कुरआन और धार्मिक स्वतंत्रता

इसमें कोर्इ सन्देह नही कि कुरआन चाहता हैं कि एक र्इश्वर के सिवा किसी अन्य पूज्य-प्रभु न किया जाए। उसे ही स्त्र“टा, पालनहार, स्वामी परमप्रीतम, सर्वशक्तिमान, अन्तर्यामी, आजीविकादाता, आवश्यकताएं पूरी करने, वाला चिंतानाशक, सुखदाता, मृत्यु और जीवन का स्वामी और वास्तविक शासक, निर्बाध आज्ञा मानने योग्य और प्रलय के दिन इन्सानों का हिसाब-किताब लेनेवाला स्वीकार किया जाए। उसे निराकार माना जाए और उसका बुत न बताया जाए। लेकिन कुरआन अपनी इस सही और उचित बात को भी बलपूर्वक और जोर-जबरदस्ती से नही मनवाता बल्कि इसके लिए वह प्रमाण देता, सदुपदेश और सोच-विचार करने का आमंत्रण देता है। कुरआन की यह शिक्षा और आदेश कदापि नही हैं कि जो इन बातों को स्वीकार न करे उससे युद्ध किया जाए और उसे मौत के घाट उतार दिया जाए। यह एक बिलकुल ही झूठा आरोप हैं जो कुरआन और इस्लाम पर लगाया जाता है।
कुरआन मे तो जगह-जगह यह बात कही गर्इ हैं कि इस दुनिया मे इन्सान को सोच-विचार एवं कार्य की स्वतंत्रता देकर परीक्षा के लिए भेजा गया हैं और बलपूर्वक किसी विशेष धारणा का अपनाने पर विवश नही किया गया हैं। इस दुनिया (कर्म-क्षेत्र) में वह जो भी नीति अपनाएगा मृत्यु के बाद आनेवाले पारलौलिक जीवन में उसके अनुसार वह इनाम या सजा पाएगा। शक्ति या तलवार के द्वारा किसी को अपनी धारणा अपनाने पर विवश करने की शिक्षा और आदेश अगर कुरआन देता तो फिर इस दशा मे परीक्षा का वह उद्देश्य ही समाप्त हो जाता जिसका उल्लेख कुरआन मे बार-बार किया गया हैं।

कुरआन में परमेश्वर कहता हैं:

‘‘फिर (ऐ पैगम्बर) हमने तुम्हारी ओर यह ग्रन्थ अवतरित किया जो सत्य लेकर आया हैं और ‘मूल ग्रन्थ’ मे से जो कुछ उसके आगे मौजूद हैं उसकी पुष्टि करनेवाला और उसका रक्षक और निगहबान हैं। अत: तुम र्इश्वर के भेजे हुए कानून के अनुसार लोगो के मामलों का फैसला करो और जो सत्य तुम्हारे पास आया हैं उससे विमुख होकर उनकी इच्छाओं का अनुसरण न करो। हमने तुम इन्सानों मे से हर एक के लिए एक ग्रन्थ पन्थ और एक कार्य-पद्धति निश्चित की। अगर परमेश्वर चाहता तो तुम सबको एक समुदाय भी बना सकता था, (लेकिन उसने ऐसा नही किया) ताकि उसने जो कुछ तुम लोगों को दिया हैं  उसमें तुम्हारी परीक्षा ले। अत: भलाइयों मे एक-दूसरे से आगे बढ़ जाने की कोशिश करो। अन्तत: तुम सबकों परमेश्वर की ओर पलटना है, फिर वह तुम्हें असल वास्तविकता बता देगा जिसमें तुम विभेद करते रहे हो।’’ (कुरआन : 48)

कुरआन मे एक जगह परमेश्वर ने अपने पैगम्बर से कहा :

‘‘(ऐ पैगम्बर!) ऐसा लगता हैं कि अगर इन लोगो ने इस शिक्षा को ग्रहण नही किया तो तुम इनके पीछे दुख के मारे अपने प्राण ही दे दोगे। सत्य यह हैं कि जो कुछ सुख-सामग्री भी जमीन पर हैं, उसको हमने जमीन का सौन्दर्य बनाया हैं ताकि लोगो की परीक्षा ले कि उनमें कौन उत्तम कर्म करनेवाला हैं।’’

कुरआन मे एक अन्य स्थान पर कहा गया :

‘‘ बड़ा ही महिमावान और उच्च हैं वह (परमात्मा) जिसके हाथ मे (जगत् का) शासन हैं और वह हर बात की सामथ्र्य रखता हैं। उसी ने मृत्यु और जीवन को बनाया ताकि तुम लोगो की परीक्षा ले कि तुम मे कौन उत्तम कर्म करनेवाला हैं।’’ (कुरआन 67: 1-2) इसी विषय की बहुत-सी आयतें कुरआन मे मौजूद हैं, जिनसे इस तथ्य का इसी विषय की बहुत-सी आयतें कुरआन में मौजूद हैं, जिनसें इस तथ्य का पता चलता है कि इन्सान को इस दुनिया मे चिन्तन और कर्म स्वतंत्रता देकर उसकी परीक्षा ली जा रही हैं। इन शिक्षाओं के होते हुए यह निष्कर्ष कैसे निकाला जा सकता हैं कि किसी को तलवार या शक्ति के जोर से एक ही धारणा ग्रहण करने पर विश करने का आदेश कुरआन देता हैं।

जिन लोगों से युद्ध करने की बात कुरआन मे कही गर्इ हैं वह उनके गैर-मुस्लिम होने के कारण नही, बल्कि इस कारण कही गर्इ हैं। कि वे इस्लाम और उसके अनुयायियों पर घोर अत्याचार करते थें उन्हें खत्म करने के लिए साजिशे करते थे, मुसलमानो पर खुद बढ़-चढ़ कर हमले करते थे, और मुसलमानों को इस्लाम पर अमल करने से रोकते थे, जिसके कुछ विवरण उपर दिए जा चुके हैं।

धर्म ग्रहण करने के सम्बन्ध मे कुरआन इस मूल सिद्धान्त की घोषणा करता हैं:

‘‘धर्म के सम्बन्ध मे कोर्इ जबरदस्ती नही।’’             (कुरआन, 2 : 256)

कुरआन मे एक अन्य जगह है:

(ऐ पैगम्बर) अपने प्रभु की ओर से (लोगो के सामने) सत्य पेश कर दो। अब जो चाहे उसे माने और जो चाहे इन्कार करे।’’ (कुरआन, 18:29)

कुरआन मे एक अन्य जगह कहा गया :

‘‘(ऐ पैगम्बर) तुम्हारे प्रभु की ओर से जो मार्गदर्शन तुम्हें दिया गया हैं।

मुश्रिकों (बहुदेववादियों) से न उलझो-(याद रखो कि) अगर परमेश्वर चाहता तो वे शिर्क न कर सकते थे-और हमने तुम्हें इन (बहुदेववादियों) पर कोर्इ दारोगा नही बनाया हैं और न तुम उनपर कोर्इ वकील बनाए गए हों।’’ (कुरआन, 6 : 106-107)
कुरआन मे एक अन्य जगह कहा गया हैं :


‘‘तुम उनके उपास्यों को, जिन्हें वे परमेश्वर को छोड़कर पुकारते हैं, गालियों न दो ( न उनके लिए अपशब्द कहो)।’’ (कुरआन 6 : 108)

कुरआन उपदेश दीजिए और समझाइए-बुझाइए क्योकि आपके जिम्में केवल उपदेश देना हैं। आप उनपर दारोगा या हवलदार नही हैं (कि जोर-जबरदस्ती से अपनी बात मनवा लें)।’’         (कुरआन 88 : 21-22)

कुरआन में एक अन्य स्थान पर हैं :

‘‘हमने उसको (मनुष्य को) सत्यमार्ग दिखा दिया हैं। अब चाहे वह (उसपर चलकर) कृतज्ञ बने, चाहे (उसे छोड़कर) अकृतज्ञ।’’ (कुरआन 76 : 3)
कुरआन में हैं-

‘‘(ऐ पैगम्बर!) कह दो, ऐ कुफ्र और इन्कार करनेवालो! मैं उन चीजों की उपासना नही कर सकता जिनकी उपासना तुम करते हो और न तुम्ही उसकी उपासना के लिए तैयार हो जिसकी उपासना मैं करता हूं और न मैं उपासना करूंगा उनकी जिनकी तुम उपासना करते हो, और न तुम उपासना करनेवालों हो उसकी जिसकी मैं उपासना करता हॅू। तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म और मेरे लिए मेरा धर्म।’’ (कुरआन, 109 : 1-6)

कुरआन की यह सूरा उस समय की हैं जब र्इशदूत हजरत मुहम्मद (सल्ल0) लोगों को एक र्इश्वर की उपासना और बन्दगी की और बुला-बुलाकर थक गए थे और कुछ लोगो ने मानकर नही दिया और अब उनसे कोर्इ उम्मीद भी बाकी नही रही
कि वे एक र्इश्वर की उपासना के लिए तैयार होंगे। इन परिस्थितियों में र्इशदूत के मुख से एलान कराया गया और इन्कार करनेवालो से कह दिया गया कि अगर तुम अपनी नीति पर अडिग रहना चाहते हो तो उपर्युक्त कुरआनी शिक्षाएं मनुष्य की धार्मिक स्वतंत्रता का खुला एलान हैं। जो धर्म और जो किताब यह एलान खुद करती हो उसके बारे मे यह दुष्प्रचार करना कि उसकी यह शिक्षा हैं कि ‘‘ जो उस पर र्इमान न लाए उसे कत्ल कर दिया जाए,’’ कितना बड़ा अत्याचार व अन्याय हैं।
कुरआन और इस्लाम के बारे में इस तरह का गलत और भ्रामक प्रचार करनेवाली संस्थाओं और उनके हमख्याल जोगो के मन मे कभी यह विचार नही आता कि जब इस्लाम और कुरआन की सही शिक्षाएं और सही तस्वीर लोगो के सामने आएगी तो लोगो की उनके बारे में क्या राय बनेगी। सारी दुनिया तो उनके समान विचार बाली हैं नही कि लोग आंखे बन्द करके उनकी बातों को सत्य मान लेगे। यह युग ज्ञान-विज्ञान और शोध और खोजे का युग हैं और दुनिया में बहरहाल ऐसे लोगो की बड़ी संख्या मौजूद हैं जो जानकारी और शोध के बाद ही किसी के बारे मे कोर्इ राय बनाते हैं। ऐसे बहुत-से लोगो से हमारी मुलाकाते हुर्इ हैं और होती रहती हैं, जिन्होने इस तरह के दुष्प्रचार से प्रेरित होकर इस्लाम और कुरआन का उसके सही स्त्रोतों से अध्ययन किया और इस्लाम की तर्कसंगत, संतुलित और सत्य पर आधारित कल्याणकारी शिक्षाओं से प्रभावित हुए बिना न रह सके।


हिन्दू धर्म के ग्रन्थों मे एकेश्वरवाद और अनेकेश्वरवाद तथा मूर्तिपूजा से सम्बन्धित मूल्यवान शिक्षाएं और उनके अच्छे या बुरे परिणामों का विस्तार से उल्लेख मिलता हैं। हम सिर्फ वेदों से कुछ श्लोक यहां प्रस्तुत कर रहे हैं :

    हिन्दू समाज मे इन्सानों और इन्सानों के बीच बल्कि अपने सहधर्मियों के बीच उंच-नीच, छूतछात, अस्पृश्ता का जो व्यवहार है और उसकी जड़े सामाजिक तथा धार्मिक रूप से कितनी गहरी है इस पर हम इस समय कोर्इ टिप्पणी नही करना चाहते। आपत्तिकर्ता हमारे ये हिन्दू भार्इ हम से बेहतर इस तथ्य को जानते हैं।
    स पर्यागाच्छुक्रमकायम (यजुर्वेद 40 : 8)

‘‘ वह (ब्रहम्मा) शीध्रकारी, सर्वशक्तिमान, स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर से रहित और सब और से व्याप्त हैं।’’

ऋचो अक्षरे परमे व्योमन यस्मिन देवा अधि विश्वे निषेदु:।
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत् तद् विदुस्त इसे समासते।।(ऋ01/164/39)

‘‘परम आकाश के समान व्यापक और ऋचाओं के अक्षर के समान अविनाशी परमात्मा हैं, जिसमे सम्पूर्ण देवगण स्थित हैं। जो उस परम ब्रह्म को नही जानता, वह इन वेद-मंत्रो से क्या करेगा। जो उस परमतत्व को जानते हैं, वे ये विद्धान उत्तम स्थान मे बैठते हैं।’’

        र्इशा वास्यमिद सर्व यित्कं च जगत्यां जगत्।
        तेन त्यक्तेन भुज्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम्।।(यजुर्वेद 40 : 1)

‘‘ हे मनुष्य! ज्ो कुछ इस संसार मे जगत है उस सब मे व्याप्त होकर नियान्ता है वह र्इश्वर कहाता हैं। उससे डर कर तू अन्याय से किसी के धन की आकांक्षा मत कर। उस अन्याय के त्याग और न्यायाचरणरूप् धर्म से अपने आत्मा से आनंद को भोग।’’

इस श्लोक मे साफ तौर पर इन्सानों को एक र्इश्वर को मानने और उससे डर कर जीवन व्यतीत करते और अन्याय से बचने का आदेश दिया गया हैं और बताया गया हैं कि इसी निति पर चलकर सच्चा सुख प्राप्त हो सकता हैं।

            अहमिन्द्रो न परा जिग्य इद्धनं न तृत्यवे•व तस्थे कदा चन।
            सोममिन्मा सुवन्तों याचता वसु न मे पूरव: सख्ये रिषाथन।।
                                    (ऋ010/48/5)

‘‘ मैं परमैश्वयर्यवान सूर्य के सदृश जगत का प्रकाशक हूॅ। कभी पराजय को प्राप्त नही होता और न कभी मृत्यु को प्राप्त होता हॅू। मैं ही जगत  रूप् धन का निर्माता हूॅं। सब जगत की उत्पत्ति करनेवाले मुझ ही को जानों। हे जीवों! ऐश्वर्य प्राप्ति के यत्न करते हुए तुम लोग विज्ञानादि धन को मुझ से मांगो और तुम लोग मेरी मित्रता से अलग मत हो ओ।’’

अहं दां गृणते पूव्र्य वस्वह ब्रह्म कृणवं मह्यं वर्धनम् ।
अहं भुवं यजमानस्य चोदिता•यज्वन: साक्षि विश्वस्मिन भरे।
                                (ऋ010/49/1)

‘‘ हे मनुष्यों! मैं सत्य भाषणरूप स्तूति करनेवाले मनुष्य को सनातन
ज्ञानादि धन को देता हूॅ। मैं ब्रह्म अर्थात वेद का प्रकाश करनेहारा और मुझको वह वेद यथावत कहता उससे सबके ज्ञान को मै बढ़ाया, मैं सत्यपुरूष का प्रेरक यज्ञ करनेहारे को फलप्रदाता और इस विश्व मे जो कुछ हैं उस सब कायर्य का बनाने और धारण करनेवाला हूॅ। इस लिए तुम लोग मुझको छोड़ किसी को मेरे स्थान म ेमत पूजो, मत मानों और मत जानों।’’

        अन्धं तम: प्रविशन्ति ये•संभूतिमुपासते।
        ततो भूय इ वते तमो य उ सम्भूत्यां रता:।।(यजुर्वेद 40 : 9)

‘‘जो असंभूति अर्थात् अनुत्पन्न अनादि प्रकृति कारण की ब्रह्म के स्थान मे उपासना करते है वे अन्धकार अर्थात अज्ञान और दु:ख सागर में डूबते हैं। और संभूति जो कारण से उत्पन्न हुए कार्यरूप पृथ्वी आदि भूत, पाषाण और वृक्षादि अवयव और मनुष्यादि के शरीर की उपासना ब्रह्म के स्थान मे करते है वे उस अन्धकार से भी अधिक अन्धकार अर्थात महामूर्ख चिरकाल घोर दु:ख रूप नरक मे गिरके महाक्लेश भोगते हैं।’’

यहां भी हम देखते हैं कि एक परमेश्वर को छोड़कर किसी अन्य की उपासना करनेवाले को वेद मे नरक की यातना की सूचना दी गर्इ हैं।

न तस्य प्रतिमा अस्ति             (यजुर्वेद 32: 3)

‘‘उस परमेश्वर की प्रतिमा नही हैं।’’


यच्चक्षुषा न प्श्यति येन चक्षुरषि पश्यति।
तदेव ब्रहमत्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते।। (केनोपनिषद् 1 : 6)


‘‘जिसे चक्षु (आंख) के द्वारा नही देखा जा सकता, अपितु चक्षु (आंख)
जिसकी महिमा से देखने मे सक्षम होता हैं, उसे ही तुम ब्रहम्मा जानों।

चक्षु (आंख) के द्वारा द्रष्टव्य (दिखनेवाले) जिस तत्व की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नही है।

हम देखते हैं कि उपर्युक्त मे एक र्इश्वर ही का मानने की शिक्षा दी गर्इ हैं और अनेकेश्वरवाद और मूर्तिपूजा से स्पष्ट रूप से रोका गया हैं और इसपर यातना से भी डराया गया हैं। इस प्रकार की शिक्षाएं वेदों मे बहुतायत से मौजूद है।

हिन्दू समाज के एक बड़े सुधारक और विद्धान स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने भी अनेकेश्वरवाद और मूर्तिपूजा की भीषण  हानियों और अति भयानक परिणाम से लोगो को सावधान किया हैं। और इन कर्मो को समाज और स्वयं इन्सानो के लिए घातक बताया हैं।

वेदों और अन्य हिन्दू ग्रन्थों मे इन शिक्षाओं के होते हुए हिन्दु धार्मिक संस्थाओं और उनके सहयोगी अन्य लोगो ने कुरआन पर जो आक्षेप किए हैं उन्हे देखकर इन लोगो के दुस्साहस पर आश्चर्य भी होता हैं और दुख भी! इन आक्षेपकर्ताओ ने कितनी अन्याययुक्त रीति से काम लेकर कुरआन और इस्लाम से लोगो को दूर करने का घृणित प्रयास किया हैं।

Author Name: नसीम गाजी