एकेश्वरवाद

तौहीद (एकेश्वरवाद) :- और बंदे के बीच पैगम्बर को मार्गदर्शक मानता हैं। इस्लाम पुरोहितवाद को स्वीकार नही करता। वह किसी साकार सत्ता को उपासना का आधार नही बनाता जिसको मनुष्य अध्यात्मिक चिंतन के क्षणों में आराध्य की भांति बसाकर अपना सारा ध्यान शक्ति उस पर केंद्रित कर दें और उसमें तन्मय हो जाये। इसमें चित्र या मूर्ति जैसे किसी माध्यम की आवश्यकता नही हैं। ‘इस्लाम एक ऐसा दीन है जो विचारों की पवित्रता, चिंतन की ऊॅंचार्इ, संकल्प और इच्छा की निर्मलता, र्इश्वर के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं से विरचित, कर्मनिष्ठा और विश्वास के उस धरातल पर स्थित है कि उससे मानदण्ड और ऊॅंचा धरातल सोचा नही जा सकता।1


इस्लाम मे ‘अल्लाह धरती और आकाश का सम्राट2 सर्वज्ञाता3 आकाश की ओर रूख किया और बिलकुल ठीक तथा संतुलित रूप से सात आकाश बनाए। वह चीज को जानने वाला हैं। -2 : सूर-ए-अल-बकरा : 29।


‘खलीफा बनाने वाला हू उन्होने कहा-क्या तू बिगाड़ और रक्तपात करने वालों को वहॉ नियुक्त करेगा। और हम तेरी प्रशंसा के साथ तेरा महिमागान करते और तेरी पवित्रता का वर्णन करते हैं।                             -2 सूर-ए-अल-बकरा, 30, 34,।

और तुम्हारा अल्लाह के सिवा न कोर्इ संरक्षक मित्र हैं और न सहायक।
                                -2 :सूर-ए-अल-बकरा : 107।

वही तो हैं जिसने तुम्हारे लिये धरती की सारी वस्तुये उत्पन्न की। फिर  अत्यन्त उदार, क्षमाशील 1, करूणामय और कृपाशील हैं।2 वह सर्वशक्तिमान शासक,3 स्रष्टा,4 बन्दों के लिए जीवन की सुख-सुविधाए प्रदान करने वाला, 6 और एक हैं।7 उसके अतिरिक्त कोर्इ उपास्य नहीं है। ‘ला इलाह इल्लल्लाहु मुहम्मदुर्ररसूलुल्लाह (नही हैं कोर्इ खुदा मगर अल्लाह, मुहम्मद अल्लाह के रसूल है।) तौहीद की आधारशिला हैं। यही मुसलमानों के ‘दीन’ का मूलमन्त्र हैं। इस्लाम में तौहीद को छोड़ कर शिर्क एवं बहुदेववाद को स्वीकार करना वर्जित है। शिर्क और अनेकेश्वरवाद मनुष्यों की कल्पनामात्र के द्योतक हैं। शिर्क के कारण मनुष्य का ध्यान र्इश्वर के सम्बन्ध मे दुर्बल हो जाता हैं। अल्लाह और बन्दे का रिश्ता टूट जाता हैं। इसलिए इस्लाम मे शिर्क को बहुत बड़ा गुनाह (पाप) माना गया हैं।


1-    मेरे बन्दों को सूचना दे दो कि मै बड़ा ही क्षमाशील और दया करने वाला हू।
-15: सूर-ए-अल-हिज : 48।

‘जिन लोगो ने ‘कुफ्र’ किया ‘किताब वाले’ हो या ‘मुशरिक (बहुदेववादी) हों, कोर्इ नही चाहता कि तुम्हारे ‘रब’ की ओर से तुम पर कोर्इ भलार्इ उतरे। और अल्लाह जिसे चाहता है। अपनी दयालुता के लिए खास कर लेता हैं और अल्लाह बड़ा अनुग्रह वाला हैं।             -2 : सूर-ए-अल-बकरा  105।

3.आकाश और धरती और जो कुछ उनके बीच हैं सबका राज्य अल्लाह ही के लिए हैं और उसे हर चीज की सामथ्र्य प्राप्त हैं। -5 : सूर-ए-अल-मार्इदा : 120।

4.’वह आकाशों और धरती जैसी अनोखी नर्इ चीजों का बनाने वाला हैं। जब वह किसी बात का निर्णय करता हैं तो बस उसके लिए कह देता हैं-हो जा, तो वह हो जाती हैं।     -2 : सूर-ए-अल-बकरा : 117।


5. सब प्रशंसा अल्लाह के लिए हैं, जो सारे संसार का ‘रब’ हैं।
                                -1 : सूर-ए-अल-फातिहा : 1।
6-’वही जिसने तुम्हारे लिए धरती को बिछौना और आकाश को छत बनाया। आकाश की ओर मे पानी उतारा और उसके द्वारा तुम्हारी रोजी के लिए हर तरह के खाद्य पदार्थ पैदा किए। तो जब तुम जानते हो तो अल्लाह के समवर्ती न बनाओं।

7. यदि इन दिनों (आकाश और धरती) में अल्लाह के सिवा और दूसरे ‘इलाह’ (पूज्य) भी होते, तो दोनो की व्यवस्था बिगड़ जाती । तो अल्लाह की महिमा के जो राजसिंहासन का ‘रब’ हैं प्रतिकूल हैं जो गुण ये बयान करते हैं।            
-21 : सूर -ए-अल-अंबिया : 22।

8-’तुम उसके सिवा जिनकी ‘इबादत’ करते हो, वे इसके अतिरिक्त और कुछ नही  कि िनीे नाम हैं, जो तुमने और तुम्हारे पूर्वजों ने रख लिये हैं। अल्लाह ने उनके लिये कोर्इ सनद नही उतारी।

Author Name: इस्लाम एक अध्ययन:डॉ जमील आली जाफरी