्त्रता सम्बन्धों अंश प्रस्तुत कर रहे हैं।

माह दीनदार के निवासियों को जो प्रतिज्ञा-पत्र लिखा गया उसमे था-

‘‘न उनका धर्म बदला जाएगा और न उनके धार्मिक कार्यो में हस्तक्षेप किया जाएगा।’’
जुर्जार निवासियों प्रतिज्ञा-पत्र में था-
‘‘उनके प्राण, धन, धर्म, शास्त्र सबसे लिए सुरक्षा हैं, उनकी किसी चीज़ में परिवर्तन न किया जाएगा।’’

लूकाफ और आजर बार्इजान निवासियों के प्रतिज्ञा-पत्र में था-

    ‘‘गैर मुस्लिमों के प्राण, धन, धर्म और शास्त्र सबके लिए रक्षा है।’’
ये पंक्तियां बड़े आलीम शिबली की पुस्तक ‘अलफारूक’ से उद्धत की गर्इ हैं।

हज़रत उमर की उपस्थिति में र्इलिया (शाम) के निवासियों को जो प्रतिज्ञा-पत्र लिखा गया उसमें है-
    ‘‘यह वह सुरक्षा है जो र्इश्वर के दास और मुसलमानों के अधिकारी (खलीफा) उमर ने र्इलिया निवासियों को दी। यह सुरक्षा उनके प्राण, धन, उपासनागृह, सलीब, स्वास्थ्य, रोगी तथा उनके समस्त सहधर्मियों के लिए हैं। वह इस प्रकार हैं कि न उनके उपासनागृहों में निवास किया जाएगा, न उनको ढाया जाएगा, न उनके अहाते को किसी प्रकार की हानि पहुंचार्इ जाएगी और न उनके सलीबों और माल में कोर्इ कमी की जाएगी और न उनके धर्म के सम्बन्ध में उनपर कोर्इ दबाव डाला जाएगा।’’            (अलफारूक)

यह कुछ विशेष उदारता नही हैं। धार्मिक स्वतन्त्रता और धार्मिक रक्षा इस्लामी शासन की स्थायी नीति थी, जो पवित्र कुरआन के इस आदेश पर आधारित थी-’लाइकरा-ह फिददीनि, (धर्म के विषय में कोर्इ जोर-जबरदस्ती नहीं)। हज़रत उमर (रजि0) के शासनकाल में हजरत अम्र बिन आस ने मिस्र को जीता। युद्ध में बहुत-से सैनिक बन्दी थे, मिस्र के विजेता हज़रत अम्र बिन आस ने हज़रत उमर (रजि0) से लिखकर पूछा कि बन्दियों के सम्बन्ध में क्या किया जाए? हज़रत उमर (रजि0) ने उत्तर में लिखा कि बन्दियों को इसका अधिकार दे दिया जाए कि वे चाहे तो इस्लाम ग्रहण कर लें और चाहे तो जिज़्या देना स्वीकार करके अपने धर्म पर रहे।’’        (अलफारूक-अल्लामा शिबली)

हज़रत उमर (रजि0) का एक दास र्इसार्इ था। एक बार उन्होने दास से मुसलमान हो जाने का प्रस्ताव किया, उसने अस्वीकार कर दिया। हजरत उमर (रजि0) का शासन, र्इरान, शाम और मिस्र तक फैला हुआ था, परन्तु आपने उसका उत्तर सुनकर कहा- ‘ला इकरा-ह फिददीनि’ (धर्म के विषय में जबरदस्ती नही) इतना ही नही, आप उससे अप्रसन भी नही हुए। अपने इन्तिकाल के समय दास को गले लगाया और उसे स्वतन्त्र कर दिया।

शाम के अंताकिया नगर का याकूबी सम्प्रदाय पीटर यार्क मीकार्इल लिखता हैं-

        ‘‘जब ख़्ाुदा ने रोमनों का उत्पात देखा कि वे जहां कहीं अधिकार पाते हैं हमारे गिरजाओं को अशुद्ध कर देते है और हम पर अत्याचार करते हैं, तो उसने प्रदेश में इसमार्इल की सन्तान (मुसलमानों) को नियुक्त किया कि वे हमे रोमनों से मुक्ति दिलाएं।’’

एक नस्तूरी उस्कुफ्र (धर्म-नेता) कहता हैं-

    ‘‘ अरब मुसलमान, र्इसाइयों के मजहब से नही लड़ते, वे हमारे पादरियों और मजहबी बुजुर्गो का सम्मान तथा हमारे मजहब की रक्षा करते हैं,

वे बड़े उदार हैं’’

महार्इश दूत के तीसरे उत्तराधिकारी हजरत उस्मान (रजि0) के शासन-काल में गेसुजा(Gesujah), जो मरू का पीटर यार्क था, ने र्इरान के लार्ड विशप सार्इमन को लिखा-

    ‘‘अरब, जिनको खुदा ने इस समय देशों की बादशाहत दी हैं, र्इसार्इ मजहब पर आक्रमण नही करते, बल्कि उसके विपरीत हमारे मजहब की सहायता करते हैं और हमारे गिरजाओं और खानकाहों को अनुदान देते हैं।’’        (हुकूकज्जिम्मीयीन शिब्ली)

डा0 र्इ0एफ0 क्रासवेल इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध विद्वान और लेखक हैं। अपने एक लेख में लिखते हैं-

    ‘‘मानव-जीवन का एक महत्वपूर्ण विभाग युद्ध भी हैं, और जीवन के इस क्षेत्र में नैतिक आदर्श को स्थापित रखना कठिन हो जाता है। परन्तु इस्लाम ने मानव-जीवन के इस क्षेत्र में भी केवल उच्चकोटि की नैतिक शिक्षा ही उपस्थिति नही की हैं, बल्कि व्यावहारिक रूप में भी मुसलमान इस आदर्श को अपने सामने रखते रहे हैं।

इस्लाम ने आक्रमणात्मक युद्ध की हर अवस्था को निषिद्ध ठहराया हैं और मुसलमानों को केवल प्रतिरक्षात्मक युद्ध की अनुमति दी हैं। परन्तु ऐसे युद्ध में भी नैतिकता एवं मानवता के सीमोल्लंघन से कठोरता के साथ मनाही कर दी हैं और केवल उन्हीं लोगो पर हथियार उठाने की अनुमति दी हैं, जो मुसलमानों से लड़े और पराजित होने के बाद भी हथियार डालने से इनकार कर दे। इसी के साथ उसने जीविका सम्बन्धी सामग्री को नष्ट करने की भी सर्वथा मनाही कर दी हैं।

युद्ध के विषय में संसार की कोर्इ जाति नैतिकता का इतना ऊंचा आदर्श उपस्थित नही कर सकती जितना इस्लाम ने उपस्थित किया हैं। सारांश यह कि इस्लाम को जिस ओर से भी देखा जाए वह उच्चकोटि की नैतिक शिक्षा का संग्रह सिद्ध होता हैं। उसकी शिक्षा का सबसे बड़ा गुण यह हैं कि उससे मुस्लिम और गैर मुस्लिम दोनो समान रूप से लाभान्वित हो सकते हैं।’’ (मासिक ‘‘दीन-दुनिया’’ दिल्ली, जून सन् 1960 र्र्इ0)







ज़िज़्या
    जिहाद ही तरह जिज़्या को लेकर भी इस्लाम के विरूद्ध बड़ा दुष्प्रचार किया गया हैं और यह गलतफहमी उत्पन्न कर दी गर्इ हैं कि जिज्या का उद्देश्य भी कर-भारद्वारा गैर मुस्लिम को इस्लाम ग्रहण करने पर बाध्य करना हैं। हर प्रकार के इस्लाम-विरोधी प्रचार का स्रोत तो र्इसार्इ सम्प्रदाय हैं, परन्तु अंगे्रजो के शिष्या उनके चबाए ग्रास को चबानेवाले हमारे देश के विद्धानों ने भी जिहाद और जिज्या के प्रति बड़ा द्वेषपूर्ण प्रचार किया हैं। उन्ही विद्वानों में अंगे्रजी सरकार के सेवक तथा सम्मानित मुगल इतिहास के प्रसिद्ध इतिहासकार ‘सर यदुनाथ सरकार’ भी थे। उनकी एक हिन्दी पुस्तक ‘औंरगजेब’ हैं। यद्यपि वह हिन्दी नहीं जानते थें, परन्तु उन्ही की इच्छा के अनुसार उनके एक शिष्य ने उनकी अंगे्रजी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद कराके उनकी स्वीकृति के बाद उन्ही के नाम से प्रकाशित करार्इ हैं। किसी धर्म के विषय में प्रमाण उसी धर्म की पुस्तके हो सकती, है, विरोधियों, की लिखी हुर्इ पुस्तकें नही हो सकती, चाहे वह कितने बड़े विद्वान थे। उदाहरणत: वेद-शास्त्र सम्बन्धी पुस्तके काशी, अयोध्या, मथुरा आदि के पंडितों ही की प्रमाण होंगी, न कि इंग्लैण्ड के विद्वानों की। यदुनाथ सरकार ने उक्त पुस्तक में इस्लाम के विषय में जो कुछ लिखा हैं उसका आधार इस्लामी पुस्तके नही हैं, इस्लाम के शत्रु अंग्रेजी की ‘हयूज’ और ‘इनसाइक्लोपीडिया आफ इस्लाम ‘ आदि हैं, जिनका उद्देश्य इस्लाम के विरूद्ध भ्रम, घृणा, तथा द्वेष उत्पन्न करना था। इसलिए आवश्यकता हैं कि संक्षेप मे जिज्या की वास्तविकता भी गैर मुस्लिम भाइयों के सामने पेश कर दी जाए।
पहले हम यह बता दे कि जिज्या गैर मुस्लिमों ही पर क्यों हैं?

1-मुसलमानों पर एक धार्मिक अनिवार्य ‘कर’ लागू होता है, जिसको ‘जकात’ कहते हैं। इसकी दर ढार्इ प्रतिशत सालाना हैं, जो बचते के धन पर देना पड़ता हैं। यदि कोर्इ अरबपति हो तो उसको भी ढार्इ प्रतिशत के हिसाब से प्रति वर्ष जकात देनी पड़ती हैं और यदि देश पर कोर्इ संकट आ जाए तो इस्लामी शासन मुसलमानों से उनकी आर्थिक अवस्था के अनुसार विशेष धन भी प्राप्त कर सकता हैं। परन्तु गैर मुस्लिम प्रजा से जिज्या के अतिरिक्त एक पैसा नही ले सकता।

2. गैर मुस्लिम प्रजा देश की सुरक्षा के दायित्व से मुक्त होती हैं इसलिए सैनिक खर्च के लिए उससे हल्का-सा देश-सुरक्षा कर लिया जाता हैं, वही जिज्या कहलाता हैं। आवश्यकता पढ़ने पर जो गैर मुस्लिम प्रसन्नतापूर्वक सैनिक सेवा में भाग लेते हैं उनसे जिज्या नही लिया जाता। यदुनाथ सरकार ने इस विषय में जो कुछ लिखा हैं वह मिथ्या हैं।

3.इस्लामी राज्य की सब गैर मुस्लिम प्रजा पर जिज्या अनिवार्य नही हैं। इस्लामी राज्य की गैर मुस्लिम प्रजा तीन प्रकार की होती हैं। एक वे गैर मुस्लिम जिन्होने किसी प्रकार की संधि के द्वारा इस्लामी राज्य की अधीनता स्वीकार कर ली हो। उनके साथ इस्लामी शासन संधि की शर्तो के अनुसार व्यवहार करता हैं। यदि संधि मे जिज्या की शर्त न हो तो इस्लामी शासन को उनपर कदापि जिज्या लगाने का अधिकार नही है। दूसरी किस्म उन गैर मुस्लिमों की हैं, जिन्होने इस्लामी राज्य से युद्ध किया हो और युद्ध करते हुए पराजित हो गए हो तथा इस्लामी सेना ने उनके नगर और दुर्ग पर अधिकार प्राप्त कर लिया हो। केवल यही गैर मुस्लिम हैं, जिनके लिए नियम हैं कि वे इस्लाम स्वीकार कर ले तो उनके सब अधिकार इस्लामी समाज के बराबर हो जाते हैं और अपने धर्म पर रहना चाहें तो ‘सुरक्षाकर’ के रूप में उनपर जिज्या लगाया जाता हैं। तीसरे वे गैर मुस्लिम हैं, जो उन दोनो प्रकार के अतिरिक्त किसी और प्रकार से इस्लामी राज्य के नागरिक बन गए हों। उदाहरण स्वरूप पाकिस्तान के गैर मुस्लिम, उन पर किसी प्रकार से भी जिज्या नही लगाया जा सकता। क्योकि वे न युद्ध मे पराजित हुए हैं और न जिज्या स्वीकार करके पाकिस्तान की प्रजा बने हैं। वह मूलत: पाकिस्तान के नागरिक हैं।

इस्लामी परिभाषा में तीनों प्रकार की गैर मुस्लिम जनता ‘जिम्मी’ कहलाती हैं। जिम्मी कोर्इ अपमानजनक शब्द नही हैं। इसका अर्थ हैं वे गैर मुस्लिम जिनके प्राण, धन, धर्म, सम्मान, सुख, शान्ति, सबकी सुरक्षा का इस्लामी शासन जिम्मेदार होता हैं। इतना ही नही व्यावहारिक रूप से गैर मुस्लिमो की हर प्रकार की सुरक्षा का दायित्व इस्लाम शासन पर होता है, परन्तु इस्लाम के अनुसार गैर मुस्लिमों की रक्षा के वास्तविक जिम्मेदार अल्लाह और रसूल होते हैं। र्इश्वर दूत हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया हैं-

    ‘खबरदार! जो कोर्इ किसी गैर मुस्लिम प्रजा पर अत्याचार करेगा या अधिकार में कमी करेगा अथवा उसपर उसकी शक्ति से अधिक किसी प्रकार का भार डालेगा या उसकी प्रसन्नता के बिना उसकी कोर्इ वस्तु लोग तो कियामत के दिन उसके विरूद्ध उस गैर मुस्लिम प्रजा की ओर से खुदा के सम्मुख मैं वादी बनूंगा।’’


गै़र मुस्लिम भार्इ गम्भीरतापूर्वक महार्इश-दूत हजरत मुहम्मद (सल्ल0) की इस चेतावनी पर विचार करें जो उन्होने मुसलमानों को दी हैं। सुरक्षा की ऐसी गारन्टी तो हम भारतीय जनता को भी प्राप्त नही हैं। साम्प्रदायिक दंगों में मुसलमानों के साथ क्या होता हैं?

4.    जिज्या की दर इस प्रकार हैं-धनवान से धनवान पर चाहे वह लखपति और अरबपति ही क्यों न हो प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 12 रू0, मध्यम वर्ग पर 6 रू0, व्यापारी और नौकरी पेशा वर्ग पर 3रू0 सालाना। जिज्या के प्रति मूल सिद्धान्त यह है कि इतने ही धन के अनुसार जिज्या लिया जाए जो आवश्यकता से अधिक हो। यदि किसी गैर मुस्लिम प्रजा की आय कम हो जाए तो उससे तीन रूपया से भी कम लिया जाएगा, परन्तु आय बढ़ जाने पर जिज्या बढ़ाया नही जा सकता।

5.जिन पर जिज्या लागू होता हैं, उनमें भी स्त्रियां, बालक, पागल, अन्धे, अपाहिज, मन्दिरों और पूजागृहो के सेवक, साधु-समाज, गृहस्थ, जीवन से अलग होकर गुफाओं और मठो में रहने वाले लोग जिज्या से मुक्त होते हैं।

6.    जिज्या देने के लिए अधिकारियों के पास जाने का नियम नही हैं। अधिकारियों को स्वंय वसूली के लिए जाना पड़ता हैं। इनको आदेश हैं कि जिज्या की वसूली में नम्रता से काम लें। कठोरता का व्यवहार न करें। उनके वस्त्र इत्यादि आवश्यकता की वस्तुऐं नीलाम न करें।

7.    धनहीनों और भिक्षा मांगनेवाले गैर मुस्लिमों का सरकारी कोष में भी अधिकार हैं।

यदुनाथ सरकार की ‘औरंगजेब’ पुस्तक में इन नियमों की कोर्इ चर्चा नही है। यदि जिज्या गैर मुस्लिमों को अपमानित करने के लिए होता तो मन्दिरों के पुजारी, साधु, सन्याशी, मठो और गुफाओं में रहने वाले तथा स्त्रियां, बच्चे, बूढ़े और धनहीन जिज्या से मुक्त न होते।

यह बात तो हम इसी पुस्तिका में उपर लिख चुके हैं कि इस्लामी राज्य में गैर मुस्मि प्रजा को प्राण, धन, धर्म, सम्मान सबकी पूरी सुरक्षा प्राप्त होती हैं। यहां हम इतना और बता दें कि इस्लामी विधान मनुष्यों के बनाए हुए विधान के अनुसार नही होता, र्इश्वरीय ग्रन्थ कुरआन और महार्इशदूत हजरत मुहम्मद (सल्ल0) के आदेशों पर आधारित होता हैं। अत: उसकी अवहेलना उसी प्रकार पाप हैं जिस प्रकार दूसरी र्इश्वरीय आज्ञाओं तथा महार्इशदूत के आदेशों की अवज्ञा पाप है।

वास्तविकता के विरूद्ध कितना ही प्रचार किया जाए वह अपनी वास्तविकता मनवाकर ही रहती है। पश्चिम के विद्वानों ही में ऐसे विद्वान भी हुए जिन्होने दुराग्रह के दुष्प्रचारों का खण्डन किया। सर यदुनाथ सरकार जैसे विद्वानों को अंग्रेजों की राजनीति के अनुसार इस्लाम और मुसलमानों के विरूद्ध दुष्प्रचार करना था, वे ऐसे विद्वानों की पुस्तकों का अध्ययन क्यों करते जिन्होने दुष्प्रचार का खण्डन किया हैं? मान्य पाठक देखें-

Author Name: इस्लाम में बलात्धर्म परिवर्तन नहीं, जिहाद और ज़िज्या की वास्तविकता: अबू मुहम्मद इमामुद्दीन-रा