इस्लाम के बारे में

र्इमान का अर्थ

र्इमान का अर्थ जानना और मानना हैं। जो व्यक्ति र्इश्वर के एक होने को और उसके वास्तविक गुणों और उसके नियम और उसके दण्ड और पुरस्कार को जानता हो और दिल से उसपर विश्वास रखता हो उसको मोमिन (र्इमान रखनेवाला) कहते हैं। र्इमान का परिणाम यह हैं कि मनुष्य मुस्लिम अर्थात् अल्लाह का आज्ञाकारी और अनुवर्ती हो जाता हैं।

इंसान की इस परिभाषा से आप स्वयं समझ सकते हैं कि र्इमान के बिना कोर्इ मनुष्य मुस्लिम नही हो सकता।
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पैग़म्बरी की सत्यता

आप देखते हैं संसार में मनुष्य को जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती हैं, अल्लाह ने उन सबका इन्तिजाम स्वयं ही कर दिया हैं। बच्चा जब पैदा होता हैं, तो देखिए कितनी सामग्री उसे देकर संसार में भेजा जाता हैं। देखने के लिए ऑखे, सुनने के लिए कान, सूघने और सॉस लेने के लिए नाक, स्पर्श-ज्ञान के लिए सम्पूर्ण शरीर की त्वचा में अनुभव-शक्ति चलने के लिए पॉव, काम करते के लिए हाथ, सोचने के लिए मस्तिरूक और ऐसी ही..
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हज़रत मुहम्मद (सल्लo) की नुबूवत के प्रमाण

थोड़ी देर के लिए शारीरिक ऑखें बन्द करके कल्पना की ऑखें खोल लीजिए और एक हजा़र चार सौं वर्ष पीछे के संसार को देखिए, यह कैसा संसार था? मनुष्य और मनुष्य के बीच विचार-विनिमय के साधन कितनें कम थें। देशों और जातियों के बीच सम्बन्ध के साधन कितने सीमित थें, मनुष्य की जानकारी कितनी कम थी, उसके विचार कितने संकीर्ण थे, उस पर भ्रम और असभ्यता कितनी छार्इ थी, अज्ञान के अंधेरे में ज्ञान का प्रकाश कितना धुधला था और अंधेरे को ढकेल-ढकेलकर कितनी कठिनाइयों के साथ फैल रहा था।..
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इस्लाम की विशेषताए

संक्षेप में इस्लाम की प्रधान विशेषताए निम्न हैं-
इस्लाम की सबसे प्रधान विशेषता उसका विशुद्ध एकेश्वरवाद हैं। हिन्दू धर्म के र्इश्वर-कृत वेदो का एकेश्वरवाद कालान्तर से बहुदेववाद में खोया तो नही तथापि बहुदेववाद और अवतारवाद के बाद र्इश्वर को मुख्य से गौण बना दिया गया है। इसी प्रकार र्इसार्इयों की त्रिमूर्ति (Trinity) अर्र्थात् र्इश्वर, पुत्र और आत्मा की कल्पना ने हिन्दुओं के अवतारवाद के समान र्इसार्इ धर्म में भी र्इश्वर मुख्य न रहकर गौण हो गया। इसके विपरीत इस्लाम के एकेश्वरवाद में न किसी प्रकार...
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विवाह और तलाक

महिलाओं से सम्बन्धित एक और महत्वपूर्ण विषय विवाह और तलाक का भी हैं। विवाह जिसे निकाह कहा जाता हैं एक पुरूष और एक स्त्री का अपनी आजाद मर्जी से एक दूसरें के साथ पति और पत्नी के रूप मे रहने का फैसला हैं। इसकी तीन शर्ते हैं : पहली यह कि पुरूष वैवाहिक जीवन की जिम्मेदारियों को उठाने की शपथ ले, एक निश्चित रकम जो आपसी बातचीत से तय हो, मेहर के रूप में औरत को दे और इस नये सम्बन्ध की समाज मे घोषणा हो जाये। इसके बिना किसी मर्द और औरत का साथ रहना और यौन सम्बन्ध स्थापित करना गलत, बल्कि एक बड़ा अपराध हैं।
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इस्लाम और गैर-मुस्लिम

इस्लाम सारी मानवता के लिए अल्लाह की ओर से भेजी गर्इ जीवन व्यवस्था है। इसी के साथ-साथ भी एक तथ्य है कि हर युग मे इसको मानने और न मानने वाले अर्थात मुस्लिम और गैर-मुस्लिम के दो गिरोह रहे हैं। न मानने वालों के प्रति इस्लाम क्या रूख अपनाता हैं? हम इस प्रश्न का जवाब हासिल करने का प्रयास करेंगे।
इन्सान को इस धरती पर पूरी आजादी के साथ भेजा गया हैं। उसके सामने सारी सच्चाइयॉ रख दी गर्इ है और उसे पूरी आजादी दी गर्इ हैं कि वह चाहे तो इस्लाम को स्वीकार करें और चाहे तो अस्वीकार कर दें। अल्लाह ने जबरन हिदायत का...
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इस्लाम में भक्ति और उपासना

मनुष्य का जो कुछ है और मनुष्यों के लिए जो कुछ हैं सब र्इश्वर ही का हैं, ज्ञान, बुद्धि, विद्या और शक्ति भी उसी की कृपादान का फल हैं। मनुष्य जिन वस्तुओं से लाभ उठाता और अपनी आवश्यकताए पूरी करता हैं वह सब भी र्इश्वर ही कि देन हैं। इसी प्रकार मनुष्य की विद्या और बुद्धि हो या ज्ञान और कर्म, धन और सम्पत्ति हो या उद्योग और वाणिज्य, कुटुम्ब और परिवार हो या नौकर-चाकर मनुष्य का व्यक्तिगत कार्य हो या सामाजिक, सुधार कार्य हो या राजनैतिक, मनुष्य के किसी कार्य और किसी वस्तु का विभाजन नही किया जा सकता कि उनके कुछ...
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इस्लाम उद्देश्य

पहला उद्देश्य : पशु से मानव बनाना

(1) ऐ मुसलमानों ! तुम अपने घरो के अतिरिक्त किसी अन्य मकान में उस समय तक न प्रवेश करो, जब तक अनुमति न ले लो और उनमें रहनेवालो को सलाम न कर लो। यही तुम्हारे लिए उचित है और तुम झट विचार कर लिया करो। यदि उन घरों में कोर्इ आदमी मालूम न हो तो उन घरो में न जाओं, जब तक कि तुमको अनुमति न दी जाए और यदि तुम से कह दिया जाए कि लौट जाओं तो तुम लौट आया करो। यही बात तुम्हारे लिए उचित हैं और र्इश्वर को तुम्हारे सारे कार्यो का पता है। कुरआन, 24:27-28
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इस्लाम उद्देश्य

पहला उद्देश्य : पशु से मानव बनाना

(1) ऐ मुसलमानों ! तुम अपने घरो के अतिरिक्त किसी अन्य मकान में उस समय तक न प्रवेश करो, जब तक अनुमति न ले लो और उनमें रहनेवालो को सलाम न कर लो। यही तुम्हारे लिए उचित है और तुम झट विचार कर लिया करो। यदि उन घरों में कोर्इ आदमी मालूम न हो तो उन घरो में न जाओं, जब तक कि तुमको अनुमति न दी जाए और यदि तुम से कह दिया जाए कि लौट जाओं तो तुम लौट आया करो। यही बात तुम्हारे लिए उचित हैं और र्इश्वर को तुम्हारे सारे कार्यो का पता है। कुरआन, 24:27-28
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