ज़कात

इस विश्व मे मनुष्य की सुख-सुविधाओं के लिए र्इश्वर ने विभिन्न प्रकार की वस्तुएं निर्मित की हैं। विश्व की सम्पूर्ण वस्तुएं केवल मुट्ठी भर लोगो के अधिकार मे न रहे इसलिए उसने ऐसे नियम बना दिए हैं जिनका पालन करते हुए प्रत्येक मनुष्य आवश्यक और जीवनोपयोगी वस्तुओं को दूसरों तक पहुंचा सकें। यह विधि मनुष्यों मे परस्पर-प्रेम और त्याग की भावना को बल प्रदान करती हैं। इसके लिए इस्लाम मे जकात खुम्स,-खैरात और सदके का विधान हैं। इसके द्वारा मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों मे उद्धार होता हैं। इनमें से खैर-खैरात नेकी की अलामत होते हुए भी अनिवार्य नही हैं, किन्तु कुरआन में धन-सम्पत्ति पर ख्म्स (5वें हिस्से) और जकात (40वें हिस्से) की अनिवार्यता घोषित की गर्इ हैं। 1
यह र्इश्वर प्रदत्त वस्तुओं के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति,2  विभिन्न प्रकार की बुराइयों से मुक्ति 3 एवं मन-मस्तिष्क की शुद्धि का साधन हैं।4 र्इश्वर का कृपापात्र बनने के लिए जकात देना आवश्यक हैं। 5

वर्ष में एक बार ‘जकात’ देना आर्थिक दृष्टि से सम्पत्र (साहिबे निसाब) मुसलमान के लिए ‘फर्ज’ हैं। इसकी मात्रा विभिन्न प्रकार की वस्तुओं (कृषि और उपवन, पशु, बहुमूल्य, वस्तुएं, व्यापार, नौकरी आदि)

पर निर्घारित कर दी गर्इ हैं। कृषि और उपवन से सम्बन्धित जकात उत्पत्ति के उपरांत दी जाती हैं। अचानक प्राप्त होने वाले लाभ पर वर्ष व्यतीत होने की प्रतीक्षा किए बिना तुरन्त खुम्स अर्थात पांचवा हिस्सा देना आवश्यक हैं। जिसउपलब्धि के लिए मनुष्य स्वंय परिश्रम करता हैं
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1-    ‘जो नमाज कायम करते और ‘जकात’ देते हैं और वे ऐसे हैं जो कि आखिरत पर विश्वास करते हैं।        -27 : सूर-ए- अन-नम्ल : 3।
2-    मेरे उन्हें जो कुछ दिया हैं उसमें से छिपाकर और खुले रूप में खर्च करें, इससे पहले  िकवह दिन आए जिसमें न कोर्इ सौदा होगा और न कोर्इ मित्रता होगी।                   -14 : सूर-ए- इब्राहीम : 31।
3-    और यदि तुम खुले तौर पर ‘सदका’ दो तो यह भी अच्छी बात हैं और यदि उसे छिपा कर गरीबों को दो, तो यह तुम्हारे लिए  ज्यादा अच्छा हैं और वह तुम्हारी कितनी ही बुराइयों को दूर कर देगा। और अल्लाह जो कुछ तुम करते हो उसकी खबर रखता हैं। -2 : सूर-ए-अल-बकरा : 271।
4-    ‘ह नबी! तुम उनके मालों में से ‘सदका’ लेकर उन्हें पाक करो और उनकी आत्मा को विकसित करो तथा उनके लिए दुआ करो! निस्संदेह तुम्हारी दुआ उनके लिए संतोष-निधि हैं। अल्लाह सुनने और जानने वाला है।
-9 : सूर-ए-अत-तौबा : 103।

5-    ‘तुम नेकी और वफादारी के दर्जे को नही पहुंच सकते जब तक कि अपनी उन चीजों में से खर्च न करों जो तुम्हे प्रिय हैं और जो चीज भी तुम खर्च करोगे, अल्लाह उसका जानने वाला हैं।    -3 : सूर-ए-आले इमरान : 92।

उस पर उश्र या दसवां हिस्सा दिया जाता हैं।

Author Name: इस्लाम एक अध्ययन:डॉ जमील आली जाफरी