पशु-बलि (कुरबानी) और इस्लाम

पशु-बलि को विश्व के दो बड़े धर्मो, सनातन धर्म और इस्लाम धर्म में मान्यता प्राप्त हैं; सनातन धर्म के अनुसार ‘देवताओं को प्रसन्न करने के लिए’। और इस्लाम धर्म के अनुसार ‘अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए’ पशु-बलि का विधान हैं। सनातन धर्म में ‘देवताओ। को प्रसन्न करने’ से क्या अभिप्रेत हैं और मनुष्य के आध्यात्म, आचार-विचार एवं चरित्र व आचरण पर पशु-वध के क्या अच्छे प्रभाव पड़ते हैं तथा मनुष्य के व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन मे नैतिक स्तर पर, पशु-वद्य द्वारा कैसे सकारात्मक प्रभाव पड़ने अपेक्षित हैं यह इस लेख का विषय नही, अपितु सनातन धर्मावलंबियो, विचारकों एवं धर्म-विद्याचार्यो के लिए अपने आप में एक शोध-विषय हैं। अलबत्ता, इस संबंध में इस्लामी दृष्टिकोण यह हैं- इस्लाम में इस्लामी कैलेंडर (हिजरी सन्) के बारहवें मास ‘जिल-हिज्जा’ की दसवी, ग्यारहवी व बारहवीं तिथि को ‘र्इद-उल-अजहा’ त्योहार के अवसर पर पशु की बलि दी जाती हैं जिसे कुरबानी कहा जाता हैं। इसके अतिरिक्त हज को जाने वाले हर व्यक्ति पर भी यह कुरबानी अनिवार्य हैं। विश्व के अन्य भागो मे जानवर की कुरबानी करने की सामथ्र्य रखनेवाले हर मुसलमान पर (जो बालिग भी हो) कुरबानी अनिवार्य हैं। यह बलि, निर्दयता व हिंसा का द्योतक नही हैं। यह न मात्र पशु-हत्या हैं, न ही मात्र एक धार्मिक रीति जिसका कोर्इ महान ध्येय और मनुष्य के जीवन की व्यावहारिकताओं में कोर्इ रचनात्मक भूमिका एवं महत्वपूर्ण योगदान न हो। कुरबानी का एक प्रामाणिक व विश्वसनीय इतिहास हैं जो विश्व के सबसे अधिक प्रामाणिक र्इश-ग्रन्थ (हिन्दू धर्म-ग्रन्थों मे स्पष्ट रूप् से पशु-वध की अनुमति तथा आदेश मौजूद हैं। देखे:

मनु-3/123, 3/268, 5/23, 5/27-28, 5/35-36
ऋ0-10/27/2, 10/28/3
अथर्व0-9/6/4/43/8
श0ब्रा0-3/1/2/21)

‘कुरआन’ मे उल्लिखित हैं तथा जिसकी व्याख्या अंतिम र्इश-दूत (पैगम्बर) हजरत मुहम्मद (सल्ल0) के अति विश्वसनीय कथनों (हदीस) में वर्णित हैं। इतिहास के साथ-साथ इसका असल उद्देश्य भी, इस्लाम के उपरोक्त दोनों मूल-स्रोतो में खोल-खोलकर वर्णित कर दिया गया हैं। इस इतिहास पर एक दृष्टि डाल लेना कुरबानी की इस्लामी अवधारणा को समझने के लिए अनिवार्य हैं।

कुरबानी का इतिहास

            कुरबानी का इतिहास 4000 वर्ष पुराना हैं जिसका आरंभ इस्लाम (तथा यहूदी व र्इसार्इ धर्म) के महान पैगम्बर हजरत इब्राहीम (अलैहि0) से संबंधित एक असाधारण घटना से होता है। यह घटना तीनों धर्मो के धर्म-ग्रन्थों में उल्लिखित हैं तथा कुरआन, इन तीनों में एक मात्र प्रामणिक र्इश-ग्रंथ हैं।

4000 वर्ष पूर्व जब अज्ञानता के घोर अंधकार में, मानव-जाति निराकार एकेश्वरवाद की सीधी राह से भटक कर साकार अनेकेश्वरवाद की मिथ्या धारणा में फंसी हुर्इ थी; सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्रों, तारो, पत्थरो, प्रेतात्माओं, पूर्वजों और शक्तिशाली शासकों की उपासना और मूर्ति-पूजा में लिप्त तथा नाना प्रकार के अंधविश्वासों व आडम्बरों से ग्रस्त थी। अपने से तुच्छ थी। अपने से तुच्छ पदार्थो के सामने एवं अपने ही जैसे मनुष्यों के चरणों में शीश नवाते-नवाते मनुष्य की गरिमा, गौरव व स्वाभियान  (जो र्इश-प्रदत्त था) अपमानित और छिन्न-भिन्न हो चुका था, तात्कालिक पूरी मानव-जाति मे एकेश्वरोपासक एक भी व्यक्ति बाकी न रह गया था। इन विषम परिस्थितियों मे र्इराक के ‘उर’ नामक नगर के वासी ‘महंत-महापुजारी’ ‘‘आजर’’ के घर मे, उसी के बेटे ‘इब्राहीम को र्इश्वर ने, शिर्क (अनेकेश्वर-पूजा) के घोर मे तौहीद( विशुद्ध एकेश्वरवाद) की ज्योति जलाने के लिए चुन लिय और उन्हे अपना पैगम्बर (र्इश-दूत) नियुक्त किया।

हजरत इब्राहिम ने शिर्क के विरूद्ध ऐसे सशक्त एवं बुद्धिसंगत तर्क दिए जिनकी कोर्इ काट नही थी। फिर भी उनका घोर विरोध किया गया। वे इस ज्योति का प्रकाश फैलाने इराक से फिलिस्तीन, वहॉ से मिस्र और वहॉ से अरब प्रायद्वीप के मध्य-पश्चिम भाग मे गए। अल्लाह ने उनपर एक अत्यन्त कठिन कर्तव्य का भार डाला था। यह कर्तव्य एक ऐसा व्यक्ति ही निभा सकता था जो र्इश-आज्ञापालन, र्इश-भय, र्इशपरायणता एवं र्इश्वर के समक्ष संपूर्ण आत्मसमर्पण मे उत्कृष्ट, सुदृढ़ और अडिग हो। हर स्वार्थ, हर सुख, हर मनोकामना, हर लाभ, हर इच्छा और हर तरह के प्रेम हेतु बलि दे सकता हो। इतना उॅचा चरित्र और ऐसा सशक्त आत्मबल हजरत इब्राहीम के व्यक्तित्व में उत्पन्न करने के लिए अल्लाह ने बड़ी-बड़ी कठिनाइयों से गुजारकर उन्हे तैयार भी किया, प्रशिक्षण भी दिया और कर्इ कठिन परीक्षाएं भी जी। हर परीक्षा मे हजरत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) स्वंय को उत्तीर्ण सिद्ध करते गए यहां तक कि र्इश्वर ने उनकी अंतिम कठोरतम परीक्षा लेने का इरादा किया। उन्हें आदेश दिया कि (र्इश्वर के लिए) अपने पुत्र ‘इस्मार्इल’ की बलि दे।

इस्मार्इल (अलैहि0) इब्राहीम (अलैहि.) के इकलौते बेटे थे। वे बड़ी मिन्नत और आरजू के बाद इब्राहीम (अलैहि0) के बुढ़ापे मे पैदा हुए थे। अत: सहज ही इसका अनुमान लगाया जा सकता हैं कि इस्मार्इल (अलैहि0) इब्राहीम (अलैहि0) को कितने अधिक प्रिय और ऑखों के तारे रहे होंगे। अत: हजरत इब्राहीम (अलैहि0) अपने इकलौते पुत्र इस्मार्इल (अलैहि0) से बहुत अधिक प्यार करते थे। कोर्इ साधारण व्यक्ति होता तो ये बाते र्इश-आज्ञापालन में अवरोधक बनकर उसके आत्मबल को विचलित कर देने के लिए काफी होती और वह इस कठोर र्इश्वरीय परीक्षा मे नाकाम हो जाता लेकिन जिस व्यक्ति से र्इश्वर को भावी संसार में इंसानी नस्लों के लिए एकेश्वरवादी धर्म की मजबूत व चिरस्थायी नींव रखवानी थी उस व्यक्ति-हजरत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने इस परीक्षा में भी कामयाब होने की ठान ली। बेटे को इस र्इश्वरीय आदेश के बारे में बताया तो बेटे (इस्मार्इल) ने कहा, ‘‘ पिताजी, अल्लाह की ओर से जो आदेश हुआ हैं उसे पूरा कीजिए, र्इश्वर ने चाहा तो आप मुझे धैर्यवान और जमे रहनेवाला पाएंगे। ‘‘ घर से कुछ दूर ‘मिना’ की एक पहाड़ी पर ले जाकर बाप ने बेटे को लिटा दिया। छुरी गर्दन पर फेरने ही वाले थे कि र्इशवाणी हुर्इ कि ऐ इब्राहीम ! तुम परीक्षा में पूरे उतरे। प्रतिदिन के रूप में इस दुंबे (भेड़ समान पशु) की बलि दे दो। पास ही एक दु्रबा खड़ा हुआ मिला। हजरत इब्राहीम (अलैहि0) ने उसे कुरबान किया। कुरआन ने इसे ‘जिब्हिन-अजीम’ अर्थात् ‘महान बलिदान’कहा हैं।

इसी महाबलिदान को याद करने और याद रखने के लिए उसी तिथि को 4000 वर्ष से पशुओं की बलि और कुरबानी की रीति चली आ रही हैं।
काल-कालांतर मे इसमें कुछ विकृतियॉ आ गर्इ थी। लोग इस कुरबानी की असल स्पिरिट भी भूल चुके थे। आज से 1400 वर्ष पूर्व जब पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) के माध्यम से विशुद्ध एकेश्वरवादी धर्म का पुनरागनम हुआ और आप (सल्ल0) पर र्इशवाणी (कुरआन) अवतरित हुर्इ तो कुरबानी के इतिहास को भी उसके शुद्ध व स्वच्छ रूप् मे लोगो के समक्ष लाया गया। र्इश-दूत हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने लोगो के सामने इसकी विस्तृत व्याख्या की ओर इस पर स्वंय अमल करके भी दिखाया। कुरआन मे अल्लाह ने फरमाया, ‘‘ (पशु का) न मांस अल्लाह तक पहुॅचता हैं न रक्त, अपितु उस तक जो चीज पहुॅचती है वह है तुम्हारा तकवा (र्इशपरायणता)।’’ हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने अपनी उंगली सीने पर हृदय के स्थान रखकर तीन बार फरमाया, ‘‘तकवा यहॉ होता है, तकवा यहॉ होता है, तकवा यहॉ होता है।’’ कुरआन और हदीस का एक पारिभाषिक शब्द हैं जिसका भावार्थ है ‘‘र्इश्वर की अवज्ञा (नाफरमानी) से बचते हुए जीवन का क्षण-क्षण बिताना’’। अर्थात् कोर्इ भी कार्य करते समय यह ध्यान अवश्य रखना कि कही वह र्इश्वर की दृष्टि में अनुचित, अवैध, वर्जित और पाप तो नही हैं (अनुचित, अवैध और पाप होने की पूरी व्याख्या कुरआन और हदीस मे उल्लिखित हैं)। अगर किसी काम में अल्लाह की नाफरमानी व अवज्ञा हैं तो उसपर अमल करना छोड़ देने को भी इस्लामी परिभाषा मे ‘तकवा’ कहते हैं।


निष्कर्ष

        उपरोक्त विवरण का निष्कर्ष यह हैं:

    सृष्टि के सृजनकर्ता-अल्लाह - ने पृथ्वी की सारी जीवधारी वस्तुए मनुष्य के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उपयोग के लिए बनार्इ हैं। प्रत्येक उपभोग मे ‘मांसाहार’ भी आता हैं एवं इसे इस्लामी व गैर-इस्लामी समाजों में समान रूप् से मान्यता प्राप्त हैं। कुछ व्यक्तिगत या सीमित सामुदायिक अपवाद भी है जो नगण्य है।
    इस्लामी समाज में प्रचलित पशु-बलि (कुरबानी) का एक उत्कृष्ट व पवित्र इतिहास हैं। 1400 वर्ष से प्रतिवर्ष उसी इतिहास की याद ताजा की जाती हैं और मुस्लिम-समाज इस कुरबानी के माध्यम से अपने और अल्लाह के बीच ‘दास’ व ‘स्वामी’ के संबंध को घनिष्ट व दृढ़ करता हैं।
    कुरबानी के माध्यम से एक मुस्लिम व्यक्ति प्रयास करता हैं कि अपने अन्दर र्इश-भय (तकवा) के गुण को उन्नति व वृद्धि दे। बुरे और पाप के कामों से बचे ।
    कुरबानी के माध्यम से एक मुस्लिम व्यक्ति अपने अन्दर यह आत्मबल पैदा करने की आध्यात्मिक शक्ति अर्जित करता हैं कि सत्यनिष्ठ जीवन बिताने के लिए तथा र्इश आज्ञापालन मे वह बड़े से बड़े स्वार्थ, लाभ, हित और भावनाओं की कुरबानी दे सके और सत्य-मार्ग से विचलित कदापि न हो।

जीव-हत्या अपने में न तो सही हैं न गलत, न उचित हैं न अनुचित, न निन्दनीय हैं न सरायनीय। यह बात यूॅ भी कही जा सकती हैं कि जीव-हत्या अपने आप मे सही भी हैं, और गलत भी। सही या गलत होना इस बात पर निर्भर हैं कि जीव-हत्या का ‘उद्देश्य’ क्या हैं- और जीव-हत्या के संबंध में इस्लामी दृष्टिकोण भी यही हैं- मिसाल के तौर पर एक जीवित मेंढक की अनर्थ हत्या करके उसे फेंक दिया जाए तो यह इस्लाम की दृष्टि मे निर्दयता, हिंसा एवं पाप हैं लेकिन चिकित्सा-विज्ञान के विद्यार्थियों को शल्य-प्रशिक्षण (Surgical Training) देने के लिए उनके द्वारा मेडिकल-कालेजों मे जो मेढको को चीरा-फाड़ा जाता हैं वह निरर्थक व व्यर्थ कार्य न होकर मनुष्य व मानव-जाति की सेवा के लिए होता हैं इसीलिए यह न निर्दयता हैं, न हिंसा,  न पाप; बल्कि लाभदायक, वांछनीय व सराहनीय हैं। हमारा विश्वास हैं कि हत्या व हिंसा के उचित या अनुचित होने का यही मापदण्ड, सम्पूर्ण मानव समाज में, प्राचीन काल से लेकर वर्तमान युग तक मान्य व प्रचलित रहा हैं। यही मानव-प्रकृति के भी अनुकूल है और मानव-जीवन की स्वाभाविक आवश्यकताओं के तकाजों (Requisites) के अनुकूल भी। क्योकि इस्लाम इस्लाम एक स्वाभाविक व प्राकृतिक धर्म हैं, इसी लिए वह उपरोकत बौद्धिक, संतुलित और स्वाभाविक वैश्विक सिद्धान्त का पक्षधर हैं।

Author Name: मुहम्मद जैनुल-आबिदीन मंसूरी