आतंकवाद और इस्लाम

आतंकवाद और इस्लाम

आजकल संचार माध्यमों के द्वारा ‘आतंकवाद’ शब्द का बहुत प्रयोग हो रहा हैं और कुछ राजनीतिक तत्व यह सिद्ध करने की चेष्टा भी कर रहे है कि इसका सम्बन्ध इस्लाम से हैं। हालांकि सामान्यत: न तो आतंकवाद का अर्थ लोगो को ठीक-ठीक मालूम हैं और न यह आसानी से सिद्ध किया जा सकता हैं कि इसका कोर्इ सम्बन्ध इस्लाम से भी हो सकता हैं। वस्तुत: उर्दू में शब्द ‘‘दहशत पसन्दी’’ अंग्रेजी शब्द Terrorism का अनुवाद हैं। ‘‘टेरर’’ का अर्थ हैं बहुत अधिक भय, खतरा और आतंक। इस अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए फारसी शब्द ‘‘दहसत’’ (आतंक) का प्रयोग किया गया और अंग्रेजी के ‘‘इल्म’’ का अनुवाद ‘‘पसन्द’’ (वाद) । इस प्रकार इसका पूरा अर्थ यह हुआ कि लोगो में भय एवं आतंक पैदा करने के मत का नाम दहशत पसन्दी (आतंकवाद) हैं। दूसरे शब्दो में जो लोग दूसरों की हत्या और विध्वंस आदि जैसे अनैतिक एवं अमानवीय कृत्यों के द्वारा डरा धमका कर अपने अवांछनीय उद्देश्य की पूर्ति करना चाहते है, उनका यह कुकृत्य आतंकवाद हैं। ये गतिविधियों ऐसी अनुचित हिंसा और यातनाओं पर आधारित है कि मानव की अन्तरात्मा उसे कभी सहन नही कर सकती और न सभ्य संसार इस अत्याचार की कभी अनुमति दे सकता हैं, क्योकि यह मानवता को सभ्यता एवं संस्कृति से बर्बरता और असभ्यता की ओर वापस ले जाने के समान हैं। यह उसी प्रकार की दानवता और कू्ररता का प्रदर्शन हैं जिस अतीत काल में बर्बरता (Barberism) की संज्ञा दी जाती थी। यही कारण हैं कि पाश्चात्य पत्रकारिता ने आतंकवाद को मध्यकालीन अन्धकार प्रतीक घोषित किया हैं। अब यह दूसरी बात हैं कि इतिहास की यह अवधारणा ठीक उसी प्रकार पश्चिम के राजनीतिक स्वार्थो की उपज हैं, जिस प्रकार आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ने की चेष्टा मुस्लिम विरोधी तत्वो के साम्प्रदायिक उद्देश्यों की द्योतक हैं।



‘‘इस्लाम का आतंकवाद से सम्बंध हैं। ‘‘वस्तुत: यह बात पाश्चात्य पत्रकारिता में विशेषकर उस समय से बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत की जा रही हैं जब फ़िलिस्तीनी मुक्ति संगठन(Palestinian Liberation Organization) के शस्त्रधारी दल के रूप में ‘‘ अलफतह’’ ने इस्रार्इली राज्य और यहूदी (Zionist) आतंकवादियों और उनके समर्थको को अन्तर्राष्ट्र्रीय स्तर पर मुॅहतोड़ जवाब देना शुरू किया। यद्यपि अत्याचारियों के विरूद्ध पीड़ितों की इस गतिविधि में ऐसे तत्व सक्रिय थें,  जिनका कोर्इ संगठनात्मक सम्बन्ध फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (P.L.O.) से नही था और ये अरब उग्रवादी अपने तौर पर इस्रार्इली बर्बरता के विरूद्ध प्रतिशोध की कार्यवार्इ करके विश्व का ध्यान अपने आन्दोलन के उद्देश्यों की और आकर्षित कराना चाहते थे। साथ ही इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कि पीड़ितों के साथ न्याय हो, वे मानवजाति की अन्तरात्मा को झकझोरना चाहते थें। बहरील निर्दोष लोगों के विरूद्ध किसी प्रकार की अनुचित कार्यवार्इ एक ज्यादती है, जिसका कोर्इ औचित्य किसी अन्तर्राष्ट्र्रीय या राष्ट्र्रीय विधान मे नही हो सकता, मगर यह ज्यादती उस बड़ी ज्यादती की प्रतिक्रिया थी, जो एक हड़पनेवाली सरकार द्वारा अधिकृत देश के वास्तविक नागरिको पर वर्षो से अत्यन्त भयानक रूप में होती चली आ रही थी।

भी वर्तमान में ‘‘शैतानी आयात’’ (The satanic verses) के लेखक सलमान रूशदी के विरूद्ध र्इरान के इमाम आयतुल्लाह रूहुल्लाह खुमैनी साहब द्वारा जारी किये गये कत्ल के फतवे के परिणाम स्वरूप कुछ स्थानों पर जो हिंसक घटनाएं घटी है, उन्हे भी पश्चिमी प्रेस और उसकी अंधभक्ति करते हुए भारतीय प्रेस भी इसे आतंकवाद घोषित करके उसका सम्बन्ध इस्लाम से जोड़ रहा हैं। इसी क्रम में आधुनिक इस्लाम-जगत के अन्दर ‘‘कटटरवाद’’ (Fundamentalism) की प्रवृति का वैचारिक प्रश्न भी उठाया जा रहा हैं, क्योकि र्इरान की इस्लामी कहलाने वाली क्रान्ति की सख्त कार्यवाइयों को इस्लामी कटटरवाद पर आधारित समझा जा रहा है। ‘‘कटटरवाद’ शब्द भी आतंकवाद की तरह पश्चिमी जगत् का आविष्कार हैं और इस्लाम पसन्दी पर इसको थोपने का काम भी अमरीका और यूरोप ही से शुरू हुआ हैं।

हिंसा और आतंकवाद
हिंसा (Violence) तो निश्चय ही आतंकवाद  (Terrorism) का अंग और मौलिक तत्व हैं, परन्तु क्रान्तिकारियों और अत्याचारी सत्ता के बीच होने वाले संघर्ष में प्राय: दोनो ओर से जो रक्तपात होता हैं, क्या वह हर हाल में आतंकवाद हैं? उत्पीड़न लोग यदि अत्याचारी शक्ति का मुकाबला अपनी ताकत से करते हैं या शासक के अत्याचारी के विरोधी मे और उसके विरूद्ध आवाज उठाते हुए पीड़ितो से भी कुछ ज्यादतियां हो जाएं तो राज्य का विधान इस सम्बन्ध में जो भी कार्यवाही करे, जरूरी नही कि इतिहास उसका समर्थन ही करे। जबरदस्ती को शांति नही कहा जा सकता और न उसके विरूद्ध विद्रोह को अनिवार्यत: अशांति कहा जाएगा। शताब्दियों का घटना-चक्र बात का साक्षी है कि अतीत के विद्रोही, भविष्य के क्रान्तिकारी स्वीकार किए गए हैं और उन्होने बहुधा विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में शान्ति-व्यवस्था और न्याय स्थापित करके मानवजाति की खुशहाली और समृद्धि का साधन जुटाया हैं। ‘‘हर फिरऔन के लिए एक मूसा’’ कहावत का तात्पर्य यही है, बड़े-बड़े पैगम्बरों, सुधारकों और नेताओं को उस समय के शासको ने विद्रोही कह कर सताया हैं, फिर उनके अनुयायियों और सरकारों के बीच ऐसे युद्ध हुए हैं जिनके नतीजे में अत्याचार और भ्रष्टाचार मिटा हैं और सुधार एवं कल्याण का बोलबाला हुआ हैं। अत: शक्ति प्रयोग स्वयं कोर्इ अपराध नहीं है और न ही इसका प्रयोग न करना स्वयं में कोर्इ बड़ी नेकी या भलार्इ की बात हैं। धैर्य और सहिष्णुता का महत्व अपनी जगह सर्वमान्य हैं, लेकिन अत्याचारियों के लिए आसान शिकार बन जाना और उनके मुंह मे अपने आप को दे देना बिल्कुल उससे भिन्न बात हैं। एक चीज हैं अत्याचार और दूसरी चीज हैं उसका प्रतिरोध । किसी युद्ध चाहने वाले से समझौता कर लेना हथियार डाल देने के समान है, जबकि उसका मुकाबला करना साहस और वीरता हैं। अत: जो कठोर कदम अत्याचार व भ्रष्टाचार को मिटाने और फसादियों के सिर कुचलने के लिए उठाया जाए, वह निश्चय ही न सिर्फ उचित हैं, बल्कि अपेक्षित है। राज्य का प्रमोशन देश और समाज के अवांछित तत्वों के विरूद्ध जो कठोर उपाय करता हैं उसके सही और उचित होने में किसको संदेह हो सकता है? बीसवां शताब्दी के दो व्यापक युद्धों मे फासिस्टों और नाजियों के विरूद्ध जो सैनिक कार्यवाही हुर्इ वह भी एक ऐसी ही कार्यवाही थी। अत: केवल कठोर उपायों को आतंकवाद कहना उचित न होगा। वास्तव में आतंकवाद निर्दोष और निरीह व्यक्तियो पर अत्याचार और उनको डराने-धमकाने का नाम हैं, चाहे यह पशुता एवं बर्बरता व्यक्तियों की ओर से हो, या गिरोहो, समूहो और सरकारों की ओर से। आतंकवाद के शब्द मे निर्ममता, निर्दयता और अत्याचार का भाव निहित है और यही यथार्थ उसे निन्दनीय बना देता हैं। हां यह सही हैं कि कोर्इ कठोर कदम जब अपनी उचित सीमा से बढ़कर बिगाड़ का कारण बन जाए और उसका कोर्इ सुधारवादी उद्देश्य स्पष्ट न हो तो वह आतंकवाद के दायरे मे आएगा। ऐसा दमन-चक्र जो दूसरों की जान व संपत्ति और इज़्ज़त-प्रतिष्ठा पर हाथ उठाए, आतंकवाद हैं, जबकि अपनी और दूसरों की जान, माल और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए हथियार उठाना बिल्कुल उचित कदम हैं। एक गाल पर बिना किसी कारण थप्पड़ मारनेवाले के सामने प्रत्येक स्थिति में अपना दूसरा गाल प्रस्तुत कर देना खुली कायरता है और दुष्टो का न केवल समर्थन हैं, बल्कि उनके साथ सहयोग हैं। अहिंसा की अर्द्ध दार्शनिक और अर्द्ध सूफियाना धारणा केवल एक मुखौटा और दिखाया हैं जिस पर पूर्ण रूप से प्रयोग इस व्यावहारिक संसार मे न कभी हो सका हैं, न हो सकेगा। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध निष्क्रिय अवरोध (Passive Resistance) प्रथम तो तत्कालीन सत्ता की शक्ति मे मुकाबले मे हीन भावना पर आधारित था, दूसरी बात यह हैं कि वह ही हाल में अवरोध ही थी, चाहे वह कितना ही निष्क्रिया क्यों न हो।

‘‘शक्ति के अभाव मे ंशब्द की महत्ता निराधार हैं।’’


आतंकवाद और इस्लाम
            आतंकवाद और इस्लाम बिल्कुल विपरीतार्थक शब्द हैं और ये दोनो एक जगह एकत्रित नही हो सकते, यहां तक कि इस्लाम का नाम लेकर कभी और कही कुछ मुसलमान भी आतंकवाद को बढ़ावा दे तो इस्लाम से उसका कोर्इ सम्बन्ध हरगिज नही होगा,। बल्कि यह इस्लाम धर्म की एक अवहेलना और शरीअत ए-मुहम्मदी मे एक परिवर्तन होगा, जिसे दीन व शरीअत के बदतरीन शोषण की संज्ञा दी जाएगी।
इस्लाम यातनाएं देने और भ्रष्टाचार फैलाने की अनुमति नही देता। यही बात दूसरे उन धर्मो के विषय में भी कही जा सकती हैं जिनकी वास्तविकता वह्य-ए-इलाही (र्इश्वरीय प्रकाशना) पर आधारित हैं, चाहे उनके अनुयायियों ने अपने नबियों की शिक्षाओ को कितना ही विकृत कर दिया हो, यहां तक कि उनके स्वाथी। धर्मनेता अपने धर्म का प्रयोग कितने ही गलत उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कर रहे हो, इसलिए कि दीन (धर्म) पूरे विश्व के पालनहार की निर्धारित की हुर्इ वह जीवन-पद्धति और जीवन-व्यवस्था हैं जो बिना भेद-भाव के पूरी मानवता की सुख-समृद्धि के लिए हैं। धर्म र्इश्वर का बनाया हुआ विधान हैं और फितरत (प्रकृति) के अनुकूल हैं। प्रकृति अपनी वास्तविकता की दृष्टि से आतंकवादी नही, वरना इस धरती को इंसान के लिए उपयोगी नही बनाया जाता, न ही आसमान कवियों की कल्पना के विपरीत मेहरबान होता। दुनिया की जलवायु आदमी के लिए इसीलिए अनुकूल हैं कि वह विशेष उसी के लिए बनार्इ गर्इ हैं।
मानव-जगत् की इस सच्चार्इ का प्रवर्तक सबसे बढ़कर इस्लाम ही हैं जिसकी पहचान इतिहास मे पिछले डेढ़ हजार वर्षो से शरीअत-ए-मुहम्मदी के द्वारा की जा रही हैं, क्योकि दीन (धर्म) की सार्वभौमिक कल्पना हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) की रिसालत के बाद उनकी शरीअत मे ही केन्द्रित हो चुकी है। यह शरीअत दीन-ए-इस्लाम की पिछली तमाम शरीअतों का संग्रह हैं और रसूल-ए-करीम (सल्ल0) की शिक्षाएं  पिछले तमाम नबियों की पुष्टि और उनकी शिक्षाओं का संग्रह करती है। अत: वह्य-ए-इलाही (र्इश्वरीय प्रकाशना) के अंतिम ग्रंथ के रूप में किताबुल्लाह (कु़रआन) और उसके व्यावहारिक नमूने की हैसियत से सुन्नत-ए-रसूलुल्लाह (हदीस) इस प्राकृतिक-विधान और प्राकृतिक-व्यवस्था के आदेशों और निर्देशों और उनकी व्याख्या एवं प्रयोग की दस्तावेज़ हैं, जो र्इश्वर ने धरती पर इंसान के शांतिपूर्ण और पवित्र जीवन के लिए प्रस्तावित और संकलित की हैं। अत: इस्लामी जीवन विधान सुख-समृद्धि और विकास की एक मात्र जमानत है और दुष्टाचार एवं भ्रष्टाचार के विरूद्ध सबसे प्रभावकारी सुरक्षा का साधन।
 




इस्लाम की परिभाषा
            इस्लाम एक अरबी शब्द हैं जिसकी धातु (मूल) ‘स-ल-म’ हैं और अरबी व्याकरण के अनुसार विभिन्न निष्पत्ति के अनुसार इस धातु से उत्पन्न होने वाले शब्द ‘इस्लाम’ एवं ‘तस्लीम’ हैं, जबकि इस धातु के अक्षरो से बने एक शब्द ‘‘सिल्म’’ का शाब्दिक अर्थ ‘‘अमन’’ (शांति) हैं। फिर ‘सलाम’ और ‘सलामत’ के शब्द भी हमारी भाषा से सलामती के अर्थ में प्रयुक्त एवं प्रचलित हैं। स्वयं ‘इस्लाम’ शब्द का अर्थ अपने आपकों र्इश्वर को समर्पित कर देना, उसके आगे सिर झुकाना, उसकी आज्ञा पालन और भक्ति हैं। इस्लामी दृष्टकोण से मानव का सांसारिक जीवन र्इश-भक्ति के लिए हैं और र्इश-भक्ति विश्व-शांति की जमानत है। मुस्लिम समाज में ‘‘अस्सलामु अलैकुम’’ (तुम पर सलामती हो) का रिवाज एक इस्लामी पहचान पर आधारित हैं और इसमें प्रत्येक व्यक्ति के लिए शुभ-संदेश हैं। इसका अर्थ यह हैं कि इस्लाम दुनिया में जो समाज बनाना चाहते हैं वह पूर्ण रूप से रहमत और वरदान हैं। इसकी लोगो के बीच आपस में एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति और सहयोग इसकी विशेष पहचान है।

इस्लाम की इस विशेषता का संकेत ‘‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम’’ का वह प्रसिद्ध वाक्य हैं जिससे मुस्लिम-समाज और उसके लोगो का प्रत्येक काम आरम्भ होता हैं और जो कुरआन मजीद की तमाम सूरतों का आरम्भ बिन्दू हैं। इस वाक्य में र्इश्वर की जिन दो विशेषताओं को बयान किया गया हैं वह रहमत (करूणा, दया, कृपा) पर आधारित हैं। इसका भावार्थ यह हैं कि रहम व करम (दया, कृपा) जिस प्रकार र्इश्वर की सबसे बड़ी विशेषता हैं उसी प्रकार उसके बन्दों की भी उत्कृष्ट विशेषता है। उनके जीवन मे सभी गतिविधियां और क्रिया-कलाप र्इश्वरीय कृपा की प्राप्ति के लिए होते हैं और उनका प्रत्येक काम र्इश्वर की दया और कृपा की ओर संकेत करता हैं। रहम-व-करम की इस भावना से बढ़कर शान्ति और सुरक्षा की जमानत क्या दुनिया में हो सकती हैं?


प्रतिकार का विधान
            निश्चय ही इस जगत का पालनहार सर्वशक्तिमान और न्यायप्रिय हैं और उसने दुनिया  में एक सर्वव्यापी, अपरिवर्तनशील प्रतिकार का विधान (Law of Retribution) स्थापित किया है, जिसके आधार पर जीवन में ऐसा संतुलन पाया जाता हैं, जो यदि नही होता तो पूरे विश्व में बिखराव पैदा हो जाता और कोर्इ ऐसी मापदण्ड -व्यवस्था स्थिर नही रहती जिसके अनुसार भले-बुरे के नैतिक फैसले करके दुष्टों को सजा और नेक लोगो को इनाम दिया जा सके। यह व्यवस्था भी र्इश्वर की करूणा का ही एक पहलू हैं। क्योकि इसी के अन्तर्गत बड़े-बड़े अपराधियों को दण्ड देकर बिगाड़ एवं भ्रष्टाचार का निरन्तर दमन होता रहता हैं और इस धरती का वातावरण अभी तक इंसान के लिए आनन्दमय हैं। प्रतिकार का विधान ही इस वातावरण को बार-बार साफ करके दूषित होने से बचाता रहता हैं, वरना जालिमों की फैलार्इ  हुर्इ गन्दगियों मे मानवता का दम घुट चुका होता। वास्तव में विश्व इतिहास मे असमाजिक तत्वों की विध्वंसकारियों और आतंकवादी गतिविधियों पर सबसे बड़ी बाधा और चेतावनी र्इश्वरीय शक्ति का प्रतिकार विधान ही हैं। कुरआन में है-

‘‘फिर जिस किसी ने कण भर नेकी की होगी, वह उसको देख लेगा।
और जिसने कण भर बुरार्इ की होगी, वह उसको देख लेगा।’’-99:7-8

‘‘थल और जल में बिगाड़ पैदा हो गया हैं लोगो के अपने हाथों की कमार्इ से, ताकि (र्इश्वर) मजा चखाए उनको उनके कुछ कुकर्मो का, कदाचित वे बाज आ जाए।’’ कुरआन -30:41

‘‘तेरा प्रभु ऐसा नही हैं कि बस्तियों को अकारण विनष्ट कर दे, जबकि उनके निवासी सुधारक हों।’’कुरआन - 11:117

‘‘आखिर अल्लाह को क्या पड़ी हैं कि तुम्हे अकारण यातना दे?
अगर तुम कृतज्ञता दिखलाते रहो और र्इमान की नीति पर चलो।’’कुरआन-4:147

‘‘यदि इस प्रकार अल्लाह मानवों के एक गिरोह के एक गिरोह को दूसरे गिरोह के द्वारा हटाता न रहता, तो धरती की व्यवस्था बिगड़ जाती , किन्तु संसार के लोगो पर अल्लाह की बड़ी उदार कृपा हैं।’’            -कुरआन, 2:251

यह विश्व का निरीक्षण है जो दुनिया से आखिरत तक जारी हैं, प्रकृति का पहरा हर ओर लगा हुआ हैं, प्रत्येक वस्तु की समीक्षा की जा चुकी हैं और सारे काम एक नियम से हो रहे हैं, कठोरता एवं कोमलता के मिश्रण से एक सन्तुलित मार्ग स्पष्ट है, व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनो प्रकार की समीक्षा व्यक्तिगत एवं सामुदायिक रूप से की जा रही हैं और इतिहास सबको सबक दे रहा है।

रहमते आलम (जगत् के लिए रहमत)
                    जिस प्रकार र्इश्वर ने स्वंय को ‘रब्बुल आलमीन’ (जगत का पालनहार) कहा हैं, उसी प्रकार हजरत मुहम्मद (सल्ल0) को ‘रहमतुल्लिल आलमीन  की उपाधि दी हैं। कुरआन में हैं-

‘‘ हे नबी  हमने तो तुमको दुनियावालों के लिए दयालुता बनाकर भेजा हैं।’’ कुरआन -21:107

इस प्रकार रहमते आलम(सल्ल0) का चरित्र-चित्रण करते हुए पवित्र कुरआन ने आप (सल्ल0) के लिए ‘‘रऊफुर्रहीम’’ (अत्यन्त दयालु और कृपाशील) की उन दयालुता-पूर्ण विशेषताओं का प्रयोग किया है जिनसे विश्व-स्वामी र्इश्वर की हस्ती भी अलंकृत हैं। अपने अन्तिम संदेष्टा की विनम्रता और स्नेहयुक्त स्वभाव का वर्णन र्इश्वर ने कुरआन में एक स्थान पर इस व्याख्या के साथ किया हैं कि यह उसकी विशेष कृपा हैं-

‘‘ (हे पैगम्बर) यह अल्लाह की बड़ी कृपा हैं कि तुम इन लोगो के लिए बहुत नर्म स्वभाव के हो।        कुरआन-3:159


इस सम्बन्ध में ख़्ाुदा के पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) का यह कथन अत्यन्त विचारनीय है-

    ‘‘संपूर्ण सृष्टि र्इश्वर का परिवार है, अत: र्इश्वर को सबसे अधिक प्रिय वह हैं जो उसके परिवार के साथ अच्छा व्यवहार करे।’’

अब जो शरीअत (जीवन-व्यवस्था) रब्बुल आलमील (समस्त विश्व के पालनहार) द्वारा प्रस्तावित हो और अपने जीवन में अपना कर रहमतुल्लिल आलमीन (विश्व क लिए दयालुता) ने दिखाया हो, उस शरीअत में र्इश्वर की सृष्टि के लिए कृपा, दया और न्याय का होना स्वाभाविक है। यही कारण हैं कि मानवता के इतिहास में सामाजिक न्याय (Social justice) का सर्वोत्तम उदाहरण दुनिया के समक्ष हजरत मुहम्मद (सल्ल0) की शरीअत ही ने प्रस्तुत किया हैं। ऐसी आदर्श जीवन-व्यवस्था मानव के लिए आतंक नही शांति का साधन हैं, भय और खतरा नही, शांति और सुरक्षा का कारण है।

इस्लाम में युद्ध और शांति की कल्पना
                        सर्वसुलभ दयालुता और रहमते आलम के परिपे्रक्ष्य में इस्लाम में शांति और युद्ध की कल्पना का अध्ययन अत्यन्त लाभकारी रहेगा। इस सम्बन्ध में सर्वप्रथम देखना चाहिए कि इस्लाम की दृष्टि में मानव-प्राण का महत्व कितना अधिक हैं। संसार की पहली हत्या का वर्णन करते हुए दिव्य कुरआन में धरती के सबसे पहले आतंकवादी, काबील (आदम के पुत्र) को उसके भार्इ उसकी दुश्मनी का शिकार, हाबील का यह जवाब दर्ज किया गया है कि, ‘‘ यदि तू मुझे कत्ल करने के लिए हाथ उठाएगा तो मैं तुझे कत्ल करने के लिए हाथ न उठाउंगा। ‘‘ अर्थात एक सदाचारी र्इश-भक्त कभी कत्ल की चेष्टा नही करेगा। परन्तु जब इस सुधारवादी और समझौतावादी जवाब के बावजूद दुष्ट काबील ने अन्तत: हाबील को कत्ल कर दिया तो इस घटना पर प्रकाश डालते हुए और टिप्पणी करते हुए कुरआन, अल्लाह के इस आदेश की घोषणा करता हैं-

    ‘‘इसी कारण से बनी इस्रार्इल के लिए हमने यह आदेश लिख दिया था कि जिसने किसी मनुष्य को हत्या के बदले या धरती में बिगाड़ फैलाने के सिवा किसी और कारण से मार डाला उसने मानों सारे ही मानवों की हत्या कर दी  और जिसने किसी के प्राण बचाए उसने मानों सारे मानवों को जीवन दान किया।’’    कुरआन, 5:32
इस आयत के तुरन्त बाद दूसरी ही आयत में भूतल पर दंगा-फसाद फैलानेवालों की सजा यह बतलार्इ गर्इ हैं कि अगर वे पकड़ में आने से पहले तौबा (बुरार्इ छोड़ने का प्राण) न करें तो उन्हे परिस्थिति के अनुसार कत्ल या देश निकाले की सजा दी जाए। इस सजा की व्याख्या करते हुए वर्तमान युग के सबसे बड़े इस्लामी चिन्तक मौलाना अबुल आला मौदूदी (रह0) अपने अनूदित कुरआन मजीद में लिखते हैं-

    ‘‘भूतल से अभिप्राय यहां वह देश या वह क्षेत्र है जिसमे शांति-व्यवस्था स्थापित करने का दायित्व इस्लामी सत्ता ने ले रखा हो और ख़्ाुदा व रसूल (सल्ल0) से लड़ने का अर्थ उस सदाचारपूर्ण व्यवस्था के विरूद्ध युद्ध करना हैं, जो इस्लामी सत्ता ने देश मे स्थापित कर रखा हो। इस्लामी विधि शास्त्रियों की दृष्टि में इस से मुराद वे लोग है जो सशस्त्र होकर और जत्था बनाकर डाकाजनी और लूटमार करें।’’

स्पष्ट रहे कि इस आयत में बिगाड़ और फसाद फैलानेवालों को ख़्ाुदा और रसूल से लड़ने वाला बताया गया हैं। इसके अतिरिक्त दूसरे कर्इ स्थानों पर पवित्र कुरआन ने फितना को कत्ल से बड़ा और अधिक जघन्य अपराध घोषित किया हैं। क्योकि इसकी विनाशकारियां इतनी विस्तृत और इतनी जबर्दस्त होती हैं कि पूरी की पूरी कौम तबाह और बर्बाद होकर रह जाती हैं। अत: ‘फितना’ व फसाद के अभियुक्तों के लिए इस्लाम शीध्र प्रभावी सजाएं प्रस्तावित करता हैं, ताकि समाज में बिगाड़ और आतंकवाद को फलने-फूलने का अवसर न मिले और निर्दोष व्यक्ति उसका शिकार न बने। स्पष्ट हैं कि जिस समाज में बिगाड़ और फसाद की खुली छूट होगी उसमें मनुष्य को वास्तविक राहत और प्रगति का अवसर प्राप्त नही हो सकता, चाहे वहां कुछ व्यक्ति अपनी सत्ता और धन के बल पर कुछ दिनों के लिए कितनी ही मौज-मस्ती कर ले। अत: फितना व फसाद फैलानेवाले स्वाथ्र्ाी तत्वों को कुरआन चेतावनी देता हैं-

    ‘‘वह परलोक का घर तो हम उन लोगो के लिए आरक्षित कर देंगे, जो धरती में अपनी बड़ार्इ नही चाहते, और न बिगाड़ पैदा करना चाहते हैं। और परिणामत: भलार्इ (र्इश्वर को) डर रखने वालों ही के लिए हैं।’’ कुरआन, -28:83

इस सम्बन्ध में इस्लाम विश्व में एक सर्वव्यापी सुधार का सिद्धान्त प्रस्तुत करके मानवता के सकारात्मक आधारों और उसके रचनात्मक उददेश्यों पर बल देता हैं। कुरआन में है-

    ‘‘धरती मे बिगाड़ पैदा न करो, जबकि उसका सुधार हो चुका हैं, और अल्लाह ही को पुकारो भय के साथ ओर लोभ के साथ। निश्चय ही अल्लाह की दयालुता अच्छे चरित्र वाले लोगो के समीप हैं।’’ कुरआन, - 7:56

इस आयत में एक विश्व-व्यापी संतुलन की ओर संकेत हैं जिसकी स्थापना पर ही जीवन की समस्त क्रिया-कलापो का अस्तित्व निर्भर करता हैं। अत: जो लोग सरकशी और अत्याचार करके इस संतुलन को भंग करते हैं वे फितना (फसाद)  फैलाने वाले और भ्रष्ट अपराधी हैं जिनसे संघर्ष और उनका दम नही इंसान का एक नैतिक दायित्व होने के साथ-साथ उसकी प्रकृति की मांग भी हैं। कुरआन इस मांग को स्वीकार करते हुए भी प्रतिकार के लिए उचित सीमाएं निश्चित करता हैं-

‘‘ और यदि तुम लोग बदला लो तो बस उतना ही ले लो जितनी तुम पर ज्यादती की गर्इ हो। किन्तु यदि तुम धैर्य से काम लो तो निश्च ही यह धैर्यवानों ही के लिए अधिक अच्छा हैं।’’        कुरआन, 16:126

‘‘ अत: जो तुम पर हाथ उठाए, तुम भी उसी तरह उस पर हाथ उठा सकते हो, अलबत्ता र्इश्वर से डरते रहो और यह जान रखो कि र्इश्वर उन्ही लोगो के साथ है, जो उसकी सीमाओं के उल्लंघन से बचते हैं।’’ कुरआन-2:194

यह अत्याचार के मुकाबले मे एक रक्षात्मक ढंग है जिसका उद्देश्य स्पष्टत: अत्याचार की रोकथाम और न्याय-व्यवस्था की स्थापना हैं। यही वह उच्चतम सृजनात्मक एवं सुधारवादी उद्देश्य है जिसके लिए इस्लाम ने अपने अनुयायियों पर जिहाद अनिवार्य किया हैं। कुरआन है।-

‘‘अनुमति दी गर्इ उन लोगो को जिनके विरूद्ध युद्ध किया जा रही हैं, क्योकि वे अत्पीड़ित है और अल्लाह को निश्चय ही उनकी सहायता की सामथ्र्य प्राप्त है। ये वे लोग हैं जो अपने घरो से अनुचित रूप से निकाल दिए गए केवल इसलिए कि वे कहते थे, हमारा प्रभु अल्लाह है।’’



आतंकवाद: इस्लाम की दृष्टि में
                    इस्लाम धर्म के विश्वास और नैतिक व्यवस्था के सम्बन्ध में उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि इस्लाम आतंकवाद और आतंकवादी गतिविधियों को सहन नही करता हैं। वस्तुत: इस्लामी जीवन-व्यवस्था मनुष्य को उन सभी पाश्विक प्रवृतियों, मानसिक उलझनों और आर्थिक प्रतिद्विन्द्वता से मुक्ति दिलाती है, जो वर्तमान युग के प्रचलित दर्शनो और विज्ञान ने अपने अविष्कारों और अन्वेषणों की त्रृटि से मानव-प्रकृति के अन्दर खोज निकाली है या उन पर थोप दी है। वास्तव में यह आधुनिक भौतिकवाद, मनोविज्ञान और अर्थशास्त्र की कल्पनाएं हैं जिन्होने इंसान की प्रकृति और आवश्यकताओं को आधार बनाकर मनुष्य को निरे पाश्विक आधार पर इस प्रकार गिरोह और वर्गो में विभक्त किया हैं कि आपस मे आकर्षण और सहयोग के बजाय तनाव और संघर्ष तनाव और संघर्ष मानवीय इतिहास की नियति बन गया हैं। अत: हर व्यक्ति और गिरोह दूसरे व्यक्ति और गिरोह के साथ सिर्फ अपने स्वार्थ एवं लाभ की पूर्ति के लिए संघर्षरत हैं। अविश्वास और स्वार्थ-लोलुपता के कारण व्यक्ति और समूहो, कौमो और देशो के बीच निरंतर संघर्ष हो रहा हैं। लेकिन इस्लाम एक सृष्टिकर्ता के द्वारा मानव का सृजन सारे मानव को एक और एक औरत की संतान और र्इश परायणता एवं परहेजगारी को सम्मान एवं प्रतिष्ठा का एकमात्र मापदंड स्थिर करके मानव-जगत् में युद्ध एवं संघर्ष के प्रेरक एवं संघर्ष के प्रेरक तत्वों को औचित्य समाप्त कर देता हैं और समझौता एवं शांति की सार्वकालिक एवं सार्वभौमिक वास्तविकता पर ताकीदी निशान लगा देता हैं। यही कारण है कि बहुदेववाद और एकेश्वरवाद की तुलना करते हुए कुरआन र्इमानवालों को शांति का विशेष अधिकारी घोषित करता हैं-

‘‘ दोनो दलों (मोमिन व मुशरिक) में से कौन अधिक निश्चिन्तता का अधिकारी है? बताओं अगर तुम्हे कुछ ज्ञान हैं। वास्तव में तो निशिचन्तता (अमन) उन्ही के लिए है और सही मार्ग पर वही है जो र्इमान लाए और जिन्होने अपनी आस्था के साथ लिप्त नही किया।’’-6:82-83

‘‘र्इमान’ और ‘मोमिन’ शब्द जिस मूल धातु से बने हैं अर्थात् ‘अ-म-न’ उसका उच्चारण अमन ही हैं। इस प्रकार र्इश्वर पर पूर्ण विश्वास जो जुल्म से पाक हो, शांति का कारण और गारंटी हैं। अत: शांति का वास्तविक सम्मान और उसकी सुरक्षा भी र्इमानवाले ही कर सकते हैं। इसी यथार्थ को दृष्टि मे रखते हुए कुरआन ने अशांति, भ्रष्टाचार और दुष्टता को कत्ल (हत्या) से भी बड़ा अपराध घोषित किया है।
    ‘‘और फितना रक्तपात से भी अधिक संगीत (अपराध) हैं।’’
यह बात उस आतंकवाद के सम्बन्ध मे कही गर्इ हैं, जो मक्का के काफिरो ने मुसलमानों के विरूद्ध जारी कर रखा था। ये काफिर लोग निर्दोष और शांतिप्रिय मुसलमानों के विरूद्ध निरन्तर आतंकवादी कार्यवाइयां करके उन्हे हर प्रकार से आतंकित एवं परेशान किया करते थे। अत: कुरआन ने उनकी इस यातना दायक दुष्टता और बर्बरता का उपद्रवजनित “ाड्यंत्र की संज्ञा दी और उसे जघन्य अपराध बतलाया। क्योकि इससे पूरे समाज में विनाश फैल रहा था और लोगो का सुख-चैन नष्ट हो रहा था।

इन संकेतो से ज्ञात होता है कि आतंकवाद की विभीषिका इस्लाम की दृष्टि में कठोरतम दण्ड की अधिकारी है और एक न्यायप्रिय सरकार तथा सदाचारी समाज को अपने सभी साधनो और पूरी शक्ति से काम लेकर आतंकवादीयों का दमन और आतंकवाद की कमर तोड़नी चाहिए। इस्लामी राज्य हरगिज किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को, उनकी शिकायतें जो भी हो, इस बात की अनुमति नही देता कि वह कानून अपने हाथों में लेकर मनमानी करें। उनकी जायज शिकायतें दूर करने के लिए इस्लामी न्यायालय मौजूद हैं, जिस के फौजदारी कानून की सारी कठोरता जालिमों और अपराधियों के विरूद्ध हैं। अत: अगर कोर्इ पीड़ित हैं तो उसकी सुरक्षा और उसकी क्षति पूर्ति सरकार स्वयं करेगी, पीड़ित को अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए भी जालिम बनने की आवश्यकता नही हैं। आतंकवाद एक बर्बरतापूर्ण कार्य हैं और इस्लाम की सभ्य व्यवस्था में इसकी कोर्इ गुंजाइश नही। इस्लाम इंसान को केवल र्इश्वर का भय दिलाता हैं, अत: वह किसी इंसान को इसकी अनुमति नही दे सकता कि वह लोगो को अपना भय दिलाए और उन्हें भयभीत करके अपने उद्देश्यों की पूर्ति करे। समाज में तनाव और संघर्ष इस्लाम को गवारा नही, वह ह प्रकार के संघर्ष और चपकलश समाप्त करके एक शांतिपूर्ण वातावरण में व्यक्तियों के बीच प्रेम, सौहार्द, भार्इचारा और सामूहिक कल्याण के कामों में सहयोग के अवसर पैदा करना चाहता है, ताकि र्इश्वर के बन्दे एकाग्रता के साथ अपनी और जगत की सृष्टि के उददेश्यो की पूर्ति में बेरोक-टोकक्रियाशील रहें। दुनिया में सत्यनिष्ठा और र्इश-परायणता के साथ सदव्यवहार करके आखिरत की सफलता का प्रबन्ध करें।
इस्लामी जिहाद की शान है कि अत्याचारी सत्ता के समक्ष सत्य की स्पष्ट घोषणा करना इसकी सर्वश्रेष्ठ विशेषता है और जालिम को उसके जुल्म से रोकने की कोशिश र्इमान की पहचान हैं, क्योकि लोगो को बुरार्इ से मना करना और अच्छार्इ की शिक्षा देना उम्मत-ए-मुस्लिमा (मुस्लिम समुदाय) का उत्कृष्ट चरित्र और अनिवार्य कर्तव्य है। यह जिहाद बुरार्इ के विरूद्ध अच्छार्इ का संघर्ष हैं और असत्य के साथ सत्य की पंजा आजमार्इ हैं, जिसमें शक्ति का प्रयोग किसी विंध्यवंसक कार्यवाही के लिए नही, केवल रचनात्मक उददेश्यों के लिए होगा। यह सत्यनिष्ठा और सत्य के लिए यत्न आतंकवाद और आतंकवादी गतिविधियों के लिए मृत्यु  संदेश हैं, चाहे इसका अभियुक्त कोर्इ भी हो, कोर्इ संगठन करे या कोर्इ सरकार।

Author Name: आतंकवाद और इस्लाम : डा0 अब्दुल मुग़नी