इस्लाम में मानव अधिकार

इस्लाम में मानव अधिकार

‘इस्लाम में मानव-अधिकार’’के विषय पर मुझे आप से कुछ अर्ज करना है, लेकिन इस से पहले मैं जरूरी समझता हूं कि दो बातों पर अच्छी तरह रोशनी डाल दूं, ताकि बहस के दौरान उनके बारे में कोर्इ उलझन पेश न आये।

पश्चिमी देशों में मानव-अधिकारों की कल्पना
पाश्चात्य लोगो का यह उसूल रहा हैं कि वह हर अच्छी चीज को अपनी बना कर पेश करते हैं और यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि यह नेमत और खूबी बस हमारे जरिये से दुनिया को मिली हैं, वरना दुनिया इन चीजों से नावाकिफ और बेखबर थी। अब जरा इसी मानव-अधिकार के मसले को देखिए। बड़े दावों के साथ कहा जाता हैं कि इस की जानकारी लोगो को इंगलिस्तान के मैगनाकारटा के द्वारा हासिल हुर्इ हैं। हालांकि फिर भी वह इस्लाम के छ: सौ साल बाद की चीज हैं। लेकिन हकीकत यह हैं कि सत्रहवीं सदी के कानूनदानों से पहले किसी के दिमाग में यह कल्पना मौजूद न थी कि मैगनाकारटा में ट्रायल बार्इ ज्यूरी (Trial by July) हैबीस काप्सं (Habcas Corpus) और टैक्स लगाने के अधिकारो पर पार्लिमेन्ट के कन्ट्रोल के हूकूक भी शामिल हैं। और अगर मैगनाकारटा के लिखने वाले इस जमाने में मौजूद होते तो उनको सख्त हैरत होती कि मैगनाकारटा मे यह चीजें भी मौजूद थीं। जहॉ तक मेरी मालूमात का संबंध हैं, सत्रहवी सदी से पहले पाश्चात्य लोगो में मानव-अधिकार और शहरी अधिकार की कोर्इ कल्पना मौजूद न थी। सत्रहवी सदी के बाद भी एक लम्बी मुद्दत तक दार्शनिकों और कानूनी दृष्टिकोण पेश करने वाले लोगो ने तो जरूर इस ख्याल को पेश किया था। लेकिन अमलन इस कल्पना का सुबूत अठठारहवीं सदी के आखिर में अमेरिका और फ्रांस के संविधानों और एलानों ही में मिलता है। उसके बाद विभिन्न देशों के संविधानों में बुनियादी अधिकारो का जिक्र किया गया हैं, मगर अधिकांश हालात में यही सूरत पार्इ गर्इ हैं कि जो अधिकार कागज पर दिये गये हैं, वे जमीन पर नही दिये। मौजूद सदी के मध्य में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने, जिसको अब असंयुक्त राष्ट्रसंघ कहना ज्यादा बेहतर होगा, मानव-अधिकारों का ऐलान (Universal Declaration of Human Rights) प्रकाशित किया, और नस्ल-कुशी (Genocide) के खिलाफ भी एक करारदाद मंजूर की और कानून बनाया। लेकिन अब सब जानते हैं कि संयुक्त राष्ट्रसंघ का कोर्इ जाब्ता भी ऐसा नही हैं जिस पर अमल करना जरूरी हो, जिसके पीछे कोर्इ ताकत ऐसी हो जो उसको लागू कराये। इस के उन तमाम फैसलों के बावजूद इन्सानी हुकूक
जगह-जगह पामाल हुए हैं और संयुक्त राष्ट्रसंघ इनकी कोर्इ रोकथाम नही कर सका हैं। दुनिया में नस्ल-कुशी बराबर हो रही है। लेकिन संयुक्त राष्ट्रसंघ मे यह ताकत नही हैं कि उसके खिलाफ कोर्इ कार्यवाही करे। इस पर कही किसी मुल्क के खिलाफ भी आज तक कोर्इ कार्यवाही नहीं की गर्इ।


खा़लिस इन्सानी-अधिकार इन्सान की हैसियत से इन्सान के अधिकार

सबसे पहली चीज जो इस मामले में हमे इस्लाम के अन्दर मिलती हैं, वह यह हैं कि इस्लाम बजाये खुद इन्सान की हैसियत से इन्सान के कुछ हक और अधिकार मुकर्रर करता हैं। दूसरे शब्दों में इसका मतलब यह हैं कि हर इन्सान चाहे, वाहे हमारे अपने देश और वतन का हो या किसी दूसरे देश और वतन का, हमारी कौम का हो या किसी दूसरी कौम का, मुसलमान हो या गैरमुस्लिम, किसी जंगल का रहने वाला हो या किसी रेगिस्तान मे पाया जाता हो, बहरहाल सिर्फ इन्सान होने की हैसियत से उसके कुछ हक और अधिकार हैं जिन को एक मुसलमान लाजिमी तौर पर अदा करेगा और उसका फर्ज हैं कि वह उन्हे अदा करे।

1-जिन्दा रहने का अधिकार

इन मे सबसे पहली चीज जिन्दा रहने का अधिकार और इन्सानी जान के आदर का कतव्र्य हैं। कुरआन में फरमाया गया हैं कि ‘‘ जिस आदमी ने किसी एक इन्सान को कत्ल किया, बगैर इसके कि उससे किसी जान का बदला लेना हो, या वह जमीन मे फसाद फलाने का मुजरिम हो, उसने मानों तमाम इन्सानों को कत्ल कर दिया’’ (5:32) जहॉ तक खून का बदला लेने या जमीन मे फसाद फैलाने पर सजा देने का सवाल हैं, इसका फैसला एक अदालत ही कर सकती हैं। या किसी कौम से जंग हो तो एक बाकायदा हुकूमत ही इसका फैसला कर सकती है। बहरहाल किसी आदमी को व्यक्तिगत रूप से यह अधिकार नही हैं कि खून का बदला ले या जमीन मे फसाद फैलाने की सजा दें। इसलिए हर इन्सानपर यह वाजिब हैं कि वह हरगिज किसी इन्सान का कत्ल न करे। अगर किसी ने एक इन्सान का कत्ल किया तो यह
 ऐसा है जैसे उसने तमाम इन्सानों को कत्ल कर दिया। इसी बात को दूसरी जगह पर कुरआन में इस तरह दुहराया गया हैं-

‘‘किसी जान को हक के बगैर कत्ल न करो, जिसे अल्लाह ने हराम किया हैं।’’ (6:152) यहॉ भी कत्ल की मनाही को ऐसे कत्ल से अलग किया गया हैं जो हक के साथ हो, और हक का फैसला बहरहाल कोर्इ अधिकार रखने वाली अदालत ही करेगी। अल्लाह के रसूल (सल्ल0) ने किसी जान के कत्ल को शिर्क के बाद सब से बड़ा गुनाह करार दिया है।’’ सबसे बड़ा गुनाह अल्लाह के साथ शिर्क और किसी ‘नफ़्स’ को कत्ल करना हैं।’’ इन तमाम आयतों और हदीसों मे स्वतंत्र से ‘नफ़्स’ का लफ़्ज इस्तेमाल किया गया हैं जो किसी खास नफ़्स को मख़सूस नहीं करता कि उसका मतलब यह लिया जा सके कि अपनी कौ़म या अपने मुल्क के शहरी, या किसी खास नस्ल, रंग या वतन, या मजहब के आदमी को कत्ल न किया जाये। हुक्म तमाम इन्सानों के बारे में हैं और बजाये खुद हर इन्सानी जान को हलाक करना हराम किया गया हैं।

2. जीने का अधिकार ‘‘ इन्सान’’ को सिर्फ इस्लाम ने दिया है

अब आप देखिए कि जो लोग मानव-अधिकारों का नाम लेते हैं, उन्होने अगर अपने संविधानों में या ऐलानो ंमें कहीं मानव-अधिकारों का जिक्र किया हैं तो हकीकत में इस में यह बात छिपी (Implied) होती है कि यह हक या तो उनके अपने नागरिकों के हैं, या फिर वह उनको सफे़द नस्ल वालों के लिए खास समझते हैं। जिस तरह आस्ट्रेलिया में इन्सानों का शिकार करके सफेद नस्ल वालों के लिए पुराने बाशिन्दों से जमीन खाली करार्इ गर्इ और अमेरिका में वहॉ के पुराने बाशिन्दों की नस्लकुशी की गर्इ और जो लोग बच गये उन को खास इलाकों (Reservations) में कैद कर दिया गया और अफ्रीका के विभिन्न इलाको में घुस कर इन्सानों को जानवरों की तरह हलाक किया गया, यह सारी चीजे इस बात को साबित करती हैं कि इन्सानी जान का ‘‘ इन्सान’’ होने की हैसियत से कोर्इ आदर उन के दिल में नही हैं। अगर कोर्इ आदर हैं तो अपनी कौम या अपने रंग या अपनी नस्ल की बुनियाद पर हैं। लेकिन इस्लाम तमाम इन्सानों के लिए इस हक को तस्लीम करता हैं। अगर कोर्इ आदमी जंगली कबीलों से संबंध रखता हैं तो उसको भी इस्लाम इन्सान ही समझता हैं।

3.जान की हिफाजत का हक़

कुरआन की जो आयत मैने अभी पेश की है उसके फौरन बाद यह फरमाया गया हैं कि ‘‘ और जिसने किसी नफ़स को बचाया उसने मानों तमाम इन्सानों को जिन्दगी बख्शी ।’’(5:32) आदमी को मौत से बचाने की बेशुमार शक्ले हैं। एक आदमी बीमार या जख्मी हैं, यह देखे बगैर कि वह किस नस्ल, किस कौम या किस रंग का हैं, अगर वह आप को बीमारी की हालत में या जख्मी होने की हालत में मिला है तो आपका काम यह हैं कि उसकी बीमारी या उसके जख्म के इलाज की फिक्र करें। अगर वह भूख से मर रहा हैं तो आप का काम यह हैं कि उसको खिलायें ताकि उसकी जान बच जाये। अगर वह डूब रहा हैं या और किसी तरह से उसकी जान खतरे में हैं तो आप का फर्ज हैं कि उसको बचाएं। आपको यह सुनकर हैरत होगी कि यहूदियों की मजहबी किताब ‘‘ तलमूद’’ मे हुबहू इस आयत का मजमून मौजूद हैं, मगर उसके शब्द ये हैं कि ‘‘ जिस ने इस्राइल की एक जान को हलाक किया, अलकिताब (Scripture) की निगाह में उसने मानो सारी दुनिया का हलाक कर दिया और जिसने इस्राइल की एक जान को बचाया अलकिताब  के नजदीक उसने मानों सारी दुनिया की हिफाजत की।’’-तलमूद में यह भी साफ लिखा हैं,
अगर कोर्इ गैर इस्राइली डूब रहा हो और तुमने उसे बचाने की कोशिश की तो गुनहगार होगे। नस्ल परस्ती का करिश्मा देखिये । हम हर इन्सान की जान बचाने को अपना फर्ज समझते हैं, क्योकि कुरआन ने ऐसा ही हुक्म दिया हैं। लेकिन वह अगर बचाना जरूरी समझते हैं तो सिर्फ बनी इस्राइल की जान को, बाकी रहे दूसरे इन्सान, तो यहूदी-दीन मे वह इन्सान समझे ही नही जाते उनके यहॉ ‘गोयम’ जिसके लिए अंगे्रजी में  (Gentile) और अरबी में उम्मी का लफ़ज इस्तेमाल किया जाता हैं, यह हैं कि उनके कोर्इ इन्सानी अधिकार नही है। इन्सानी हुकूक सिर्फ बनी इस्राइल के लिए खास हैं। कुरआन में भी इस का जिक्र आया हैं कि यहूदी कहते है कि ‘‘ हमारे उपर उम्मियों के बारे में (यानी उनका माल मारखाने में) कोर्इ पकड़ नही हैं।’’ (3:75)

4.    औरत की आबरू  का आदर

तीसरी अहम चीज इस्लाम के दिये हुये मानव-अधिकारों में यह है। कि औरत की अस्मत और इज्ज्ात कर हाल मे आदर के योग्य हैं, चाहे औरत अपनी कौम की हो, या दुश्मन कौम की, जंगल बियाबान मे मिले या फतह किये हुये शहर में, हमारी अपने मजहब की हो या दूसरे मजहब से उसका ताल्लुक हो, या उसका कोर्इ भी मजहब हो, मुसलमान किसी हाल में भी उस पर हाथ नही डाल सकता। उसके लिये जिना को हर हाल में हराम किया गया हैं चाहे यह कुकर्म किसी भी औरत से किया जाये। कुरआन के शब्द हैं-’’ जिना के करीब भी न फटको। (17:32) और उसके साथ ही यह भी किया गया हैं कि इस काम की सजा मुकर्रर कर दी गर्इ। यह हुक्म किसी शर्त के साथ बन्धा हुआ नही हैं। औरत की अस्मत और इज्ज्ात पर हाथ डालना हर हालत में मना हैं और अगर कोर्इ मुसलमान इस काम को करता हैं तो वह इस की सजा से नही बच सकता, चाहे दुनिया मे सजा पाये या आखिरत में। औरत के सतीत्व के आदर का यह तसव्वुर इस्लाम के सिवा कहीं नही पाया जाता। पाश्चात्य फौजो को तो अपने मुल्क में भी ‘‘ काम वासना की पूर्ति’’ के लिए खुद अपनी कौम की बेटियां चाहिए होती हैं । और गैर कौम के देश पर उनका कब्जा हो जाये तो उस देश की औरतों की जो दुर्गत होती हैं, वह किसी से छुपी हुर्इ नही हैं। लेकिन मुसलमानों की तारीख-व्यक्तिगत इंसानी गलतियों को छोड़कर-इस से खाली रही हैं कि किसी देश को फतह करने के बाद उनकी फौजें हर तरफ आम बदकारी करती फिरी हों, या उनके अपने देश में हुकूमत ने उनके लिये बदकारीयां करने का इन्तिजाम किया हो। यह भी एक बड़ी नेमत है जो मानव-जाति को इस्लाम की वजह से हासिल हुर्इ हैं।

5. हर मांगने वाले और तंगदस्त का यह हक हैं कि उसकी मदद की जाये

कुरआन मे यह हुक्म दिया गया हैं कि ‘‘ और मुसलमानों के मालों में मदद मांगने वाले और महरूम रह जाने वाले का हक हैं। ‘‘(05:19) पहली बात तो यह कि इस हुक्म में जो शब्द आये है वे सबके लिए हैं, उस में मदद करने को किसी धर्म विशे
“ा के साथ खास नहीं किया गया हैं, और दूसरे यह कि हुक्म मक्के मे दिया गया था, जहां मुस्लिम समाज का कोर्इ बाकायदा वजूद ही नही था। और आम तौर पर मुसलमानों का वास्ता गैर-मुस्लिम आबादी ही से होता था। इसलिए कुरआन की उक्त आयत का साफ मतलब यह हैं कि मुसलमानों के माल पर हर मदद मांगने वाले और हर तंगदस्त और महरूम रह जाने वाले इन्सान का हक हैं। यह हरगिज़ नही देखा जायेगा कि वह अपनी कौम या अपने देश का हैं या किसी दूसरी कौम, देश या नस्ल से उसका संबंध हैं। आप हैसियत और सकत रखते हो और कोर्इ जरूरत मन्द आप से मदद मांगे, या आप को मालूम हो जाये कि वह जरूरत मंद है तो आप जरूर उसकी मदद करें। खुदा ने आप पर उसका यह हक कायम कर दिया हैं।

6.     हर इन्सान की आजादी का हक़

इस्लाम मे किसी आजाद इन्सान को पकड़ कर गुलाम बनाना या उसे बेच डालना बिल्कुल हराम करार दिया गया हैं। अल्लाह के रसूल(सल्ल0) के साफ शब्द ये हैं कि तीन किस्म के लोग है जिन के खिलाफ कियामत के दिन मै खुद इस्तिगासा दायर करूंगा। उनमें से एक वह आदमी हैं, जो किसी आजाद इन्सान को पकड़ कर बेचे और उसकी कीमत खाये।  रसूल(सल्ल0) के इस फरमान के शब्द भी आम हैं। उसको किसी कौम या नस्ल या देश व वतन के इन्सान के साथ खास नही किया गया हैं। पाश्चात्य लोगो को बड़ा गर्व हैं कि  उन्होने गुलामी का खात्मा किया हैं। हालाकि उन्हे यह कदम उठाने का अवसर पिछली सदी के बीच मे मिला हैं। उस से पहले जिस बड़े पैमाने पर वे अफ्रीका से आजाद इन्सानो को पकड़-पकड़ कर अपनी नव-आबादियों में ले जाते रहे हैं और उनके साथ जानवरो से भी बुरा सुलूक करते रहे है, इसका जिक्र उनकी अपनी ही लिखी हुर्इ किताबों में मौजूद हैं।



7. पाश्चात्य कौमों की गुलामसाज़ी

अमेरिका और हिन्द के पश्चिमी जंजीरों वगैरह पर इन कौमों का कब्जा होने के बाद साढ़े तीन सौ साल तक गुलामी की यह जालिमाना तिजारत जारी रही हैं अफ्रीका के जिस तट पर देश के अन्दर से काले लोगो को पकड़ कर लाया जाता और बन्दरगाहों से उनको आगे भेजा जाता था, इसका नाम गुलामों का तट (Slave Coast) पड़ गया था। सिर्फ एक सदी में (1680 र्इ0 से 1786 र्इ0 तक) सिर्फ ब्रिटेन के कब्जा किये हुए इलाकों के लिए, जितने आदमी पकड़ कर ले जाये गये उनकी तादाद खुद ब्रिटेन के लेखको ने दो करोड़ बतार्इ हैं। सिर्फ एक साल ऐसा बताया गया हैं। (सन 1790र्इ0) जिस में पिचहत्तर हजार अफ्रीकी पकड़े और गुलाम बनाये गये। जिन जहाजो में वे ले जाये जाते थे, उनमें इन अफ्रीकियों को बिल्कुल जानवरों की तरह ठूंस कर बन्द कर दिया जाता था और बहुतों को जन्जीरों से बांध दिया जाता था। उनको न ठीक से खाना दिया जाता था, न बीमार पड़ने या जख्मी हो जाने की सूरत में उनके इलाज की फिक्र की जाती थी। पाश्चात्य लेखको का अपना बयान हैं कि गुलाम बनाने और जबरदस्ती खिदमत लेने के लिए जितने अफ्रीकी पड़ने गये थे, उनमें से 20% का रास्ते ही मे खात्मा हो गया। यह भी अन्दाजा किया जाता है कि सामूहिक रूप से विभिन्न पाश्चात्य कौमों ने जितने लोगो को पकड़ा था उनकी तादाद दस करोड़ तक पहुंचती थी। इस तादाद में तमाम पाश्चात्य कौमों की गुलाम साजी के आदाद व शुमार शामिल हैं। ये हैं वे लोग जिन का यह मुह हैं कि हम पर रात दिन गुलामी को जायज रखने का इल्जाम लगाते रहे हैं। मानों नकटा किसी नाक वाले को ताना दे रहा है कि तेरी नाक छोटी हैं।

8. इस्लाम में गुलामी की हैसियत

संक्षेप में मै आप को यह भी बता देना चाहता हूं कि इस्लाम में गुलामी की हैसियत क्या हैं। अरब में जो लोग इस्लाम से पहले के गुलाम चले आ रहे थे, उनके मामले को इस्लाम ने इस तरह हल किया कि हर मुमकिन तरीको से उनको आजाद करने की प्रेरणा दी गर्इ। लोगो को हुक्म दिया गया कि अपने कुछ गुनाहों के प्रायश्चित के तौर पर उनको आजाद करें। अपनी खुशी से खुद किसी गुलाम को आजाद करना एक बड़ी नेकी का काम करार दिया गया। यहां तक कहा गया कि आजाद करने वाले का हर अंग उस गुलाम के हर अंग के बदले में दोजख से बच जायेगा। इसका नतीजा यह हुआ कि ‘‘ खिलाफते राशिदा’’ के दौर तक पहुंचते-पहुंचते अरब के तमाम पुराने गुलाम आजाद हो गया।

अल्लाह के रसूल (सल्ल0) ने खुद 63 गुलाम आजाद किये। हजरत आइशा (रजि0) के आजाद किये हुए गुलामों की तादाद 67 थी। हजरत अब्बास (रजि0) ने 70, हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर (रजि0) ने एक हजार और अब्दुर्रहमान बिन औफ(रजि0) ने बीस हजार गुलाम खरीद कर आजाद कर दिये। ऐसे ही बहुत से सहाबा (रजि0) के बारे में रिवायतों में तफसील आर्इ हैं कि उन्होने खुदा के कितने बन्दो को गुलामी से मुक्त किया था। इस तरह पुराने दौर की गुलामी का मसला तीस-चालीस साल में हल कर दिया गया।

मौजूदा जमाने मे इस मसले का जो हल निश्चित किया गया है, वह यह हैं कि जंग के बाद दोनो तरफ के जंगी कैदियों का तबादला कर लिया जाये। मुसलमान इसके लिए पहले से तैयार थे, बल्कि जहां कहीं मुखालिफ पक्ष ने कैदियो के तबादले को कुबूल किया, वहां बगैर झिझक इस बात पर अमल किया गया। लेकिन अगर इस जमाने की किसी लड़ार्इ मे एक हुकूमत पूरे तौर पर हार खा जाये और जीतने वाली ताकत अपने आदमियों को छुड़ा ले और हारी हुर्इ हुकूमत बाकी ही न रहे कि अपने आदमियों को छुड़ा सके तो तजुर्बा यह बताता हैं कि पराजित कौम के कैदियों को गुलाम से बदतर हालत मे रखा जाता हैं। हमे बताया जाये कि पिछले विश्व युद्ध मे रूस ने जर्मनी और जापान के जो कैदी पकड़े थे, उनका अन्जाम क्या हुआ । उनका आज तक हिसाब नही मिला हैं। कुछ नही मालूम कि कितने जिन्दा रहे और कितने मर खप गये। उनसे जो खिदमते ली गये, वे गुलामी की खिदमत से बदतर थी। शायद फिरऔन के जमाने में अहराम बनाने के लिए गुलामों से उतनी जालिमाना खिदमते न ली गर्इ होगी जितनी रूस में साइबेरियां और पिछले इलाकों को तरक्की देने के लिए जंगी कैदियों से ली गयी।

अब मै फिर अपने अस्ल विषय पर आता हैं।


9. हर इन्सान का यह हक़ हैं कि उसके साथ न्याय किया जायें।

यह एक बहुत अहम अधिकार हैं, जो इस्लाम ने इन्सान को इन्सान होने की हैसियत से दिया हैं। कुरआन में आया हैं कि ‘‘ किसी गिरोह, की दुश्मनी तुम्हे इतना न भड़का दे.................कि तुम नामुनासिब ज्यादती करने लगो।’’ (5:8) आगे चल कर इसी सिलसिले मे फिर फरमाया, ‘‘और किसी गिरोह की दुश्मनी तुम को इतना उत्तेजित न कर दें कि तुम इन्साफ से हट जाओ, इन्साफ करो, यही धर्म परायणता से करीबतर हैं।’’ (5:8) एक और जगह फरमाया गया हैं कि ‘‘ ऐ लोगो! ज्ो र्इमान लाये हो, इन्साफ करने वाले और ख़्ाुदा के वास्ते गवाह बनो।’’(5:8) मालूम हुआ कि आम इन्सान ही नही दुश्मनों तक से इन्साफ करना चाहिए। दूसरे शब्दों में इस्लाम जिस इन्साफ की दावत देता हैं, वह सिर्फ अपने देश के रहने वालों के लिए या अपनी कौम के लोगों के लिए या मुसलमानों के लिए ही नही, बल्कि दुनिया भर के सब इन्सानों के लिए हैं। हम किसी से भी बेइन्साफी नही करते, हमारा हमेशा रवैया यह होना चाहिए कि कोर्इ आदमी भी हम से बे-इन्साफी का अंदेशा न रखे और हम हर जगह हर आदमी के साथ न्याय और इन्साफ का ख्याल रखें।

10.    इन्सानी बराबरी


इस्साम न सिर्फ यह कि किसी रंग व नस्ल के भेद-भाव के बगैर तमाम इन्सानों के बीच बराबरी को मानता हैं, बल्कि उसे एक महत्वपूर्ण सत्य नियम करार देता हैं। कुरआन में अल्लाह ने फरमाया हैं कि ‘‘ ऐ इन्सानों! हम ने तुम को एक मां और एक बाप से पैदा किया।’’ दूसरे शब्दों में, इसका मतलब यह हुआ कि तमाम इन्सान अस्ल में भार्इ-भार्इ हैं, एक ही मां और एक ही बाप की औलाद हैं। ‘‘ और हमने तुम को कौमों और कबीलों में बांट दिया, ताकि तुम एक दूसरे को पहचानों। ‘‘(49:13) यानी कौमों और कबीलो में यह तक्सीम पहचान के लिए हैं। इसलिए हैं कि एक कबीलों या एक कौम के लोग आपस मे एक दूसरे से परिचित हो और आपस मे सहयोग कर सके। यह इसलिए नही हैं कि एक कौम दूसरी कौम पर बड़ार्इ जताये और उसके साथ घमण्ड से पेश आये, उसको कमजोर और नीचा समझे और उसके अधिकारों पर डाके मारे। ‘‘ हकीकत में तुम में इज्ज्ात वाला वह हैं, जो तुम में सब से ज्यादा ख़्ाुदा से डरने वाला है।’’(49:13) यानी इन्सान पर इन्सान की बड़ार्इ सिर्फ पाक़ीजा किरदार और अच्छे आचरण की बिना पर हैं, न कि रंग व नस्ल जुबान या वतन की बिना पर। और यह बड़ार्इ भी इस गरज के लिए नही हैं कि कि अच्छे किरदार और आचरण के लोग दूसरे इन्सानो पर अपनी बड़ार्इ जतायें, क्योकि बड़ार्इ जताना स्वंय मे एक बुरार्इ हैं, जिस को कोर्इ धर्म परायण और परहेजगार आदमी नही कर सकता और यह इस गरज के लिए भी नही हैं कि नेक आदमी के अधिकार बुरे आदमियों के अधिकारों से बढ़कर हो, या उसके अधिकार उनसे ज्यादा हों, क्योकि यह इन्सानी बराबरी के खिलाफ हैं, जिसको इस आदत के शुरू में नियम के तौर पर बयान किया गया हैं। यह बड़ार्इ और इज्जत अस्ल में इस वजह से हैं कि नेकी और भलार्इ नैतिक-दृष्टि से बुरार्इ के मुकाबले में बहरहाल श्रेष्ठ हैं। इसी बात को अल्लाह के रसूल (सल्ल0) ने एक हदीस में बयान फरमाया हैं कि-

‘‘ किसी अरबी को गै़र-अरबी पर कोर्इ बड़ार्इ नही हैं, न गै़र-अरबी पर कोर्इ बड़ार्इ हैं। न गोरे को काले पर और न काले को गोरे पर कोर्इ बड़ार्इ हैं। तुम सब आदम ‘‘(अलैहि0) की औलाद हो और आदम मिट्टी से पैदा हुए थे।’’ इस तरह इस्लाम ने तमाम मानव-जाति में बराबर कायम की और रंग, नस्ल, भाषा और राष्ट्र की बिना पर सारे भेद-भावों की जड़ काट दी। इस्लाम के नजदीक यह हक़ इन्सान होने की हैसियत से हासिल हैं कि उसके साथ उसकी खाल के रंग या उसकी पैदाइश की जगह या उसकी जन्म देने वाली नस्ल व कौम की बिना पर कोर्इ भेद-भाव न बरता जाये। उसे दूसरे के मुकाबले में नीच न ठहराया जाये। और उसके हूकूक दूसरो से कमतर न रखे जायें। अमेरिका के अफ्रीकी नस्ल के लोगो का मशहूर लीडर ‘मैलकम इक्स’ जो काली नस्ल के बाशिन्दों की हिमायत मे सफेद नस्ल वालों के खिलाफ सख्त कशमकश करता रहा था, मुसलमान होने के बाद जब हज के लिए गया और वहॉ उसने देखा कि एशिया, अफ्रीका, यूरूप, अमेरिका गरज हर जगह के और हर रंग व नस्ल के मुसलमान एक ही लिबास में एक खुदा के घर की तरफ चले जा रहे हैं, एक ही घर का तवाफ कर रहे हैं, एक ही साथ नमाज पढ़ रहे हैं और उनमें किसी तरह का भेद नही हैं तो वह पुकार उठा कि यह हैं रंग और नस्ल के मसले का हल, न कि वह जो हम अमेरिका में अब तक करते रहे हैं। आज खुद गैर-मुस्लिम विचारक भी, जो अंधे भेद-भाव और तास्सुब में ग्रस्त नही हैं, यह मानते हैं कि इस मसले को जिस कामियाबी के साथ इस्लाम ने हल किया हैं, कोर्इ दूसरा मजहब और तरीका हल नही कर सका हैं।

11. भलार्इ के कामो मे हर एक से सहयोग और बुरार्इ में किसी से सहयोग नहीं


इस्लाम ने एक अहम उसूल यह पेश किया है कि ‘‘नेकी और परहेजगारी में सहयोग करो। बदी और गुनाह के मामले में सहयोग न करों।’’ (5:2)
इस के माने यह है कि जो आदमी भलार्इ और ख़्ाुदा तरसी का काम करें, यह देखे बगैर कि वह उत्तर का रहने वाला हो या दक्षिण का, यह हक रखता हैं कि हम उसमें सहयोग करेंगे। इसके विपरीत जो आदमी बदी और ज्यादती का काम करें, चाहे वह हमारा करीबी या रिश्तेदार ही क्यों न हो, उसका न यह हक हैं कि नस्ल व वतन या भाषा और कौमियत के नाम पर वह हमारा सहयोग मांगे ,न उसे हम से यह उम्मीद रखनी चाहिए कि हम उस से सहयोग करेंगे। न हमारे लिए यह जायज हैं कि ऐसे किसी काम मे उसके साथ सहयोग करें। बदकार हमारा भार्इ ही क्यों न हो, हमारा और उसका कोर्इ साथ नही हैं। नेकी का काम करने वाला चाहे हम से कोर्इ रिश्ता न रखता हो, हम उसके साथी और मददगार हैं, या कम से कम खैर ख्वाह और शुभचिंतक तो जरूर ही हैं।


इस्लामी युद्ध-नियम व संधि की हैसियत
                            इस्लाम ने इसके विपरीत जंग के जो आदाब बताये हैं, उनकी सही हैसियत कानून की हैं, क्योकि वे मुसलमानों के लिए अल्लाह और रसूल के दिये हुए आदेश हैं, जिन की पाबन्द हम हर हाल में करेंगे, चाहे हमारा दुश्मन कुछ भी करता रहे। अब यह देखना हर इल्म रखने वाले का काम है कि जो जंगी-नियम तेरह सौ साल पहले तय किये गये थे, पश्चिम के लोगो ने उस की नक्ल की है या नही, और नकल करके भी वह जंग की सभ्य मर्यादाओं के उस दर्जे तक पहुंच सका हैं या नही, जिस पर इस्लाम ने हमे पहुचाया था।
पश्चिम वाले अक्सर यह दावा किया करते है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल0) ने सब कुछ यहूदियों और र्इसार्इयों से ले लिया हैं। इस लिए बाइबिल को भी पढ़ डालिए, ताकि आपको मालूूम हो जाये कि सभ्यता के इन दावेदारों की मुकद्दस किताब जंग के किन तरीको की हिदायत देती हैं।
शुरू ही मे यह बात भी समझ लीजिए कि इस्लाम मे इन्सान के इन्सान होने की हैसियत से जो अधिकार बयान किये गये हैं, उनको दोहराने की अब जरूरत नही हैं। इनको जेहन में रखते हुए देखिए कि इन्सान के दुश्मनों के क्या हुकूक इस्लाम में मुर्कर किये गये हैं।

युद्ध न करने वालो के अधिकार
इस्लाम में सबसे पहले दुश्मन मुल्क की जंग करती हुर्इ (Combatant) और जंग न करती हुर्इ (Non--Combatant) आबादी के बीच फर्क किया गया हैं। जहां तक जंग न करती हुर्इ आबादी का संबंध हैं (यानी जो लड़ने वाली नहीं हैं या लड़ने के काबिल नही हैं। मिसाल के तौर पर औरते, बच्चे, बूढ़े, बीमार, अंधे अपाहिज वगैरह) उसके बारे में अल्लाह के रसूल (सल्ल0) की हिदायते निम्नलिखित हैं।


जो लड़ने वाले नही हैं, उनको कत्ल न किया जाये 

‘‘किसी बूढ़े, किसी बच्चे और किसी औरत को कत्ल न करों।’’

‘‘ खानकाह मे बैठे राहिबो को कत्ल न करो।’’ या इबादतगाहो मे बैठे हुए लोगो को न मारों।

जंग मे एक मौके पर हूजूर (सल्ल0) ने एक औरत की लाश देखी तो फरमाया ‘‘ यह तो नही लड़ रही थी।’’ इस से इस्लामी कानूनदानों ने यह उसूल मालूम किया कि जो लोग लड़ने वाले न होंं उनको कत्ल न किया जाये।


युद्ध करने वालो के अधिकार
इसके बाद देखिये कि लड़ने वालो को क्या अधिकार इस्लाम ने दिये हैं।

1-    आग का अजाब न दिया जाये

हदीस मे हूजूर (सल्ल0) का इरशाद हैं कि ‘‘ आग का अजाब  देना आग के रब के सिवा किसी को जेबा नही देता।’’ इससे यह हुक्म निकला कि दुश्मन को जिन्दा न जलाया जाये।

2-    जख्मी पर हमला न किया जाये

‘‘ किसी जख्मी पर हमला न करो।’’ मुराद हैं वह जख्मी जो लड़ने के काबिल न रहा हो, न अमली तौर पर लड़ रहा हो।

3-    कैदी को कत्ल न किया जाय
‘‘ किसी कैदी को कत्ल न किया जाये।’’

4-    बांध कर कत्ल न किया जाये

‘‘ नबी (सल्ल0) ने बांध कर कत्ल करने या कैद की हालत में कत्ल करने से मना फरमाया।’’ हजरत अबू अय्यूब अन्सारी (रजि0) जिन्होने यह रिवायत हुजूर (सल्ल0) से नकल की हैं फरमाते है कि ‘‘जिस ख़्ाुदा के हाथ में मेरी जान हैं, उसकी कसम खा कर कहता हॅू कि मै किसी मुर्ग को भी बांध कर जिब्ह न करूंगा।’’

5-    दुश्मन कौम के देश में आम गारतगरी या लूटमार न की जाये

यह हिदायत भी की गर्इ कि दुश्मनों के मुल्क में दाखिल हो तो आम तबाही न फैलाओं। बस्तियों को वीरान न करो, सिवाये उन लोगो के जो तुम से लड़ते हैं और किसी आदमी के माल पर हाथ न डालो। हदीस में बयान किया गया हैं कि ‘‘नबी (सल्ल0) ने लूटमार से मना किया हैं। ‘‘और आप (सल्ल0) का फरमान था कि ‘‘लूट का माल मुरदार से ज्यादा हलाल नही हैं। ‘‘ यानी वह भी मुरदार की तरह हराम हैं। हजरत अबू बक्र सिद्दीक (रजि0) फौजो को रवाना करते वक्त हिदायत फरमाते थे कि ‘‘बस्तियों को वीरान न करना, खेतों और बागों को बरबाद न करना, जानवरों को हलाक न करना।’’ (ग़नीमत के माल का मामला इससे अलग हैं। इस से मुराद वह माल हैं, जो दुश्मन के लश्करो, उसके फौजी कैम्पों और उसकी छावनियों में मिले। उसको जरूर इस्लामी फौजे अपने कब्जे मे ले लेंगी। लेकिन आम लूटमार वह नहीं कर सकती।)

जीते हुये इलाके के लोगो से कोर्इ चीज मुफ्त या बिला इज़ाजत न ली जाये इस बात से भी मना कर दिया गया कि आम आबादी की किसी चीज से मुआवजा अदा किये बगैर फायदा न उठाया जाये। जंग के दौरान में अगर दुश्मन के किसी इलाके पर कब्जा करके मुसलमानों की फौज वहां ठहरी हो तो उसको यह हक नही पहुंचता कि लोगो की चीजों का बे रोक-टोक इस्तेमाल करें। अगर उसको किसी चीज की जरूरत हो तो खरीद कर लेना चाहिए या मालिकों की इजाजत लेकर, उस को इस्तेमाल करना चाहिए। हजरत अबूबक्र सिद्दीक (रजि0) फौजों को रवाना करते वक्त यहां तक फरमाते थे कि, ‘‘दूध देने वाले जानवरो का दूध भी तुम नही पी सकते, जब तक कि उनके मालिकों से इजाजत न ले लो।
   
1-    दुश्मन की लाशों पर ग़ुस्सा न निकाला जाये

इस्लाम मे पूरे तौर पर इस बात को भी मना किया गया हैं कि दुश्मन की लाशों का अनादर किया जाये या उनकी गत बिगाड़ी जाये। हदीस में आया हैं कि
‘‘नबी (सल्ल0) ने दुश्मनों की लाशों, की काट, पीट या गत बिगाड़ने से मना फरमाया हैं।’’ यह हुक्म जिस मौके पर दिया गया, वह भी बड़ा सबक आमोज हैं। उहद की जंग में जो मुसलमान शहीद हुये थे, दुश्मनों ने उनकी नाक काट कर उन के हार बनाये और गलों में पहने। हूजूर (सल्ल0) के चचा हजरत हम्जा (रजि0) का पेट चीर कर उनका कलेजा निकाला गया और उसे चबाने की कोशिश की गयी। उस वक्त मुसलमानों का गुस्सा हद को पहुंच गया था। मगर हूूजूर (सल्ल0) ने फरमाया कि तुम दुश्मन कौम की लाशो के साथ ऐसा सुलूक न करना। इसी से अन्दाजा किया जा सकता हैं कि यह दीन हकीकत में [+kqnk ही का भेजा हुआ दीन हैं। इसमें इन्सानी ज़ज़बात और भावनाओं का अगर दखल होता तो उहूद की जंग में यह मंजर देख कर हुक्म दिया जाता कि तुम भी दुश्मनों की फौजों की लाशों का इसी तरह अनादर करो।


2-    दुश्मन की लाशे उसके हवाले करना

अहजाब की जंग में दुश्मन का एक बड़ा मशहूर घुड़ सवार मर कर खन्दक में गिर गया। काफिरों ने अल्लाह के रसूल (सल्ल0)  के सामने दस हजार दीनार पेश किये कि उसकी लाश हमे दे दीजिए। आप  (सल्ल0)  ने फरमाया कि मै मुर्दे बेचने वाला नही हूं। तुम ले जाओ अपनी लाश।

3-    वादा-खिलाफी सख्ती से मना

इस्लाम में बदअहदी को भी सख्ती से मना कर दिया गया हैं। अल्लाह के रसूल (सल्ल0) फौजो को भेजते वक्त जो हिदायतें देते थे, उनमें से एक यह थी कि ‘‘ बदअहदी न करना। ‘‘ कुरआन और हदीस मे इस हुक्म को बार-बार दोहराया गया हैं कि दुश्मन अगर अहद व पैमान की खिलाफवर्जी करता हैं तो करे, लेकिन तुम को अपने अहद व पैमान की खिलाफवर्जी कभी न करना चाहिए।
हुदैबिया की सुलह की मशहूर घटना हैं कि सुलहनामा तय हो जाने के बाद एक मुसलमान नव जवान अबू जन्दल ़(रजि0) जिन का बाप सुलहनामे की शर्ते अल्लाह के रसूल ़(सल्ल0) से तय कर रहा था, बेड़ियों मे भागते हुये आये और उन्होने कहा मुसलमानों मुझे बचाओ!! अल्लाह के रसूल ़(सल्ल0) ने उन से फरमाया कि मुआहदा हो चुका है। अब हम तुम्हारी मदद नही कर सकते, तुम वापस जाओं। अल्लाह तुम्हारे लिये कोर्इ रास्ता खोलेगा। उनकी दयनीय दशा को देखकर मुसलमानों की पूरी फौज रो पड़ी, लेकिन अल्लाह के रसूल ़(सल्ल0) ने जब फरमा दिया कि अहद को हम तोड़ नही सकते, तो उनको बचाने के लिए एक भी आगे न बढ़ा और काफिर उनको जबरन घसीटते हुये ले गये यह अहद व पैमान की पाबन्दी की अनोखी मिसाल हैं और इस्लामी इतिहास मे ऐसी मिसाले बहुत सी मौजूद हैं।

4-    जंग से पहले जंग के ऐलान का हुक्म

कुरआन मे फरमाया गया हैं कि, ‘‘अगर तुम्हे किसी कौम से ख्यानत ़(यानी अहद तोड़ने) का खतरा हो तो उसका अहद खुल्लमखुल्ला उसके मुंह पर मार दो।’’ ़(8:58) इस आयत में इस बात से मना कर दिया गया हैं कि जंग के ऐलान के बगैर दुश्मन के ‘खिलाफ जंग छोड़ दी जाये, सिवाय इसके कि दूसरे फरीक ने आक्रामक कार्यवाइयां शुरू कर दी हो। अगर दूसरे फरीक ने ऐलान के बगैर आक्रामक कार्यवाइयों की शुरूआत कर दी हो तो फिर हम बगैर ऐलान किये उसके खिलाफ जंग कर सकते हैं, वरना कुरआन हमे यह हुक्म दे रहा है कि ऐलान करके उसे बता दो कि अब हमारे और तुम्हारे बीच कोर्इ अहद बाकी नही रहा हैं और अब हम और तुम बरसरे जंग हैं। अगरचे मौजूदा अन्तराष्ट्रीय कानून का तकाजा भी यह हैं कि जंग के ऐलान के बगैर जंग न की जाये, लेकिन इस बीसवीं सदी में भी तमाम बड़ी-बड़ी लड़ाइयां जंग के ऐलान के बगैर शुरू हुर्इ। वह उनका अपना बनाया हुआ कानून हैं, इसलिए वह अपने ही कानून को तोड़ने के मुख्यार हैं। मगर हमारे लिये यह ख़्ाुदा का दिया हुआ कानून है, हम उसकी खिलाफवर्जी नही कर सकते।







इस्लामी राज्य मे नागरिकों के अधिकार

अब मै आप को नागरिको के अधिकार बताना चाहता हूं। ये अधिकार उन अधिकारों से अधिक हैं जो अभी थोड़ी देर पहले मैं इन्सान की हैसियत से इन्सान के अधिकार बयान कर चुका हूं।

1-    जान-माल की रक्षा

अल्लाह के रसूल (सल्ल0) ने अपने आखिरी हज़ के मौके पर जो तक़रीर की थी, उसमें फरमाया था कि तुम्हारी जाने और तुम्हारे माल एक दूसरे पर कियामत तक के लिए हराम हैं। ‘‘जो आदमी किसी मोमिन को जान बूझ कर कत्ल करे, उसकी सजा जहन्नम हैं, जिस में वह हमेशा रहेगा, अल्लाह ने उस पर लानत फरमार्इ हैं और उसके लिए सख्त अजाब तैयार कर रखा हैं।’’ ़(4:93) नबी (सल्ल0) ने जिम्मियों के बारे मे भी फरमाया कि
‘‘जिसने किसी मुआहिद (यानी जिम्मी) को कत्ल किया वह जन्नत की खुशबू तक न सूंघ करेगा। ‘‘कुरआन किसी जान के कत्ल करने को हराम करार देने के बाद, इस में सिर्फ एक कत्ल की इजाजत देता हैं और वह यह हैं कि ऐसा कत्ल हक के साथ हो। यानी नाहक न हो, बल्कि कोर्इ कानूनी हक उसका तक़ाजा करता हो कि आदमी को कत्ल किया जाये और ज़ाहिर हैं कि ह़क और नाहक का फैसला एक अदालत ही कर सकती है। और जंग या बगावत की सूरत में एक इन्साफ पसन्द हुकूमत यानी शरीअत की पाबन्द हुकूमत ही यह तय कर सकती हैं कि न्याय-संगत जंग कौन-सी हैं, जिसमें इन्सानी खून बहाना ज़ायज हो। और इस्लामी कानून की निग़ाह से बागी कौन करार पाता है, जिस पर तलवार उठा ली जाये, या जिसको मौत की सजा दी जाये। ये फैसले न किसी ऐसी अदालत नी छोड़े जा सकते है जो ख़्ाुदा से बेखौफ शासन व्यवस्था से भयभीत हो कर इन्साफ करने लगे और किसी ऐसी हुकूमत के जुर्म कुरआन-हदीस के अनुसार ज़ायज़ क़रार पा सकते हैं, जो बेझिझक अपने शहरियों को सिर्फ इसीलिए खुले या छिपे कत्ल करती हो कि वे उसकी अनुचित कार्यवाइयों से मतभेद करते या उन की आलोचना करते हैं और उसके इशारे पर कत्ल जैसे बड़े जुर्म का अपराध करने वालों को उल्टा सुरक्षा देती हो कि उनके ख़्िालाफ न पुलिस कार्यवाही करे न अदालत में कोर्इ सुबूत और गवाही पेश हो सके। ऐसी हुकूमत का वजूद ही एक जुर्म हैं, न यह कि उसके हुक्म से किसी इन्सान के कत्ल पर क़ुरआन की इस्तिलाह ‘‘कत्ल बिल्हक’’ (यानी हक के साथ कत्ल) लागू हो सके, जान के साथ माल की रक्षा का हक भी इस्लाम ने स्पष्ट रूप से दिया हैं जैसा कि अभी मैं आखिरी हज की तकरीर के हवाले से बयान कर चुका हूं। बल्कि कुरआन तो ख़्ाुदा के कानून के सिवा किसी और तरीके से लोगो के माल लेने को बिल्कुल हराम करार देता हैं। ‘‘और अपने माल आपस में बातिल तरीके से न खाया करों।’’ (2:188)


2-    इज़्जत की रक्षा

दूसरा बड़ा हक एक नागरिक की इज्जत की रक्षा हैं। आखिरी हज़ की जिस त़करीर का मै जिक्र कर चुका हूं उसमें हूजूऱ (सल्ल0) ने मुसलमानों की सिर्फ जान-माल ही को एक दूसरे पर हराम करार नही दिया था, बल्कि उनकी इज्जत व आबरू को भी किय़ामत तक हराम ठहराया था। क़ुरआन में साफ हुक्म हैं कि ‘‘लोग एक दूसरे का मजाक न उड़ाये, एक दूसरे की हंसी न करें।’’ (49:11) ‘‘ और तुम आपस में एक दूसरे पर चोटें न करो (49:11) फब्तियां न कसो, इल्जाम न धरो, ताने न दो, खुल्लम खुल्ला या होठो के अन्दर या इशारों से उसको जलील न करो।
‘‘एक दूसरे के बुरे नाम न रखों।’’(49:11) ‘‘और तुम मे से कोर्इ किसी की पीठ पीछे उसकी बुरार्इ न करें।़(49:12) यह हैं हमारा इज़्ज़त की रक्षा का क़ानून और यह पश्चिम वालो के मानहानि के कानून ़(Defamation) से कोर्इ गुना बेह़तर है। हमारे कानून की रूसे अगर यह बात साबित हो जाये कि किसी ने किसी आदमी की इ़ज़्ज़त पर हमला किया हैं तो इसको देखे बगैर कि वह मज़्लूम अपने आप को इज़्ज़तदार साबित करता हैं या नही, जालिम को उसकी सजा बहरहाल दी जायेगी। लेकिन पश्चिम वालों के कानून का कमाल यह हैं कि मान-हानि का दावा करने वाले को पहले यह साबित करना होता हैं कि वह इज्जत वाला हैं और इस बहस में उस गरीब की उस से ज्यादा तौहीन और बेइज्जती हो जाती हैं, जिसकी फरियाद ले कर वह इन्साफ का दरवाजा खटखटाने गया था। इसके अलावा कुछ ऐसे गवाह भी उसे पेश करने पड़ते हैं कि मुल्जिम की बेइज्जत करने वाली बातों से वह वाकर्इ उन की निगाह में जलील हो गया हैं। किस गजब की कानून दानी हैं यह, जिसे ख़्ुदा के बनाये हुए कानून के सामने लाया जाता हैं। इस्लाम तो बजाये खुद किसी आदमी की तौहीन को जुर्म करार देता हैं, चाहे वह इज्जत वाला हो, या न हो और चाहे तौहीन करने वाले की बातों से उसकी वाकर्इ तौहीन हुर्इ या नही। इस्लामी कानून की रूह से मुल्जिम के इस कार्य का साबित हो जाना, उसको मुजरिम करार देने के लिए काफी हैं कि उसने ऐसी बात की हैं, जो आम अक्ल (Common sense) के लिहाज से फरयादी के लिए तौहीन का कारण हो सकती हैं।


3-    निजी ज़िन्दगी की सुरक्षा

इस्लाम अपने राज्य के हर नागरिक का यह हक करार देता है कि उसकी निजी जिन्दगी में कोर्इ ना-मनासिब दखल-अन्दाजी न होने पाये । कुरआन का हुक्म हैं कि ‘‘ एक दूसरे के हालात की टोह में न रहा करों।’’ (49:12) ‘‘ लोगों के घरों  में उनकी इज़ाज़त के बगैर अन्दर न जाओं।’’ ़(24:27) अल्लाह के रसूल (सल्ल0) ने यहां तक ताकीद की कि आदमी खुद अपने घर में अचानक  दाखिल न हो, बल्कि किसी न किसी तरह घर वालों को खबरदार कर दें कि वह अन्दर आ रहा हैं ताकि मां बहनों और जवान बेटियों पर ऐसी हालत मे नजर न पड़े, जिसमें न वह उसे पसन्द कर सकती हैं कि उन्हे देखा जाये। न खुद वह आदमी यह पसन्द करता हैं कि उन्हे देखे। दूसरों के घर में झांकने की कोशिश करना भी सख्त मना हैं। यहां तक कि अल्लाह के रसूल ़(सल्ल0) का फरमान हैं कि ‘‘अगर कोर्इ आदमी किसी को अपने घर में झांकते हुए देखे और वह उसकी आंख फोड़ दे तो उस पर कोर्इ पकड़ नहीं। ‘‘ हूजूर (सल्ल0) ने दूसरे का खत तक उसकी इज़ाज़त के बगैर पढ़ने से मना फरमाया हैं। यहां तक कि कोर्इ अपना खत पढ़ रहा हो और दूसरा आदमी झांक कर उसे पढ़ने लगे तो यह भी सख्त मना हैं। यह हैं इस्लाम मे इन्सान के निजत्व ़(Privacy) का आदर। उधर इस नर्इ सभ्यता के तहत हमारी दुनिया का हाल यह हैं कि न सिर्फ लोगों के पत्र पढ़े जाते हैं और उनको सेन्सर किया जाता हैं और बाकायदा उनकी फोटोस्टेट कापियां भी रख जी जाती हैं, बल्कि अब लोगो के घरो में ऐसी मशीने भी लगायी जाने लगी है, जिनकी मदद से आप दूर बैठे हुए यह सुनते रहे कि उसके घर में क्या बाते हो रही हैं। इसके दूसरे माने यह हैं कि अब निजत्व कोर्इ चीज नही हैं और आदमी की निजी जिन्दगी का व्यवहारत: खातमा कर दिया गया हैं।

इस टोह के लिए यह कोर्इ नैतिक तर्क नही हैं कि हुकूमत खतरनाक आदमियों के रहस्यों से वाकिफ रहना जरूरी समझती हैं। हालाकि हकीकत मे उस की बुनियाद वह शक व शुबह हैं, जिसमें वह कुछ समझदारी और सरकारी पालसियों पर बे-इत्मिनानी की बू सूंध लेती हैं। यही चीज हैं, जिसको इस्लाम राजनीति में बिगाड़ की जड़ करार देता हैं।
अत: अल्लाह के रसूल (सल्ल0) का इरशाद हैं,  ‘‘वक्त का हाकिम जब लोगो के अन्दर शंकाओं के कारण ढूंढने लगता है तो उनको बिगाड़ कर रख देता हैं।
‘‘अमीर मुआविया ़(रजि0) का बयान हैं कि उन्होने खुद हूजूर ़(सल्ल0) को यह फरमाते सुना हैं कि ‘‘अगर तुम लोगो के पोशीदा हालात मालूम करने के दर पे हो गये तो उन्हे बिगाड़ दोगे या कम से कम बिगाड़ के करीब पहुंचा दोगे।’’ बिगाड़ने का मतलब यह हैं कि जब लोगो के राज टटोलने के लिए जासूस ़(सी0आर्इ0डी0) फैला दिये जाते हैं तो लोग खुद एक दूसरे को शंका की नजर से देखने लगते हैं, यहां तक कि अपने घरो तक मे वह खुल कर बात करते हुए डरते हैं कि न मालूम अपने ही बच्चों की जुबान से कोर्इ बात ऐसी निकल जाये जो हम पर आफत ले आये, इस तरह अपने घर तक में मुंह खोलना आदमी के लिए मुश्किल हो जाता हैं और समाज में एक आम बेएतमादी की कैफियत पैदा हो जाती हैं।

4-    व्यक्तिगत आजादी की सुरक्षा

इस्लाम यह नियम भी तय करता हैं कि किसी आदमी को उसका जुर्म अदालत में, और वह भी खुली अदालत में साबित किये बगैर कैद नही किया जा सकता। सिर्फ सन्देह की बिना पर पकड़ना और किसी अदालती कार्यवाही के बगैर और सफार्इ पेश करने का मौका दिये बगैर कैद कर देना इस्लाम में जायज नहीं हैं। हदीस में बयान हुआ हैं कि नबी (सल्ल0) एक बार मस्जिद मे खुतबा दे रहे थे। खुतबे के दौरान में एक आदती ने उठ कर कहा ऐ अल्लाह के रसूल! मेरे पड़ोसी किस जुर्म मे पकड़े गये हैं? आप (सल्ल0) ने सुना और खुतबा जारी रखा। उसने फिर उठ कर यही सवाल किया, आप ने फिर खुतबा जारी रखा, उसने तीसरी बार उठ कर यही सवाल किया। तब आप ़(सल्ल0) ने हुक्म दिया कि इसके पड़ोसियों को छोड़ दो। दो बार सुनकर खामोश रहने की वजह यह थी कि कोतवाल मस्जिद मे मौजूद था। अगर उस आदमी के पड़ोसियों को गिरफतार करने की कोर्इ खास वजह होती तो वह उठ कर उसे बयान करता। जब उसने कोर्इ वजह बयान न की तो हूजूर (सल्ल0) ने हुक्म दे दिया कि जिन लोगो को गिरफतार किया गया हैं, उन्हे छोड़ दिया जाये। कोतवाल इस्लामी कानून से वाकिफ था। इस लिए उसने उठकर यह नही कहा कि ‘‘ प्रशासन उन के कसूर से वाकिफ हैं और एलानिया वह अपराध बयान नही किया जा सकता हुजूर ़(सल्ल0) अकेले मे मालूम करें तो अर्ज कर दिया जायेगा।’’यह बात अगर कोतवाल जुबान से निकालता तो उसी वक्त खड़े-खड़े उसे मुलाजमत से निकाल दिया जाता। अदालत के लिए यह बात बिल्कुल काफी थी कि कोतवाल ने गिरफतारी की कोर्इ वजह खुली आदलत मे पेश नही की है। इस लिए फौरन रिहार्इ का हुक्म दे दिया गया। कुरआन का साफ हुक्म है कि ‘‘ और जब तुम लोगो के बीच फैसला करो तो न्याय के साथ करों।’’ (4:58) और हूजूर (सल्ल0) का खुद यह हुक्म था कि ‘‘ और मुझे हुक्म दिया गया हैं कि मै तुम्हारे बीच इन्साफ करूं।’’ (42:15) इसी बिना पर हजरत उमर ़(रजि0) ने कहा कि ‘‘ इस्लाम मे कोर्इ आदमी इन्साफ के बगैर कैद नही किया जा सकता। ‘‘ यह शब्द खुद बता रहे हैंकि इन्साफ से मुराद उचित अदालती कार्यवाही ़(Due process of law) हैं और जिसको मना किया गया है, वह यह हैं कि किसी आदमी को उसके जुर्म का सुबूत और अदालत मे सफार्इ का मौका दिये बगैर पकड़ कर कैद कर दिया जाये। अगर हुकूमत किसी पर यह संदेह रखती हो कि उसने कोर्इ जुर्म किया हैं, या वह कोर्इ जुर्म करने वाला हैं तो उसे अदालत के सामने अपने संदेह के कारण बयान करने चाहिए। और मुल्जू या सन्दिग्ध आदमी को ख्ुाली अदालत मे अपनी सफाइ पेश करनी चाहिए ताकि अदालत यह फैसला कर सके कि उस आदमी पर सन्देह की कोर्इ सही बुनियाद हैंया नही, और सही बुनियाद हैं तो उसको जुर्म से दूर रखने के लिए कितनी, और सही बुनियाद हैं तो उसको जुर्म से दूर रखने के लिए कितनी मुददत तक कैद रखना चाहिए। यह फैसला लाजमी तौर पर खुली अदालत में होना चाहिए न कि बन्द कमरे में ़(In camera) ताकि हुकूमत का इल्जाम और मुल्जिम की सफार्इ और अदालत की कार्यहवाही देख कर लोगो को मालूम हो जाये कि उसके साथ इन्साफ किया जा रहा हैं। बेइन्साफी नही की जा रही हैं।

इस मामले मे इस्लाम का तरीकेकार खुद अल्लाह के रसूल ़(सल्ल0) के एक फैसले से मालूम होता हैं। बड़ी मशहूर घटना है कि मक्का फतह के लिए जब अल्लाह के रसूल (सल्ल0) तैयारी कर रहे थें तो एक सहाबी हजरत हातिब बिन बल्तअ (रजि0) ने मक्का के सरदारों के नाम एक खत लिख कर उस तैयारी की सूचना दे दी और वह खत एक औरत के हाथ मक्के भेज दिया। अल्लाह के रसूल (सल्ल0) को यह बात मालूम हो गर्इ। आप (सल्ल0) ने हजरत अली (रजि0) हजरत जुबैर (रजि0) को हुक्म दिया कि जाओं फलां जगह पर एक औरत तुम को मिलेगी। उसके पास एक खत हैं। वह उससे हासिल कर के ले आओं। चुनांचे वह गये और जो जगह रसूल़(सल्ल0) ने बतार्इ थी, उसी जगह वह औरत मिली। दोनो सहाबियों ने खत उससे ले लिया और लाकर आप (सल्ल0)  के सामने पेश कर दिया। अब देखिये खुली हुर्इ गद्द़ारी का मसला था। जंग के जमाने में दुश्मन को अपनी फौज के एक अहम राज की खबर दे देना और दुश्मनों को हमले की खबर वक्त से पहले भेज देना ऐसा काम था जिससे ज्यादा खतरनाक काम की कल्पना नही की जा सकती। बन्द कमरे में सुनवार्इ के लिए इस से ज्यादा मुनासिब और कौन सा मुकद्द़मा हो सकता था, लेकिन अल्लाह के रसूल (सल्ल0) मस्जिद नबवी की खुली अदालत में सैकड़ो लोगो के सामने हजरत हातिब (रजि0) को बुलाकर उनसे पूछ-ताछ करते हैं। वे कहते हें कि ऐ अल्लाह के रसूल! मै इस्लाम का बागी नही हुआ हूं। गद्द़ारी की नीयत से यह काम मै नही कर बैठा हूं । अस्ल मे मेरे बाल-बच्चे वहां हैं और मक्के मे कोर्इ मेरा खानदान नही हैं, जो मेरे बाल बच्चो की हिमायत करे, इसलिए मैने यह खत लिखा ताकि मक्के वाले मेरा एहसान मानकर मेरे बाल बच्चों के साथ ज्यादती न करे। हजरत उमर (रजि0) उठ कर अर्ज् करते हैं कि ऐ अल्लाह के रसूल (सल्ल0) मुझे इजा़जत दीजिए कि  इस  गद्द़ार को कतल कर दें।

अल्लाह के रसूल़(सल्ल0) फरमाते है। यह बदर वालों में से हैं और इन्होने अपने काम की जो वहज बयान की हैं वह सच के अनूकूल हैं। हूजूर (सल्ल0) के इस फैसले पर गौर कीजिए। काम साफ गद्द़ारी का था, मगर आप दो बातों की वजह से हजरत हातिब (रजि0) को बरी कर देते हैं। एक बात यह कि उनका पिछला रिकार्ड बता रहा हैं कि वह इस्लाम मे  गद्द़ार नही हो सकते, क्योकि उन्होने बदर की जंग जैसे नाजुक मौके पर अपना सीना खतरों के आगे पेश किया था। दूसरे यह कि मक्के मे उनके बाल-बच्चे वाकर्इ खतरे में थे। इसलिए अगर उनसे यह कमजोरी हुर्इ है।तो उसकी यह सजा काफी हैं कि सब के सामने उनका राज खुल गया और इस्लाम के वफादारों की निगाह मे उनकी बेइज्जती हो गर्इ ।
कुरआन मे भी हजरत हातिब की इस घटना का अल्लाह ने जिक्र किया हैं, मगर डांट-फटकार के सिवा उनके लिए कोर्इ सजा तय नही की गर्इ हैं।

हजरत अली (रजि0) के जमाने मे खारजियों का नीति-व्यवहार जैसा कुछ था वह इतिहास के पढ़ने वालों से छिपा हुआ नही हैं। वह खुल्लम-खुल्ला आप को गालियां देते थें। कत्ल तक कर देने की धमकियां देते थे। मगर इन बातों पर जब कभी इनको पकड़ा गया, आप ने उन्हे छोड़ दिया और अपनी हुकूमत के अफसरो से फरमाया कि ‘‘ जब तक वह बागियाना कार्यवाइयां नही करते, केवल जुबानी मुखालफत और धमकियां ऐसी चीज नही हैं जिनकी वजह से उन पर हाथ डाला जाये। ‘‘ इमाम अबु हनीफा अमीरूल मोमिनीन का यह कथन नकल करते हैं कि ‘‘ जब तक वह खुरूज  ़(स-शस्त्र बगावत) का इरादा नही करते, वक्त का खलीफा उन पर कार्यवाही नही करेगा। ‘‘ एक और मौके पर हजरत अली ़(रजि0) खुत्बा दे रहे थें। खारजियों ने अपना खास नारा खुतबे के बीच मे बुलन्द किया। आप ने इस पर फरमाया, ‘‘ हम तुम्हे मस्जिदों में आकर अल्लाह को याद करने से न रोकेंगे और हुकूमत के माल मे से तुम्हारा हक देना भी बन्द न करेंगे। जब तक तुम्हारे हाथ हमारे हाथों के साथ हैं ़(यानी जब तक तुम इस्लाम के दुश्मनों के खिलाफ लड़ने में हमारा साथ देते रहोगे) और हम तुम से हरगिज जंग न करेंगे, जब तक तुम हमसे जंग नही करते। ‘‘ अब देखिये जिस अपोजीशन से हजरत अली (रजि0) का सामना था, एक लोकतन्त्र व्यवस्था में उससे ज्यादा सख्त अपोजीशन की कल्पना भी नही की जा सकती । मगर इसके मुकाबले में जो आजादी उन्होने दे रखी थी, किसी हुकूमत ने ऐसी आजादी अपोजीशन को नही दी। उन्होने कत्ल की धमकिया देने वालों को भी न गिरफतार किया और न किसी को जेल भेजा।


5-    जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार

इस्लाम के दिये हुए अधिकारों में से एक अधिकार जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार हैं। अल्लाह का इरशाद हैं कि ‘‘अल्लाह को बरार्इ के साथ आवाज बुलन्द करना पसन्द नही हैं,
सिवाये उस आदमी के जिस पर जुल्म किया गया हो।’’ (4:148) यानी अल्लाह बुरार्इ पर जुबान खोलने को सख्त नापसन्द करता हैं। लेकिन जिस आदमी पर जुल्म किया गया हो, उसको यह अधिकार देता है कि वह खुल्लम खुल्ला जुल्म के खिलाफ आवाज उठाये। यह हक सिर्फ लोगो ही के साथ खास नही हैं। आयत के शब्द आम हैं। इसलिए अगर कोर्इ आदमी नही बल्कि कोर्इ जमाअत या गिरोह हुकूमत पर गलबां हासिल करके लोगो या जमाअतों या मुल्क की पूरी आबादी पर जुल्म ढाने लगे तो उनके खिलाफ सरे आम आवाज बुलन्द करना खुदा का दिया हुआ अधिकार हैं। और इस हक को छीनने का किसी का अधिकार नही हैं। अब अगर अल्लाह के दिये हुए उस हक को छीनता हैं तो वह अल्लाह के खिलाफ बगावत करता हैं। दफा 144 उसे दुनिया मे चाहे बचा ले जाये, अल्लाह की दोजख से बचाना उसकी करामतो में शामिल नही हैं।


6-    अपनी राय को आजादी से प्रकट करने का अधिकार

इस्लामी हुकूमत के तमाम नागरिकों को इस्लाम अपनी राया को प्रकट करने की आजादी इस शर्त के साथ देता हैं  fकवह भलार्इ फैलाने के लिए हो, न कि बुरार्इ फैलाने के लिए। अपनी राय का इजहार करने की आजादी का यह इस्लामी तसव्वुर मौजूदा पश्चिमी कल्वना से कर्इ गुना अच्छा हैं। बुरार्इ फैलाने की आजादी इस्लाम नही देता। आलोचना के नाम से अपशब्द  कहने की भी वह इजाजत नही देता। अल्बत्ता उसके नजदीक भलार्इ फैलाने के लिए अपनी राय का इजहार करने का हक सिर्फ हक ही नही बल्कि मुसलमानपर एक फर्ज भी हैं, जिसे रोकना खुदा सेलड़ार्इ मोल लेना हैं और यही मामला बुरार्इ से मना करने का भी हैं। बुरार्इ चाहे कोर्इ आदमी कर रहा हो या कोर्इ गिरोह , खुद अपने मुल्क की हुकूमत कर रही हो या किसी दूसरे मुल्क की, अपनी कौम कर रही हो, या दुनिया की कोर्इ दूसरी कौम, मुसलमान का हक हैं और यह उसकर फर्ज भी हैं कि उसे टोके, उससे रोके, और उसके खिलाफ, खुल्लम खुल्ला नाराजगी का इजहार करके यह बताये कि भलार्इ क्या हैं, जिसे उस व्यक्ति, या कौम, या हुकूमत का अपनाना चाहिए।

कुरआन मजीद में मोमिनो की यह खूबी बयान की गर्इ हैं कि ‘‘ वह भलार्इ के लिए कहने वाले और बुरार्इ से रोकने वाले होते हैं।’’ (3:104) इसके विपरीत मुनाफिको की विशेषता यह बयान की गर्इ हैं कि ‘‘ वह बुरार्इ के लिए कहने वाले और भलार्इ से रोकने वाले होते हैं।’’ (9:67) र्इमान वालों के बारे मे फरमाया गया हैं कि उनकी हुकूमत होने का मकसद ही यह हैं, ‘‘ उन लोगो को अगर हम जमीन में हुकुमत दे तो वह नमाज कायम करेंगे, जकात देगे और बुरार्इ से मना करेंगे।’’ (22:41)       

Author Name: इस्लाम में मानव अधिकार: सैयद अबुल आला मौदूदी (रह0)