जीव हत्या और पशु-बलि इस्लाम की नजर में

जीव-हत्या और इस्लाम
                सृष्टि और स्रष्टा में संबंध  सामान्य नियम हैं कि किसी समग्र (Totality) में से उसके किसी ‘अंश’ (Part) को अलग करके उसे ठीक से और पूरी तरह समझा नही जा सकता। ज्ञान-विज्ञान की सारी प्रणाली इसी सिद्धान्त की धुरी पर घूमती हैं। इस्लाम, इस्लामी शरीअत (विधान) तथा इस्लामी शिक्षाओं, नियमों, आदेशो व धार्मिक रीतियों की वास्तविकता और यथार्थता को समझने पर भी यही सिद्धान्त लागू होता हैं। पशुओं के साथ मनुष्य का व्यवहार कैसा हो और इस व्यवहार की उचित सीमा क्या हो? यह जानने के लिए सृष्टि, मनुष्य तथा पृथ्वी पर विद्यमान प्राणियों एवं इन सबके स्रष्टा मे परस्पर क्या और कैसा संबंध हैं, इसपर विचार करना आवश्यक हैं। इसके बिना उपरोक्त प्रश्न का उत्तर नही मिल सकता। अत: आवश्यक हैं कि पहले इसे समझने का प्रयास किया जाए।

इस्लाम की मूलधारणा है कि समस्त सृष्टि का रचयिता व स्रष्टा ‘र्इश्वर’ हैं.......एक, अकेला र्इश्वर। वह निराकार, सर्वविद्यमान, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ एवं अपार तत्वदश्र्ाी हैं। वह पूरी सृष्टि का पालक-पोषक, संयोजक-प्रबंधक एवं स्वामी ‘(Lord) हैं। मनुष्य इसी सृष्टि का अंश है और ब्रहम्माण्ड मे मौजूद हर वस्तु की तरह यह पृथ्वी, एवं इसके उपर या इसके भीतर विद्यमान सारे पदार्थ, जीवधारी व अजीवधारी, चल व अचल वस्तुए भी उसी स्रष्टा द्वारा सृजित हैं। इस्लाम के अनुसार अल्लाह ‘(र्इश्वर) की अपार व असीम तत्वदर्शिता ‘(Absolute Wisdom) एवं उपरोक्त अन्य गुणों ‘(Attributes) की अपेक्षा यह है कि समस्त मानवजाति का पूर्ण मार्गदर्शन र्इश्वर ही करे, अर्थात मार्गदर्शन का यह कार्य स्वयं मनुष्य पर न छोड़ दे।

इस्लाम, मनुष्य को सृष्टि की एक पूर्ण इकार्इ मानता हैं जो आध्यात्मिक, नैतिक, शरीरिक व भौतिक सभी पहलुओ को समाहित किए हुए है। अत: इस्लाम की दृष्टि मे मनुष्य की समस्त वैयक्तिक व सामाजिक जीवन-प्रणाली र्इश्वरीय मार्गदर्शन के अंतर्गत होनी चाहिए। इस जीवन-प्रणाली में आस्था व धारणा, उपासना व पूजा, दाम्पत्य, पारिवारिक व सामूहिक संबंध, पारस्परिक अधिकार व कर्तव्य, आचरण, व्यवहार तथा खान-पान एवं जीवनयापन शैली में उचित व अनुचित, वैध व अवैध, वांछनीय और आर्थिक व राजनीतिक व्यवस्था आदि से लेकर, मनुष्य के सृजन के र्इश्वरीय उद्देश्य पर अमल एवं अन्य सारी सृष्टि के साथ मनुष्य के संबंध की रूपरेखा तक.......हर चीज आती हैं। इस्लाम की धारणा हैं कि यह संसार मनुष्य के लिए बनाया-सजाया गया हैं और स्वयं मनुष्य को र्इश्वर ‘(के आज्ञापालन, उपासना एवं उसके प्रति समर्पित रहने) के लिए। इस संसार के सारे प्राणी व जीवधारी तथा सभी चल या अचल चीजे मनुष्य की सेवा व उपयोग के लिए बनार्इ गर्इ हैं और वे सब, प्रत्यक्ष ‘(Direct) या अप्रत्यक्ष ‘(Indirect), चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने मनुष्य की सेवा कर रही हैं। प्रत्यक्ष रूप से अनेक वनस्पतियॉ, वृक्ष, अनाज, फल, तरकारियॉ आदि, अनेक पशु-पक्षी व समुद्री जीव ‘(मछलियां) आदि मनुष्यों के आहार, सवारी, बोझ ढोने, औषधि व स्वास्थ्य-सामग्री एवं सामान्य उपयोग के लिए सृजित किए गए हैं। अप्रत्यक्ष रूपसे असंख्य कीट-कीटाणु, जल-प्राणी, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी इस संसार, वायुमण्डल एवं पृथ्वी के गर्भ मे उसी प्रकार मानवजाति की सेवा मे तल्लीन हैं जिस प्रकार सूर्य, चन्द्रमा व तारागण का प्रकाश, उष्मा व उर्जा, हवाएॅ, बादल, वायुमंडल एवं पूरा सौर-मंडल’(Solar system)।



प्रत्येक जीवधारी मनुष्य के उपभोग के लिए हैं

                        उपरोक्त विवरण के बाद जीव-हत्या के संबंध में इस्लामी दृष्टिकोण को सरलतापूर्वक समझा जा सकता हैं। हर जीवधारी ‘(वनस्पति या पशु-पक्षी आदि) को मनुष्य के उपभोग के लिए पैदा किया गया हैं। पेड़-पौधों, फलों, तरकारियों आदि को काटना ‘(और खाना एवं उपभोग में लाना) भी उसी प्रकार ‘जीव-हत्या’ हैं जिस प्रकार मछलियों, पक्षियों एवं पशुओं को खाने के लिए उनकी हत्या करना। आभिष और निराभिष दोनो प्रकार की खाद्य-सामग्री के उपभोग को सभी धर्मो एवं धार्मिक समाजों व समुदायों में मान्यता प्राप्त रही हैं। इस्लाम भी इसे मान्यता देता हैं। व्यर्थ पशु-वध-अर्थात किसी पशु को यू ही मारकर छोड़ देना, शिकार या मनोरंजन का शौक पूरा करने के लिए किसी जीवधारी को मारकर फेंक देना-इस्लाम में वर्जित हैं। लेकिन सार्थक उद्देश्यों के लिए, इस्लाम न केवल जीवधारियों ‘(वनस्पतियों व पशु-पक्षियों आदि) के आहार व उपयोग हेतु मनुष्य को अनुमति देता हैं बल्कि कहता हैं कि इन्ही  दो उद्देश्यो  की पूर्ति हेतु इन्हे पैदा किया गया हैं। इस प्रकार देखा जाए तो इस्लाम का दृष्टिकोण कोर्इ अनोखा, अकेला, अभूतपूर्व, अमान्य, अस्वाभाविक व अप्राकृतिक दृष्टिकोण नही हैं बल्कि कुछ नगण्य अपवादों को छोड़कर अतीत से वर्तमान तक के मानव-इतिहास मे मनुष्यों, समाजो, जो इस्लाम का दृष्टिकोण एवं इस्लाम के अनुयायियों का व्यावहारिक आचरण हैं।


इस्लाम मे हलाल और हराम

                    इस्लाम की विशिष्टता इस संबंध मे यह हैं कि वह अन्य समाजों के विपरीत, मांसाहार के विषय मे एक निश्चित आचार संहिता (Code of conduct) अपने अनुयायियों को प्रदान करता हैं जिसे इस्लामी विधान (शरीअत) की परिभाषा में ‘हलाल’ (वैद्य) और ‘हराम’ (अवैध) कहा गया हैं। इसकी सीमा का निर्धारण स्वयं अल्लाह ने (कुरआन में) कर दिया हैं तथा इसकी विस्तृत व्याख्या अल्लाह के पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) के आदर्श (सुन्नत, सीरत व हदीस) में कर दी गर्इ हैं। जैसा कि पहले लिखा जा चुका है कि अल्लाह (र्इश्वर) की तत्वदर्शिता व ज्ञान अपार, असीम और पूर्ण हैं, और चूकि वह इंसान सहित सृष्टि की हर वस्तु का सृजनकर्ता भी हैं अतएव, यह वही बेहतर तौर से जानता है कि आहार के लिए कौन-सी वस्तुए मनुष्य के शारीरिक हित (स्वास्थ्य) एवं उसके आध्यात्मिक हित (नैतिकता व चरित्र) के लिए लाभदायक या हानिकारक हैं । अत: इस्लाम ने कुत्ते, सूअर, दरिन्दों एवं चंगुल से उठाकर आहार मुॅह मे डालनेवाले पक्षियों तथा इंसानों का मांस खाना अवैध (हराम) करार दिया हैं। हमारे भारतीय समाजों और अधिकतर धार्मिक समुदायों मे भी, सामान्य स्तर पर, मांसाहार के लिए ‘उचित’ व अनचित’ का यही इस्लामी मापदण्ड प्रचलित हैं। लेकिन संसार मे कुछ कौमे, जातियॉ, समुदाय और इक्का-दुक्का लोग ऐसे भी हैं मनुष्य, कुत्ते और सूअर आदि का मांस भी खाते हैं। इसके कुप्रभावों को सहज रूप से देखा जा सकता हैं कि ऐसे लोगो और कौमों मे कैसे-कैसे पाश्विक व राक्षसीय अवगुण उत्पन्न हो जाते हैं। उनके शील-स्वभाव और चरित्र कैसे-कैसे नैतिक दुर्गुणों से दूषित एवं पतन-ग्रस्त होते हैं। इस्लाम की विशिष्टता हैं कि वह जीव-हत्या और मांसाहार के विषय पर अतिवादी (Exrtemist) नही, अपितु संतुलित जीवन-व्यवस्था का समर्थक एंव पक्षधर है। इस्लाम न तो ‘अहिंसा’ और ‘दया’ के नाम पर मनुष्य को उन खाद्य-पदार्थो व आहार-सामग्रियों से वंचित करता है जो मनुष्य के आहार व उपभोग के लिए ही सृजित व उत्पन्न की गर्इ हैं और न ही यह मनुष्य को इतना स्वतंत्र छोड़ देता हैं कि जो भी जी में आए खाए-पिए और जीवधारियों की व्यर्थ हत्या करे। यह व्यर्थ हत्या ही वास्तव मे इस्लाम की दृष्टि मे निर्दयता हैं। हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने आदेश दिया हैं कि पशुओं से उनकी शक्ति एवं सामथ्र्य से अधिक काम न लिया जाए, उनपर इतना बोझ न लादा जाए कि वे उठा न सके और उन्हें भूखा न रखा जाए। मांसाहार के लिए पशु को जिब्ह (Staughter) करने को इस्लाम ने अनिवार्य किया ताकि पशु के शरीर से सारा रक्त निकल जाए क्योकि यदि रक्त पशु के अन्दर ही रहकर कोशिकाओं में जम जाए तो उसका मॉस स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाता हैं । साथ ही इस्लाम ने यह भी आज्ञा दी कि जिब्ह करते समय छुरी की धार मरी हुर्इ (कुंद) न हो बल्कि बहुत तेज हो ताकि पशु को अनावश्यक पीड़ा न झेलनी पड़े।


जीव-हत्या और सामान्य समाज
                    प्रत्येक समाज में जीव-हत्या का प्रचलन विभिन्न रूपों में रहा हैं और इसे मान्यता प्राप्त रही हैं। इसके दो आधार रहे हैं। एक: मनुष्यों के लाभ के लिए, दो: मनुष्य और मानव-समाज को क्षति पहुचाने से बचाने तथा सुरक्षित रखने के लिए इस्लाम पर जीव-हत्या की निर्दयता का आरोप लगाते और आक्षेप व दुष्प्रचार करते हैं उनकी दृष्टि में भी जीव-हत्या के उपरोक्त दोनों आधार मान्य हैं।

मनुष्य के जीवन और स्वास्थ्य के लिए जिस संतुलित आहार (Balanced diet) की अनिवार्यता सर्वमान्य रही है, जिसमें पौष्टिक व स्वास्थ्यप्रद तत्व-विटामिंस, प्रोटीन मिनरल्स, कार्बोहार्इट्रक, लवण (Salts) आदि-पाए जाते हैं, वह जीवधारियों से ही उपलब्ध होते हैं और उनमें से अधिकतर, वनस्पतियों, सब्जियों और पेड़-पौधौं को काट कर (जो वास्तव में जीव-हत्या ही हैं) या पशु-पक्षियो एवं मछलियों आदि जीवों की हत्या करके ही प्राप्त किए जाते हैं।

समुद्र मे किसी भी समय-बिन्दु (Point Of Time) पर समस्त मानव-आबादी के पौष्टिक आहार की लगभग दो तिहार्इ आवश्यकतापूर्ति के लिए खाद्य-सामग्री विद्यमान रहती हैं जिसका कुछ अंश पूरे विश्व (हमारे ‘अहिंसा-प्रिय’ देश सहित)में बराबर इस्तेमाल मे लाया जाता हैं। इस जीव-हत्या पर कभी आपत्ति नही दर्शार्इ गर्इ हैं। मांसाहार हेतु पशु-वद्य के सरकार-अधिकृत बूचड़खानों (Slaughter houses) से पशु-रक्त की पूरी मात्रा उन कंपनियों द्वारा उठा ली जाती हैं जो मानव-शरीर मे रक्त और हीमोग्लोबीन (Haemoglobin) की कमी पूरी करने वाली औषधियों व टॉनिक बनाती हैं। इन मृतक पशुओं की खाल, हड्डी, तॉत (नसों), झिल्ली, सींग, बाल आदि से बड़े-बड़े उद्योग चलते हैं, इनकी चरबी खाद्य-समग्री एवं अन्य उपभोग-सामग्रीयॉ बनाने में प्रयुक्त होती है जिन्हें मांसाहारी और मांसाहार-विरोधी, अहिंसावादी, अर्थात सारी जनता सहर्ष प्रयोग करती हैं। तब जीव-हत्या, निर्दयता, हिंसा आदि का प्रश्न कही नही उठता। स्वास्थ्य विज्ञान एवं औषधि विज्ञान (Medical Sciences) में निरंतर शोधकार्य एवं चिकित्सा-विज्ञान के विद्यार्थियों का शोध-कार्य और प्रशिक्षण चूहों, मेढको, बंदरों आदि की हत्या पर ही टिका हुआ है। यह पूरी वस्तुस्थिति, जिसका उपर वर्णन हुआ, इस इस्लामी धारणा की ही पुष्टि करती हैं कि समस्त जीवधारी, मानव-जाति के हित, उसी के उपयोग व उपभोग के लिए बनाए गए हैं।

ऐसे जीवधारियों की हत्या कर देने को भी हर समाज मे मान्यता दी गर्इ है और इसका व्यावहारिक प्रचलन रहा हैं जो मनुष्य के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हानिकारक, कष्टदायक या घातक होने लगे। ऐन्टीबायोटिक औषधियॉ, जिन्हें हर ‘अहिंसावादी’ व्यक्ति भी संतोषपूर्वक प्रयोग करता हैं, जीवधारी बैक्टीरिया की ‘हत्या’ ही करती हैं। कीटनाशक औषधियॉ, जिनका छिड़काव जीवधारियों के प्रति दयाभाव से ओतप्रोत लोग भी अपने घरों मे तथा फसलों पर करते हैं, जीवधारी कीड़ो-मकोड़ों की हत्या ही करती हैं। डाकुओं, बदमाशों आदि को पुलिस जनहित में गोली मार देती हैं, वह भी जीव-हत्या ही हैं। बड़े-बड़े अपराधियों और देश-द्रोहियों को सरकार फासी पर लटका देती हैं और युद्ध मे शत्रु देश के सैनिकों की हत्या कर दी जाती हैं तथा शांति व कानून व्यवस्था को भंग करनेवाले उपद्रवियों को जब देखते ही गोली मार ( Shoot at sight) दी जाती हैं तो यह भी जीव-हत्या ही होती हैं।लेकिन कभी भी, कहीं भी मात्र इस तर्क पर कि यह सब जीव-हत्या, निर्दयता, बर्बरता, क्रूरता और हिंसा है, ऐसी जीव-हत्याओं पर ‘हत्या’ का आरोप नही लगता, न ही व्यक्ति, समुदाय, प्रशासन, सरकार एवं राष्ट्र पर आक्षेप किया जाता हैं।

कहने का तात्पर्य यह हैं कि जीव-हत्या अपने आप में अवांछनीय, अनुचित, पाप या अपराध नही हैं। कुछ नैतिक, कुछ सामाजिक व सैद्धांतिक मापदंड कभी इसे उचित भी ठहराते हैं और कभी, अनुचित, अमानवीय, अपराध एवं पाप भी करार देते हैं। यही बात मनुष्य के स्वभाव एवं उसकी आवश्यकाओं के ठीक अनुकूल भी हैं। इस्लाम एक व्यावहारिक धर्म एवं स्वाभाविक व संतुलित जीवन-व्यवस्था हैं। अत: जीवन-व्यवस्था है अत: जीव -हत्या के विषय पर उसकी नीति इसी सत्य पर आधारित हैं।


पशु-बलि (कुरबानी) और इस्लाम

पशु-बलि को विश्व के दो बड़े धर्मो, सनातन धर्म और इस्लाम धर्म में मान्यता प्राप्त हैं; सनातन धर्म के अनुसार ‘देवताओं को प्रसन्न करने के लिए’। और इस्लाम धर्म के अनुसार ‘अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए’ पशु-बलि का विधान हैं। सनातन धर्म में ‘देवताओ। को प्रसन्न करने’ से क्या अभिप्रेत हैं और मनुष्य के आध्यात्म, आचार-विचार एवं चरित्र व आचरण पर पशु-वध के क्या अच्छे प्रभाव पड़ते हैं तथा मनुष्य के व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन मे नैतिक स्तर पर, पशु-वद्य द्वारा कैसे सकारात्मक प्रभाव पड़ने अपेक्षित हैं यह इस लेख का विषय नही, अपितु सनातन धर्मावलंबियो, विचारकों एवं धर्म-विद्याचार्यो के लिए अपने आप में एक शोध-विषय हैं। अलबत्ता, इस संबंध में इस्लामी दृष्टिकोण यह हैं- इस्लाम में इस्लामी कैलेंडर (हिजरी सन्) के बारहवें मास ‘जिल-हिज्जा’ की दसवी, ग्यारहवी व बारहवीं तिथि को ‘र्इद-उल-अजहा’ त्योहार के अवसर पर पशु की बलि दी जाती हैं जिसे कुरबानी कहा जाता हैं। इसके अतिरिक्त हज को जाने वाले हर व्यक्ति पर भी यह कुरबानी अनिवार्य हैं। विश्व के अन्य भागो मे जानवर की कुरबानी करने की सामथ्र्य रखनेवाले हर मुसलमान पर (जो बालिग भी हो) कुरबानी अनिवार्य हैं। यह बलि, निर्दयता व हिंसा का द्योतक नही हैं। यह न मात्र पशु-हत्या हैं, न ही मात्र एक धार्मिक रीति जिसका कोर्इ महान ध्येय और मनुष्य के जीवन की व्यावहारिकताओं में कोर्इ रचनात्मक भूमिका एवं महत्वपूर्ण योगदान न हो। कुरबानी का एक प्रामाणिक व विश्वसनीय इतिहास हैं जो विश्व के सबसे अधिक प्रामाणिक र्इश-ग्रन्थ (हिन्दू धर्म-ग्रन्थों मे स्पष्ट रूप् से पशु-वध की अनुमति तथा आदेश मौजूद हैं। देखे:

मनु-3/123, 3/268, 5/23, 5/27-28, 5/35-36
ऋ0-10/27/2, 10/28/3
अथर्व0-9/6/4/43/8
श0ब्रा0-3/1/2/21)

‘कुरआन’ मे उल्लिखित हैं तथा जिसकी व्याख्या अंतिम र्इश-दूत (पैगम्बर) हजरत मुहम्मद (सल्ल0) के अति विश्वसनीय कथनों (हदीस) में वर्णित हैं। इतिहास के साथ-साथ इसका असल उद्देश्य भी, इस्लाम के उपरोक्त दोनों मूल-स्रोतो में खोल-खोलकर वर्णित कर दिया गया हैं। इस इतिहास पर एक दृष्टि डाल लेना कुरबानी की इस्लामी अवधारणा को समझने के लिए अनिवार्य हैं।

कुरबानी का इतिहास

            कुरबानी का इतिहास 4000 वर्ष पुराना हैं जिसका आरंभ इस्लाम (तथा यहूदी व र्इसार्इ धर्म) के महान पैगम्बर हजरत इब्राहीम (अलैहि0) से संबंधित एक असाधारण घटना से होता है। यह घटना तीनों धर्मो के धर्म-ग्रन्थों में उल्लिखित हैं तथा कुरआन, इन तीनों में एक मात्र प्रामणिक र्इश-ग्रंथ हैं।

4000 वर्ष पूर्व जब अज्ञानता के घोर अंधकार में, मानव-जाति निराकार एकेश्वरवाद की सीधी राह से भटक कर साकार अनेकेश्वरवाद की मिथ्या धारणा में फंसी हुर्इ थी; सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्रों, तारो, पत्थरो, प्रेतात्माओं, पूर्वजों और शक्तिशाली शासकों की उपासना और मूर्ति-पूजा में लिप्त तथा नाना प्रकार के अंधविश्वासों व आडम्बरों से ग्रस्त थी। अपने से तुच्छ थी। अपने से तुच्छ पदार्थो के सामने एवं अपने ही जैसे मनुष्यों के चरणों में शीश नवाते-नवाते मनुष्य की गरिमा, गौरव व स्वाभियान  (जो र्इश-प्रदत्त था) अपमानित और छिन्न-भिन्न हो चुका था, तात्कालिक पूरी मानव-जाति मे एकेश्वरोपासक एक भी व्यक्ति बाकी न रह गया था। इन विषम परिस्थितियों मे र्इराक के ‘उर’ नामक नगर के वासी ‘महंत-महापुजारी’ ‘‘आजर’’ के घर मे, उसी के बेटे ‘इब्राहीम को र्इश्वर ने, शिर्क (अनेकेश्वर-पूजा) के घोर मे तौहीद( विशुद्ध एकेश्वरवाद) की ज्योति जलाने के लिए चुन लिय और उन्हे अपना पैगम्बर (र्इश-दूत) नियुक्त किया।

हजरत इब्राहिम ने शिर्क के विरूद्ध ऐसे सशक्त एवं बुद्धिसंगत तर्क दिए जिनकी कोर्इ काट नही थी। फिर भी उनका घोर विरोध किया गया। वे इस ज्योति का प्रकाश फैलाने इराक से फिलिस्तीन, वहॉ से मिस्र और वहॉ से अरब प्रायद्वीप के मध्य-पश्चिम भाग मे गए। अल्लाह ने उनपर एक अत्यन्त कठिन कर्तव्य का भार डाला था। यह कर्तव्य एक ऐसा व्यक्ति ही निभा सकता था जो र्इश-आज्ञापालन, र्इश-भय, र्इशपरायणता एवं र्इश्वर के समक्ष संपूर्ण आत्मसमर्पण मे उत्कृष्ट, सुदृढ़ और अडिग हो। हर स्वार्थ, हर सुख, हर मनोकामना, हर लाभ, हर इच्छा और हर तरह के प्रेम हेतु बलि दे सकता हो। इतना उॅचा चरित्र और ऐसा सशक्त आत्मबल हजरत इब्राहीम के व्यक्तित्व में उत्पन्न करने के लिए अल्लाह ने बड़ी-बड़ी कठिनाइयों से गुजारकर उन्हे तैयार भी किया, प्रशिक्षण भी दिया और कर्इ कठिन परीक्षाएं भी जी। हर परीक्षा मे हजरत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) स्वंय को उत्तीर्ण सिद्ध करते गए यहां तक कि र्इश्वर ने उनकी अंतिम कठोरतम परीक्षा लेने का इरादा किया। उन्हें आदेश दिया कि (र्इश्वर के लिए) अपने पुत्र ‘इस्मार्इल’ की बलि दे।

इस्मार्इल (अलैहि0) इब्राहीम (अलैहि.) के इकलौते बेटे थे। वे बड़ी मिन्नत और आरजू के बाद इब्राहीम (अलैहि0) के बुढ़ापे मे पैदा हुए थे। अत: सहज ही इसका अनुमान लगाया जा सकता हैं कि इस्मार्इल (अलैहि0) इब्राहीम (अलैहि0) को कितने अधिक प्रिय और ऑखों के तारे रहे होंगे। अत: हजरत इब्राहीम (अलैहि0) अपने इकलौते पुत्र इस्मार्इल (अलैहि0) से बहुत अधिक प्यार करते थे। कोर्इ साधारण व्यक्ति होता तो ये बाते र्इश-आज्ञापालन में अवरोधक बनकर उसके आत्मबल को विचलित कर देने के लिए काफी होती और वह इस कठोर र्इश्वरीय परीक्षा मे नाकाम हो जाता लेकिन जिस व्यक्ति से र्इश्वर को भावी संसार में इंसानी नस्लों के लिए एकेश्वरवादी धर्म की मजबूत व चिरस्थायी नींव रखवानी थी उस व्यक्ति-हजरत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने इस परीक्षा में भी कामयाब होने की ठान ली। बेटे को इस र्इश्वरीय आदेश के बारे में बताया तो बेटे (इस्मार्इल) ने कहा, ‘‘ पिताजी, अल्लाह की ओर से जो आदेश हुआ हैं उसे पूरा कीजिए, र्इश्वर ने चाहा तो आप मुझे धैर्यवान और जमे रहनेवाला पाएंगे। ‘‘ घर से कुछ दूर ‘मिना’ की एक पहाड़ी पर ले जाकर बाप ने बेटे को लिटा दिया। छुरी गर्दन पर फेरने ही वाले थे कि र्इशवाणी हुर्इ कि ऐ इब्राहीम ! तुम परीक्षा में पूरे उतरे। प्रतिदिन के रूप में इस दुंबे (भेड़ समान पशु) की बलि दे दो। पास ही एक दु्रबा खड़ा हुआ मिला। हजरत इब्राहीम (अलैहि0) ने उसे कुरबान किया। कुरआन ने इसे ‘जिब्हिन-अजीम’ अर्थात् ‘महान बलिदान’कहा हैं।

इसी महाबलिदान को याद करने और याद रखने के लिए उसी तिथि को 4000 वर्ष से पशुओं की बलि और कुरबानी की रीति चली आ रही हैं।
काल-कालांतर मे इसमें कुछ विकृतियॉ आ गर्इ थी। लोग इस कुरबानी की असल स्पिरिट भी भूल चुके थे। आज से 1400 वर्ष पूर्व जब पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) के माध्यम से विशुद्ध एकेश्वरवादी धर्म का पुनरागनम हुआ और आप (सल्ल0) पर र्इशवाणी (कुरआन) अवतरित हुर्इ तो कुरबानी के इतिहास को भी उसके शुद्ध व स्वच्छ रूप् मे लोगो के समक्ष लाया गया। र्इश-दूत हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने लोगो के सामने इसकी विस्तृत व्याख्या की ओर इस पर स्वंय अमल करके भी दिखाया। कुरआन मे अल्लाह ने फरमाया, ‘‘ (पशु का) न मांस अल्लाह तक पहुॅचता हैं न रक्त, अपितु उस तक जो चीज पहुॅचती है वह है तुम्हारा तकवा (र्इशपरायणता)।’’ हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने अपनी उंगली सीने पर हृदय के स्थान रखकर तीन बार फरमाया, ‘‘तकवा यहॉ होता है, तकवा यहॉ होता है, तकवा यहॉ होता है।’’ कुरआन और हदीस का एक पारिभाषिक शब्द हैं जिसका भावार्थ है ‘‘र्इश्वर की अवज्ञा (नाफरमानी) से बचते हुए जीवन का क्षण-क्षण बिताना’’। अर्थात् कोर्इ भी कार्य करते समय यह ध्यान अवश्य रखना कि कही वह र्इश्वर की दृष्टि में अनुचित, अवैध, वर्जित और पाप तो नही हैं (अनुचित, अवैध और पाप होने की पूरी व्याख्या कुरआन और हदीस मे उल्लिखित हैं)। अगर किसी काम में अल्लाह की नाफरमानी व अवज्ञा हैं तो उसपर अमल करना छोड़ देने को भी इस्लामी परिभाषा मे ‘तकवा’ कहते हैं।


निष्कर्ष

        उपरोक्त विवरण का निष्कर्ष यह हैं:

सृष्टि के सृजनकर्ता-अल्लाह - ने पृथ्वी की सारी जीवधारी वस्तुए मनुष्य के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उपयोग के लिए बनार्इ हैं। प्रत्येक उपभोग मे ‘मांसाहार’ भी आता हैं एवं इसे इस्लामी व गैर-इस्लामी समाजों में समान रूप् से मान्यता प्राप्त हैं। कुछ व्यक्तिगत या सीमित सामुदायिक अपवाद भी है जो नगण्य है।
इस्लामी समाज में प्रचलित पशु-बलि (कुरबानी) का एक उत्कृष्ट व पवित्र इतिहास हैं। 1400 वर्ष से प्रतिवर्ष उसी इतिहास की याद ताजा की जाती हैं और मुस्लिम-समाज इस कुरबानी के माध्यम से अपने और अल्लाह के बीच ‘दास’ व ‘स्वामी’ के संबंध को घनिष्ट व दृढ़ करता हैं।
कुरबानी के माध्यम से एक मुस्लिम व्यक्ति प्रयास करता हैं कि अपने अन्दर र्इश-भय (तकवा) के गुण को उन्नति व वृद्धि दे। बुरे और पाप के कामों से बचे ।
कुरबानी के माध्यम से एक मुस्लिम व्यक्ति अपने अन्दर यह आत्मबल पैदा करने की आध्यात्मिक शक्ति अर्जित करता हैं कि सत्यनिष्ठ जीवन बिताने के लिए तथा र्इश आज्ञापालन मे वह बड़े से बड़े स्वार्थ, लाभ, हित और भावनाओं की कुरबानी दे सके और सत्य-मार्ग से विचलित कदापि न हो।

जीव-हत्या अपने में न तो सही हैं न गलत, न उचित हैं न अनुचित, न निन्दनीय हैं न सरायनीय। यह बात यू भी कही जा सकती हैं कि जीव-हत्या अपने आप मे सही भी हैं, और गलत भी। सही या गलत होना इस बात पर निर्भर हैं कि जीव-हत्या का ‘उद्देश्य’ क्या हैं- और जीव-हत्या के संबंध में इस्लामी दृष्टिकोण भी यही हैं- मिसाल के तौर पर एक जीवित मेंढक की अनर्थ हत्या करके उसे फेंक दिया जाए तो यह इस्लाम की दृष्टि मे निर्दयता, हिंसा एवं पाप हैं लेकिन चिकित्सा-विज्ञान के विद्यार्थियों को शल्य-प्रशिक्षण (Surgical Training) देने के लिए उनके द्वारा मेडिकल-कालेजों मे जो मेढको को चीरा-फाड़ा जाता हैं वह निरर्थक व व्यर्थ कार्य न होकर मनुष्य व मानव-जाति की सेवा के लिए होता हैं इसीलिए यह न निर्दयता हैं, न हिंसा,  न पाप; बल्कि लाभदायक, वांछनीय व सराहनीय हैं। हमारा विश्वास हैं कि हत्या व हिंसा के उचित या अनुचित होने का यही मापदण्ड, सम्पूर्ण मानव समाज में, प्राचीन काल से लेकर वर्तमान युग तक मान्य व प्रचलित रहा हैं। यही मानव-प्रकृति के भी अनुकूल है और मानव-जीवन की स्वाभाविक आवश्यकताओं के तकाजों (Requisites) के अनुकूल भी। क्योकि इस्लाम इस्लाम एक स्वाभाविक व प्राकृतिक धर्म हैं, इसी लिए वह उपरोकत बौद्धिक, संतुलित और स्वाभाविक वैश्विक सिद्धान्त का पक्षधर हैं।

Author Name: मुहम्मद जैनुल-आबिदीन मंसूरी