कुरआन पर अनुचित आक्षेप

कुरआन और गैर-मुस्लिम
                कुछ संस्थाओं और लोगो ने यह झूठा प्रचार किया हैं और निरन्तर किए जा रहे हैं कि कुरआन गैर-मुस्लिम को सहन नही करता। उन्हे मार डालने और जड़-मूल से खत्म कर देने की शिक्षा देता हैं।

कुरआन मजीद की शिक्षाएं समाज देश तथा आम इन्सानो, विशेषकर गैर-मुस्लिम के सम्बन्ध में क्या है, संक्षेप में यहां प्रस्तुत की जा रही हैं। इससे यह अंदाजा हो सकेगा कि कुरआन की शिक्षाए मानव समाज के लिए कितनी अधिक कल्याणकारी हैं और आपत्तिकर्ताओं का दुष्प्रचार कितना अन्यापूर्ण दुर्भाग्यपूर्ण और भ्रामक है।

कुरआन मजीद मे स्पष्ट रूप से कहा गया हैं:

‘‘जमीन मे बिगाड़ पैदा न करो।’’(कुरआन, 2: 11)

एक अन्य स्थान पर कुरआन में हैं :

‘‘जो कुछ परमेश्वर ने तुझे दिया हैं उससे परलोक का घर बनाने का इच्छुक हो और दुनिया मे अपना हिस्सा मत भूल और भलार्इ कर जैसे कि परमेश्वर ने तेरे साथ भलार्इ की हैं और जमीन मे बिगाड़ व फसाद पैदा करनेवालों को पसन्द नही करता।’’  (28 : 77)


कुरआन मे एक जगह र्इशदूत के द्वारा कहलाया गया:

‘‘(र्इशदूत ने कहा:) ऐ मेरी कौम के लोगो! न्याय के साथ ठीक-ठीक पूरा नापों और तौलों और लोगो को उनकी चीजों मे घाटा मत दो और जमीन मे बिगाड़ व फसाद न फैलाते फिरो।’’ (कुरआन, 11 : 85)

कुरआन मे एक जगह हैं :

‘‘ वह परलोक का घर हैं जिसे हम उन लोगो को देंगे जो जमीन में अपनी बड़ार्इ नही चाहते और न बिगाड़ पैदा करना चाहते हैं। और कामयाबी तो परहेजगारी और र्इशभय रखनेवाले लोगो के लिए हैं।’’    (कुरआन, 28 : 83)

कुरआन ने दुश्मनों तक से न्याय और इन्साफ करने का आदेश दिया है :

‘‘हे र्इमानवालो। परमेश्वर के लिए सत्य पर जमे रहनेवाले, न्याय की गवाही देनेवाले बनो। किसी कौम की दुश्मनी तुम्हें इस बात पर उद्यत न कर दे कि तुम न्याय का दामन छोड़ दो । तुम्हे चाहिए कि हर दशा में न्याय करों। यही र्इशभय और धर्मपरायणता से मेल खाती बात हैं। परमेशवर का भय रखों, जो कुछ तुम करते हो निस्संदेह परमेश्वर को उसकी खबर हैं।’’ (कुरआन, 5 : 8)

कुुरआन मे एक जगह परमेश्वर ने यह आदेश दिया:

‘‘भलार्इ और बुरार्इ बराबर नही हुआ करती। तुम्हें चाहिए कि (बुरार्इ का) जवाब भले तरीकें से दो (इस आचरण के बाद) तुम देखोंगे कि जिससे तुम्हारी दुश्मनी थी वह तुम्हारा आत्मीय मित्र बन गया हैं।’’

भले कामों में गैर-मुस्लिमों के साथ सहयोग करने के सम्बन्ध मे कुरआन में परमेश्वर का आदेश है:

‘‘ऐसा कदापि न हो कि किसी गिरोह की दुश्मनी कि उन्होने तुम्हें प्रतिष्ठित मस्जिद (काबा) से रोका था, तुम्हें इस बात पर उभारे कि तुम उनके साथ अत्याचार व अन्याय करने लगो। भलार्इ और र्इशपरायणता के कामों में तुम सहयोग दो। लेकिन पाप और अत्याचारपूर्ण कामों में सहयोग न दो। परमेश्वर से डरते रहो, निस्सन्देह परमेश्वर (अवज्ञा पर) सजा देने में अत्यन्त कठोर है।’’ (कुरआन 5: 2)

कुुरआन मजीद मे सारे ही इन्सानों के साथ धर्म और समुदाय का भेद किए बिना न्याय करने, उनके साथ उपकार और सदभाव का व्यवहार करने, जमीन मे बिगाड़ और उपद्रव न फैलाने और सारे ही इन्सानों की जान और माल का आदर करने के इसी प्रकार के आदेश जगह-जगह दिए हैं।

कुरआन मजीद मे हमारे स्त्र“टा और प्रभु ने यह कल्याणकारी सिद्धान्त भी लोगो को दिया है:

‘‘जिसने किसी व्यक्ति की किसी के खून का बदला लेने या धरती मे उपद्रव और तबाही फैलाने के सिवा किसी और कारण से हत्या की मानो उसने सारे ही इन्सानों की हत्या कर डाली। और जिसने उसे जीवन प्रदान किया उसने सारे ही इन्सानों को जीवन प्रदान किया।’’

कुरआन ने सदा के लिए यह नियम बना दिया कि किसी भी इन्सान को चाहे उसका सम्बन्ध किसी भी या समुदाय से हो मृत्युदंड नही दिया जा सकता। हां! सिर्फ दो तरह के लोगो के साथ ऐसा किया जा सकता हैं:

एक हत्यारे को मृत्युदंड दिया जा सकता हैं। दूसरे उस व्यक्ति को मृत्युदंड दिया जा सकता हैं जो समाज या देश की शान्ति और सुरक्षा भंग करने पर तुला हो और उसने धरती मे तबाही मचा रखी हो।

कुरआन की इस आयत मे यह भी स्पष्ट रूप से बता दिया गया हैं कि किसी व्यक्ति की अकारण और अन्यापूर्ण हत्या एक व्यक्ति की हत्या नही, बल्कि वह सम्पूर्ण मानव-जाति की हत्या करने जैसी हैं। इसी प्रकार किसी व्यक्ति के प्राण बचाना सम्पूर्ण मानव-जाति के प्राणों की रक्षा करना है।

कितनी उच्च और कल्याणकारी हैं यह शिक्षा। इस पर तो पूरी मानवता को कुरआन मजीद का आभारी होना चाहिए।

गैर-मुस्लिम रिश्तेदारों से मेल-जोल और कुरआन

                        कुरआन मजीद की इस आयत पर भी कुछ लोग आपत्ति करते है, जिसमें कहा गया है :

‘‘र्इमानवालो! अपने बापो और भार्इयों को अपना संरक्षक मित्र न बनाओ, अगर वे र्इमान के मुकाबले मे कुफ्र को पसन्द करें।’’ (कुरआन, 9 : 23)

यह आपत्ति भी पृष्ठभूमि और सन्दर्भ का लिहाज न करने और बात को न समझने के कारण की गर्इ हैं। अगर सन्दर्भ पर तनिक भी विचार किया जाए तो यह बात आसानी से समझ मे आ सकती है कि यहां भी परिस्थितियां इस्लाम और उसके दुश्मनों के बीच सख्त संघर्ष की हैं। इस्लाम के दुश्मन मुसलमानों और इस्लाम को जड़-बुनियाद से उखाड़ देने को तत्पर है और गैर-मुस्लिम दुश्मन अपने मुसलमान रिश्तेदारों से मेलजोल करके इस्लाम के विरूद्ध साजिशो की स्कीमों बना रहे हैं। ऐसी गंभीर परिस्थितियों मे जबकि इस्लाम और मुसलमानों का अस्तित्व खतरे मे है, परमेश्वर ने मुसलमानों को चौकन्ना और सावधान करते हुए यह आदेश दिया हैं कि  वे अपने उन रिश्तेदारो तक को, जो इस्लाम की दुश्मनी पर तुले हुए हैं, अपना राजदार और संरक्षक न बनाएं और इस तरह दुश्मनों की साजिशों को असफल कर दें। ऐसी गंभीर और आपात परिस्थितियों मे कुरआन का यह निर्देश कितना सही और बुद्धिसंगत है इससे कोर्इ इनकार नही हर सकता । ऐसी परिस्थितियों मे इसी प्रकार आदेश और निर्देश पूरी दुनिया मे दिए जाते हैं और उनपर किसी को कभी कोर्इ आपत्ति नही होती। स्वंय हमारे देश मे अगर समाज और देश के किसी दुश्मन, किसी अपराधी और आतंकवादी को उसका कोर्इ दोस्त, नातेदार और रिश्तेदार संरक्षक और सहयोगी बनाता हैं या उसे शरण देता है तो उस शरण देनेवाले को भी अपराधी ठहराया जाता हैं और उसे अपराध मे मददगार समझा जाता हैं। कुरआन मजीद का यह आदेश बिलकुल इसी प्रकार का आदेश हैं। कुरआन परमेश्वर की ओर से सम्पूर्ण मानवजाति के लिए पूरे जीवन का संविधान हैं। शान्ति और सुरक्षा और सुख-चैन की ध्वजावाहक किसी व्यवस्था के लिए इस आदेश का कितना महत्व है इसे वे लोग अच्छी तरह समझ सकते हैं जिनके कंधों पर समाज और देश की सुरक्षा और शान्ति का दात्यित्व होता हैं।

कुरआन मजीद ने तो स्वयं इस तरह की गलतफहमी और आपत्ति को दूर करते हुए एलान कर दिया हैं कि :

‘‘परमेश्वर तुम्हें केवल उन लोगो से दोस्ती करने से रोकता हैं जिन्होने तुमसे धर्म के सम्बन्ध मे युद्ध किया और तुम्हें तुम्हारे घरो से निकाला और तुम्हारे निकाले जाने मदद की।’’(कुरआन 60 : 9)

कुरआन की इस हिदायत की मौजूदगी में क्या यह आपत्ति सही हो सकती है
कि वह गैर-मुस्लिम रिश्तेदारों से सम्बन्ध और मेलजोल रखने को मना करता हैं?

सामान्य परिस्थितियों मे गैर-मुस्लिम मां-बाप और अन्य गैर-मुस्लिम रिश्तेदारों के बारे मे कुरआन का आदेश क्या हैं? यह बात कुरआन मे सुनहरे शब्दों मे मौजूद हैं। परमेश्वर कहता हैं :

‘‘और हमने इन्सान को उसके मां-बाप में निर्देश दिया हैं- उसकी मां ने कष्ट पर कष्ट उठाकर उसे पेट में रखा और दो साल उसे दूध छूटने मे लगे-कि मेरे कृतज्ञ हो और अपने मां-बाप के भी। (और यह बात याद रखो कि तुम्हें मरने के बाद) मेरी तरफ ही लौटकर आना हैं। (अगर तुमने इस आदेश पर अमल किया तो तुम्हें इसका अच्छा बदला दिया जाएगा और अगर इसपर अमल न किया तो सजा मिलेगी।) लेकिन अगर वे (मां-बाप) तुझपर दबाव डाले कि तू किसी को मेरे साथ साझी ठहराए, जिसका तुझे ज्ञान तो (इस मामले मे) उनकी बात मत मानना, लेकिन दुनिया में उनके साथ सद्व्यवहार करते रहना और अनुसरण उस व्यक्ति के रास्ते का करना जो मेरी ओर उन्मुख हो। (इस बात को हमेशा याद रखना कि) तुम सबको मेरी ओर ही पलटना हैं, फिर मैं तुम्हें बता दूंगा जो कुछ तुम करते रहे होगे।’’(कुरआन, 31:14-15)

कुरआन की इस शिक्षा पर विचार करें और निर्णय करें कि क्या मां-बाप के सम्बन्ध मे इससे ज्यादा उचित बात कोर्इ दूसरी हो सकता है? कुरआन की इन आयतों में प्रत्येक मनुष्य को अपने मां-बाप के साथ सदव्यवहार और कृतज्ञता का रवैया अपनाने की शिक्षा दी गर्इ हैं। चाहे उसके मां-बाप मुस्लिम हो या गैर-मुस्लिम और कृतज्ञता के इस रवैये को अपनाने का जो कारण बताया गया हैं, वह कारण मुस्लिम और गैर-मुस्लिम दोनो मां-बाप के साथ समान हैं। हर मॉ अपनी औलाद को कष्ट और परेशानियां उठाकर पेट में रखती है, जन्म देती और पालती-पोसती हैं। इसलिए वह अपनी औलाद की ओर से कृतज्ञता और सद्व्यवहार की वैद्य अधिकारी हैं, वाहे मां मुस्लिम हो या गैर-मुस्लिम और इसी लिए कुरआन ने औलाद को उनके साथ सदव्यवहार करने का आदेश दिया हैं।

हां! कुरआन ने यह बात भी स्पष्ट कर दी हैं कि अगर तुम्हारे यही उपकारी मॉ-बाप तुम्हें गलत बातों की शिक्षा दें या गलत कामों पर उभारे तो इस मामले में उनकी बात नही माननी हैं। चाहे परमेश्वर के साथ किसी को साझी ठहराने की शिक्षा हो या अन्य गलत काम । अलबत्ता उनके साथ तुम्हारा व्यवहार प्रत्येक दशा में आदर और शिष्टाचार का होना चाहिए और तुम्हें सदैव उनके साथ सद्व्यवहार करते रहना चाहिए।
इतनी उचित और बुद्धिसंगत बात से इनकार कौन कर सकता हैं? दुनिया के हर समाज और हर देश मे इस शिक्षा को मान्यता प्राप्त है, इसलिए कि दुनिया के किसी कानून में भी मां-बाप की गलत बातों को मानने को वैधता प्रदान नही की गर्इ हैं।

कुरआन की इस बात पर आपत्ति करने वाले हमारे ये हिन्दू भार्इ अगर प्रहलाद जी की कथा पर विचार करते तो यह तथ्य उनपर और स्पष्ट हो जाता। प्रहलाद जी का पिता हिरण्कश्यप अपने को र्इश्वर कहलावा था और उसकी प्रजा मे सभी लोग उसे र्इश्वर समझते थे। लेकिन प्रहलाद जी ने अपने पिता की यह बात मानने से साफ इन्कार कर दिया। उनके पिता ने इस अवज्ञा और दुस्साहस पर प्रहलाद जी को तरह-तरह की यातनाएं दी। उस र्इशभक्त ने यातानाएं झेली, लेकिन अपने पिता को र्इश्वर मानते से इन्कार कर दिया। र्इश्वर होने का झूठा दावा करनेवालों उस पिता ने अपने पुत्र प्रहलाद को अन्तत: आग मे झोकने का आदेश दे दिया। प्रहलाद ने इस आदेश की तनिक भी परवाह नही की और अपने पिता की इस गलत बात को स्वीकार नही किया  िकवह उसे र्इश्वर समझे।
इसी घटना की याद मे हिन्दू भार्इ हर साल होली का त्यौहार मनाते है, अगर कुरआन ने यही शिक्षा मुसलमानों को दी हैं तो हिन्दू धर्म का दावा करने वाले ये लोग कुरआन पर आपत्ति करते है, कितने आश्चर्य की बात हैं।


कुरआन और धार्मिक स्वतंत्रता 
                    इसमें कोर्इ सन्देह नही कि कुरआन चाहता हैं कि एक र्इश्वर के सिवा किसी अन्य पूज्य-प्रभु न किया जाए। उसे ही स्त्र“टा, पालनहार, स्वामी परमप्रीतम, सर्वशक्तिमान, अन्तर्यामी, आजीविकादाता, आवश्यकताएं पूरी करने, वाला चिंतानाशक, सुखदाता, मृत्यु और जीवन का स्वामी और वास्तविक शासक, निर्बाध आज्ञा मानने योग्य और प्रलय के दिन इन्सानों का हिसाब-किताब लेनेवाला स्वीकार किया जाए। उसे निराकार माना जाए और उसका बुत न बताया जाए। लेकिन कुरआन अपनी इस सही और उचित बात को भी बलपूर्वक और जोर-जबरदस्ती से नही मनवाता बल्कि इसके लिए वह प्रमाण देता, सदुपदेश और सोच-विचार करने का आमंत्रण देता है। कुरआन की यह शिक्षा और आदेश कदापि नही हैं कि जो इन बातों को स्वीकार न करे उससे युद्ध किया जाए और उसे मौत के घाट उतार दिया जाए। यह एक बिलकुल ही झूठा आरोप हैं जो कुरआन और इस्लाम पर लगाया जाता है।
कुरआन मे तो जगह-जगह यह बात कही गर्इ हैं कि इस दुनिया मे इन्सान को सोच-विचार एवं कार्य की स्वतंत्रता देकर परीक्षा के लिए भेजा गया हैं और बलपूर्वक किसी विशेष धारणा का अपनाने पर विवश नही किया गया हैं। इस दुनिया (कर्म-क्षेत्र) में वह जो भी नीति अपनाएगा मृत्यु के बाद आनेवाले पारलौलिक जीवन में उसके अनुसार वह इनाम या सजा पाएगा। शक्ति या तलवार के द्वारा किसी को अपनी धारणा अपनाने पर विवश करने की शिक्षा और आदेश अगर कुरआन देता तो फिर इस दशा मे परीक्षा का वह उद्देश्य ही समाप्त हो जाता जिसका उल्लेख कुरआन मे बार-बार किया गया हैं।

कुरआन में परमेश्वर कहता हैं:

‘‘फिर (ऐ पैगम्बर) हमने तुम्हारी ओर यह ग्रन्थ अवतरित किया जो सत्य लेकर आया हैं और ‘मूल ग्रन्थ’ मे ंसे जो कुछ उसके आगे मौजूद हैं उसकी पुष्टि करनेवाला और उसका रक्षक और निगहबान हैं। अत: तुम र्इश्वर के भेजे हुए कानून के अनुसार लोगो के मामलों का फैसला करो और जो सत्य तुम्हारे पास आया हैं उससे विमुख होकर उनकी इच्छाओं का अनुसरण न करो। हमने तुम इन्सानों मे से हर एक के लिए एक ग्रन्थ पन्थ और एक कार्य-पद्धति निश्चित की। अगर परमेश्वर चाहता तो तुम सबको एक समुदाय भी बना सकता था, (लेकिन उसने ऐसा नही किया) ताकि उसने जो कुछ तुम लोगों को दिया हैं  उसमें तुम्हारी परीक्षा ले। अत: भलाइयों मे एक-दूसरे से आगे बढ़ जाने की कोशिश करो। अन्तत: तुम सबकों परमेश्वर की ओर पलटना है, फिर वह तुम्हें असल वास्तविकता बता देगा जिसमें तुम विभेद करते रहे हो।’’ (कुरआन : 48)

कुरआन मे एक जगह परमेश्वर ने अपने पैगम्बर से कहा :

‘‘(ऐ पैगम्बर!) ऐसा लगता हैं कि अगर इन लोगो ने इस शिक्षा को ग्रहण नही किया तो तुम इनके पीछे दुख के मारे अपने प्राण ही दे दोगे। सत्य यह हैं कि जो कुछ सुख-सामग्री भी जमीन पर हैं, उसको हमने जमीन का सौन्दर्य बनाया हैं ताकि लोगो की परीक्षा ले कि उनमें कौन उत्तम कर्म करनेवाला हैं।’’

कुरआन मे एक अन्य स्थान पर कहा गया :

‘‘ बड़ा ही महिमावान और उच्च हैं वह (परमात्मा) जिसके हाथ मे (जगत् का) शासन हैं और वह हर बात की सामथ्र्य रखता हैं। उसी ने मृत्यु और जीवन को बनाया ताकि तुुम लोगो की परीक्षा ले कि तुम मे कौन उत्तम कर्म करनेवाला हैं।’’ (कुरआन 67: 1-2) इसी विषय की बहुत-सी आयतें कुरआन मे मौजूद हैं, जिनसे इस तथ्य का इसी विषय की बहुत-सी आयतें कुरआन में मौजूद हैं, जिनसें इस तथ्य का पता चलता है कि इन्सान को इस दुनिया मे चिन्तन और कर्म स्वतंत्रता देकर उसकी परीक्षा ली जा रही हैं। इन शिक्षाओं के होते हुए यह निष्कर्ष कैसे निकाला जा सकता हैं कि किसी को तलवार या शक्ति के जोर से एक ही धारणा ग्रहण करने पर विश करने का आदेश कुरआन देता हैं।

जिन लोगों से युद्ध करने की बात कुरआन मे कही गर्इ हैं वह उनके गैर-मुस्लिम होने के कारण नही, बल्कि इस कारण कही गर्इ हैं। कि वे इस्लाम और उसके अनुयायियों पर घोर अत्याचार करते थें उन्हें खत्म करने के लिए साजिशे करते थे, मुसलमानो पर खुद बढ़-चढ़ कर हमले करते थे, और मुसलमानों को इस्लाम पर अमल करने से रोकते थे, जिसके कुछ विवरण उपर दिए जा चुके हैं।

धर्म ग्रहण करने के सम्बन्ध मे कुरआन इस मूल सिद्धान्त की घोषणा करता हैं:

‘‘धर्म के सम्बन्ध मे कोर्इ जबरदस्ती नही।’’             (कुरआन, 2 : 256)

कुरआन मे एक अन्य जगह है:

(ऐ पैगम्बर) अपने प्रभु की ओर से (लोगो के सामने) सत्य पेश कर दो। अब जो चाहे उसे माने और जो चाहे इन्कार करे।’’ (कुरआन, 18:29)

कुरआन मे एक अन्य जगह कहा गया :

‘‘(ऐ पैगम्बर) तुम्हारे प्रभु की ओर से जो मार्गदर्शन तुम्हें दिया गया हैं।

मुश्रिकों (बहुदेववादियों) से न उलझो-(याद रखो कि) अगर परमेश्वर चाहता तो वे शिर्क न कर सकते थे-और हमने तुम्हें इन (बहुदेववादियों) पर कोर्इ दारोगा नही बनाया हैं और न तुम उनपर कोर्इ वकील बनाए गए हों।’’ (कुरआन, 6 : 106-107)
कुरआन मे एक अन्य जगह कहा गया हैं :


‘‘तुम उनके उपास्यों को, जिन्हें वे परमेश्वर को छोड़कर पुकारते हैं, गालियों न दो ( न उनके लिए अपशब्द कहो)।’’ (कुरआन 6 : 108)

कुरआन उपदेश दीजिए और समझाइए-बुझाइए क्योकि आपके जिम्में केवल उपदेश देना हैं। आप उनपर दारोगा या हवलदार नही हैं (कि जोर-जबरदस्ती से अपनी बात मनवा लें)।’’         (कुरआन 88 : 21-22)

कुरआन में एक अन्य स्थान पर हैं :

‘‘हमने उसको (मनुष्य को) सत्यमार्ग दिखा दिया हैं। अब चाहे वह (उसपर चलकर) कृतज्ञ बने, चाहे (उसे छोड़कर) अकृतज्ञ।’’ (कुरआन 76 : 3)
कुरआन में हैं-

‘‘(ऐ पैगम्बर!) कह दो, ऐ कुफ्र और इन्कार करनेवालो! मैं उन चीजों की उपासना नही कर सकता जिनकी उपासना तुम करते हो और न तुम्ही उसकी उपासना के लिए तैयार हो जिसकी उपासना मैं करता हूं और न मैं उपासना करूंगा उनकी जिनकी तुम उपासना करते हो, और न तुम उपासना करनेवालों हो उसकी जिसकी मैं उपासना करता हॅू। तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म और मेरे लिए मेरा धर्म।’’ (कुरआन, 109 : 1-6)

कुरआन की यह सूरा उस समय की हैं जब र्इशदूत हजरत मुहम्मद (सल्ल0) लोगों को एक र्इश्वर की उपासना और बन्दगी की और बुला-बुलाकर थक गए थे और कुछ लोगो ने मानकर नही दिया और अब उनसे कोर्इ उम्मीद भी बाकी नही रही
कि वे एक र्इश्वर की उपासना के लिए तैयार होंगे। इन परिस्थितियों में र्इशदूत के मुख से एलान कराया गया और इन्कार करनेवालो से कह दिया गया कि अगर तुम अपनी नीति पर अडिग रहना चाहते हो तो उपर्युक्त कुरआनी शिक्षाएं मनुष्य की धार्मिक स्वतंत्रता का खुला एलान हैं। जो धर्म और जो किताब यह एलान खुद करती हो उसके बारे मे यह दुष्प्रचार करना कि उसकी यह शिक्षा हैं कि ‘‘ जो उस पर र्इमान न लाए उसे कत्ल कर दिया जाए,’’ कितना बड़ा अत्याचार व अन्याय हैं।
कुरआन और इस्लाम के बारे में इस तरह का गलत और भ्रामक प्रचार करनेवाली संस्थाओं और उनके हमख्याल जोगो के मन मे कभी यह विचार नही आता कि जब इस्लाम और कुरआन की सही शिक्षाएं और सही तस्वीर लोगो के सामने आएगी तो लोगो की उनके बारे में क्या राय बनेगी। सारी दुनिया तो उनके समान विचार बाली हैं नही कि लोग आंखे बन्द करके उनकी बातों को सत्य मान लेगे। यह युग ज्ञान-विज्ञान और शोध और खोजे का युग हैं और दुनिया में बहरहाल ऐसे लोगो की बड़ी संख्या मौजूद हैं जो जानकारी और शोध के बाद ही किसी के बारे मे कोर्इ राय बनाते हैं। ऐसे बहुत-से लोगो से हमारी मुलाकाते हुर्इ हैं और होती रहती हैं, जिन्होने इस तरह के दुष्प्रचार से प्रेरित होकर इस्लाम और कुरआन का उसके सही स्त्रोतों से अध्ययन किया और इस्लाम की तर्कसंगत, संतुलित और सत्य पर आधारित कल्याणकारी शिक्षाओं से प्रभावित हुए बिना न रह सके।


हिन्दू धर्म के ग्रन्थों मे एकेश्वरवाद और अनेकेश्वरवाद तथा मूर्तिपूजा से सम्बन्धित मूल्यवान शिक्षाएं और उनके अच्छे या बुरे परिणामों का विस्तार से उल्लेख मिलता हैं। हम सिर्फ वेदों से कुछ श्लोक यहां प्रस्तुत कर रहे हैं :

    हिन्दू समाज मे इन्सानों और इन्सानों के बीच बल्कि अपने सहधर्मियों के बीच उंच-नीच, छूतछात, अस्पृश्ता का जो व्यवहार है और उसकी जड़े सामाजिक तथा धार्मिक रूप से कितनी गहरी है इस पर हम इस समय कोर्इ टिप्पणी नही करना चाहते। आपत्तिकर्ता हमारे ये हिन्दू भार्इ हम से बेहतर इस तथ्य को जानते हैं।
    स पर्यागाच्छुक्रमकायम (यजुर्वेद 40 : 8)

‘‘ वह (ब्रहम्मा) शीध्रकारी, सर्वशक्तिमान, स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर से रहित और सब और से व्याप्त हैं।’’

ऋचो अक्षरे परमे व्योमन यस्मिन देवा अधि विश्वे निषेदु:।
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत् तद् विदुस्त इसे समासते।।(ऋ01/164/39)

‘‘परम आकाश के समान व्यापक और ऋचाओं के अक्षर के समान अविनाशी परमात्मा हैं, जिसमे सम्पूर्ण देवगण स्थित हैं। जो उस परम ब्रह्म को नही जानता, वह इन वेद-मंत्रो से क्या करेगा। जो उस परमतत्व को जानते हैं, वे ये विद्धान उत्तम स्थान मे बैठते हैं।’’

        र्इशा वास्यमिद सर्व यित्कं च जगत्यां जगत्।
        तेन त्यक्तेन भुज्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम्।।(यजुर्वेद 40 : 1)

‘‘ हे मनुष्य! ज्ो कुछ इस संसार मे जगत है उस सब मे व्याप्त होकर नियान्ता है वह र्इश्वर कहाता हैं। उससे डर कर तू अन्याय से किसी के धन की आकांक्षा मत कर। उस अन्याय के त्याग और न्यायाचरणरूप् धर्म से अपने आत्मा से आनंद को भोग।’’

इस श्लोक मे साफ तौर पर इन्सानों को एक र्इश्वर को मानने और उससे डर कर जीवन व्यतीत करते और अन्याय से बचने का आदेश दिया गया हैं और बताया गया हैं कि इसी निति पर चलकर सच्चा सुख प्राप्त हो सकता हैं।

            अहमिन्द्रो न परा जिग्य इद्धनं न तृत्यवे•व तस्थे कदा चन।
            सोममिन्मा सुवन्तों याचता वसु न मे पूरव: सख्ये रिषाथन।।
                                    (ऋ010/48/5)

‘‘ मैं परमैश्वयर्यवान सूर्य के सदृश जगत का प्रकाशक हूॅ। कभी पराजय को प्राप्त नही होता और न कभी मृत्यु को प्राप्त होता हॅू। मैं ही जगत  रूप् धन का निर्माता हूॅं। सब जगत की उत्पत्ति करनेवाले मुझ ही को जानों। हे जीवों! ऐश्वर्य प्राप्ति के यत्न करते हुए तुम लोग विज्ञानादि धन को मुझ से मांगो और तुम लोग मेरी मित्रता से अलग मत हो ओ।’’

अहं दां गृणते पूव्र्य वस्वह ब्रह्म कृणवं मह्यं वर्धनम् ।
अहं भुवं यजमानस्य चोदिता•यज्वन: साक्षि विश्वस्मिन भरे।
                                (ऋ010/49/1)

‘‘ हे मनुष्यों! मैं सत्य भाषणरूप स्तूति करनेवाले मनुष्य को सनातन
ज्ञानादि धन को देता हूॅ। मैं ब्रह्म अर्थात वेद का प्रकाश करनेहारा और मुझको वह वेद यथावत कहता उससे सबके ज्ञान को मै बढ़ाया, मैं सत्यपुरूष का प्रेरक यज्ञ करनेहारे को फलप्रदाता और इस विश्व मे जो कुछ हैं उस सब कायर्य का बनाने और धारण करनेवाला हूॅ। इस लिए तुम लोग मुझको छोड़ किसी को मेरे स्थान म ेमत पूजो, मत मानों और मत जानों।’’

        अन्धं तम: प्रविशन्ति ये•संभूतिमुपासते।
        ततो भूय इ वते तमो य उ सम्भूत्यां रता:।।(यजुर्वेद 40 : 9)

‘‘जो असंभूति अर्थात् अनुत्पन्न अनादि प्रकृति कारण की ब्रह्म के स्थान मे उपासना करते है वे अन्धकार अर्थात अज्ञान और दु:ख सागर में डूबते हैं। और संभूति जो कारण से उत्पन्न हुए कार्यरूप पृथ्वी आदि भूत, पाषाण और वृक्षादि अवयव और मनुष्यादि के शरीर की उपासना ब्रह्म के स्थान मे करते है वे उस अन्धकार से भी अधिक अन्धकार अर्थात महामूर्ख चिरकाल घोर दु:ख रूप नरक मे गिरके महाक्लेश भोगते हैं।’’

यहां भी हम देखते हैं कि एक परमेश्वर को छोड़कर किसी अन्य की उपासना करनेवाले को वेद मे नरक की यातना की सूचना दी गर्इ हैं।

न तस्य प्रतिमा अस्ति             (यजुर्वेद 32: 3)

‘‘उस परमेश्वर की प्रतिमा नही हैं।’’


यच्चक्षुषा न प्श्यति येन चक्षुरषि पश्यति।
तदेव ब्रहमत्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते।। (केनोपनिषद् 1 : 6)


‘‘जिसे चक्षु (आंख) के द्वारा नही देखा जा सकता, अपितु चक्षु (आंख)
जिसकी महिमा से देखने मे सक्षम होता हैं, उसे ही तुम ब्रहम्मा जानों।

चक्षु (आंख) के द्वारा द्रष्टव्य (दिखनेवाले) जिस तत्व की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नही है।

हम देखते हैं कि उपर्युक्त मे एक र्इश्वर ही का मानने की शिक्षा दी गर्इ हैं और अनेकेश्वरवाद और मूर्तिपूजा से स्पष्ट रूप से रोका गया हैं और इसपर यातना से भी डराया गया हैं। इस प्रकार की शिक्षाएं वेदों मे बहुतायत से मौजूद है।

हिन्दू समाज के एक बड़े सुधारक और विद्धान स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने भी अनेकेश्वरवाद और मूर्तिपूजा की भीषण  हानियों और अति भयानक परिणाम से लोगो को सावधान किया हैं। और इन कर्मो को समाज और स्वयं इन्सानो के लिए घातक बताया हैं।

वेदों और अन्य हिन्दू ग्रन्थों मे इन शिक्षाओं के होते हुए हिन्दु धार्मिक संस्थाओं और उनके सहयोगी अन्य लोगो ने कुरआन पर जो आक्षेप किए हैं उन्हे देखकर इन लोगो के दुस्साहस पर आश्चर्य भी होता हैं और दुख भी! इन आक्षेपकर्ताओ ने कितनी अन्याययुक्त रीति से काम लेकर कुरआन और इस्लाम से लोगो को दूर करने का घृणित प्रयास किया हैं।

Author Name: नसीम गाजी