रोज़ा

मनुष्य र्इश्वर की विलक्षण रचना हैं। यह शरीर और आत्मा का समन्वित रूप हैं। यदि आत्मा का प्रभाव शरीर की अपेक्षा अधिक हुआ तो मनुष्य सांसारिक जीवन से कट कर भगवद्भक्ति मे लीन हो जाता है और यदि शरीर को आत्मा की तुलना में अधिक महत्व दिया जाये तो मनुष्य ऐश्वर्य प्रेमी बन जाता हैं। अत: इस्लाम ने मनुष्य को इस दलदल से बचाने के लिए ‘रमजान’ माह के रोजे अनिवार्य कर दिए हैं। कुरआन शरीफ में मुसलमानों पर ‘रोजा’ फर्ज किया जाता गया हैं।1

इसका उद्देश्य मनुष्य के आध्यात्मिक और नैतिक विकास के साथ हृदय और आत्मा की शुद्धि हैं। यह मनुष्य को धर्मपरायण और संयमी बनाता हैं। ‘रोजे’ की स्थिति में वह बहुत-सी बुराइयों और अवज्ञाओं से बच जाता हैं। हजरत मुहम्मद सल्ल0 की हदीस के अनुसार रोजा (जीवन संघर्ष में) एक ढाल हैं।
सूर्योदय से आधा घंटा पूर्व ‘सहर’ के समय से सूर्यास्त तक अत्र जल आदि त्याज्य हैं। इस स्थिति में पांच वक्त की नमाज के अतिरिक्त ध्यान, ज्ञान और कुरआन की तिलावत पर विशेष बल दिया गया हैं। इस प्रकार शरीर और हृदय को विभिन्न प्रकार की बुराइयों से मुक्त रखने का विधान हैं। सूर्यास्त होने पर रोजा खोलते या ‘इफतार’ करते हैं।
प्रत्येक वयस्क पर रोजा फर्ज हैं। विशेष परिस्थितियों में धार्मिक शर्तो के साथ ‘रोजे’ के स्थान पर अन्य अनुष्ठानों का आदेश दिया गया हैं, जिनकी पूर्ति के उपरान्त मनुष्य अपने ‘फर्ज’ से ऋण हो सकता हैं।

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1.’ हे र्इमान वालों! तुम पर रोजा फर्ज किया गया हैं, जिस तरह तुमसे पहले के लोगो पर फर्ज किया गया था, ताकि तुम (अल्लाह का) डर रखने वाले बन जाओं।’    -2 : सूर-ए-अल बकरा : 184।
2.’तो यदि यह तौबा कर ले और नमाज कायम करें और जकात दे तो तुम्हारे

Author Name: इस्लाम एक अध्ययन:डॉ जमील आली जाफरी