सभी के साथ सद्व्यवहार की शिक्षा

‘‘ और र्इश्वर ही की उपासना करो और किसी चीज को उसका समकक्ष न ठहराओ। और माता-पिता के साथ, संबंधियो के साथ, अनाथों के साथ, निर्धनों के साथ, निकटवर्ती पड़ोसी के साथ तथा अजनबी (दूरवर्ती) पड़ोसी साथ, और पास के सहचरों के साथ, यात्री के साथ और उनके साथ जो तुम्हारे अधीन हो, सबके साथ भलार्इ का व्यवहार करो।’’ (कुरआन, 4 : 36)

10-     मुसलमानों विशेषताएं
कुरआन मजीद मे अनेक स्थानों पर ऐसे गुणों को उल्लेख किया गया हैं जिनका मुसलमानों में होना आवश्यक है। हम नीचे उन गुणों का सार दे रहे हैं-
(i) उन र्इमानवालों ने सफलता पार्इ जो अपनी नमाज में (र्इश्वर के सम्मुख) गिड़गिड़ानेवाले हैं और जो व्यर्थ बातों से बचनेवाले और जो जकात (अनिवार्य दान) अदा करनेवाले हैं और अपनी गुप्त इंद्रियों की (व्यभिचार से) रक्षा करनेवाले हैं।’’   (कुरआन, 23 : 1-5)
(ii) और जो अपनी धरोहरों और अपने वचनो का पालन करनेवाले हैं। ( अर्थात न धरोहर मे कपट करते है और न वचन भंग करते हैं)।’’ (कुरआन, 23 : 8)
 (iii) ‘‘ और जिनके धन में हिस्सा नियत हैं मांगनेवाले का और न मांगनेवाले का (अत: वह अपनी कमार्इ का एक अंश निर्धन मांगनेवालों को भी देते हैं और उनको भी जो शर्म और झिझक से अपना मुंह नही खोलते)।’’ (कुरआन 70 : 24-25)
(iv) महाकृपालु र्इश्वर के सच्चे भक्त वे हैं जो धरती पर नम्रतापूर्वक चलते हैं और जब मूढ़ लोग उनसे  (अशिष्टतापूर्ण) बाते करते हैं तो वे  (उनसे उलझते नही बल्कि) कहते हैं, ‘तुमकों सलाम’ (और आगे बढ़ जाते हैं)।’’ (कुरआन, 25 : 63)
 (v)    ‘‘ और जब वे खर्च करते हैं तो न धन का दुरूपयोग करते हैं और न कंजूसी करते हैं, वे इन दोनो के बीच मध्यम मार्ग पर रहते हैं।’’  (कुरआन, 25 : 67)
(vi) ‘‘ वे किसी जीव का वध नही करते, यह और बात हैं कि न्याय का तकाजा यही हो।’’   (कुरआन, 25 : 68)
(vii) ‘‘ वह व्यभिचार नही करते।’’ (कुरआन, 25 : 68)
(viii) ‘‘ किसी अनुचित काम के पास नही जाते । (कुरआन, 25 : 72)
(ix)    ‘‘ और जब (संयोगवश) किसी अनर्गल काम के पास से गुजरते हैं तो भले लोगो की भांति गुजर जाते हैं। (उसमे दिल नही लगाते)।’’ (कुरआन, 25 : 72)
विचार कीजिए! इनसानियत के विषय मे कुरआन मजीद की शिक्षा कितने उंचे दर्जे की हैं जिसके अनुसार हर वर्ग और हैसियत का इन्सान सरलता पूर्वक व्यवहार कर सकता। हैं। यदि कोर्इ देश इन सिद्धान्तों के अनुसार अपना आचरणबना ले तो कैसी उच्चकोटि की मानवता पैदा हो सकते हैं। काश! हमारा देश इनके अनुसार व्यवहार करता।

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) की शिक्षा
1-    इनसानियत के लिए मोतियों की माला र्इश्वर के पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया कि मेरे पालनहार मुझको नौ बातों का आदेश दिया हैं-

(i) प्रकट और अप्रकट (दोनो हालतों में) र्इश्वर से डरते रहने का।
(ii) क्रोध की अवस्था हो या प्रसन्नता की, (सदा) न्यायसंगत बात कहने का।
(iii) गरीबी हो या अमीरी  (प्रत्येक अवस्था में) संतुलित आचरण करने का।
(iv) और यह कि जो व्यक्ति मुझसे नाता तोड़े मै उससे नाता जोड़ूं।
(v) और यह कि मैं उसे भी (आवश्यकता की चीज) दूं जो मुझसे अपना हाथ रोक ले।
(vi) और यह कि जो व्यक्ति मुझपर अत्याचार करे मैं उसे क्षमा कर दूं।
(vii) और यह कि मेरा मौन चिन्तन का मौन हो तथा मेरी चर्चा र्इश्वर की चर्चा हो।
(viii) और यह कि मेरी दृष्टि उपदेश प्राप्त करनेवालों दृष्टि हो।
(ix) और यह कि मैं भलार्इ का आदेश दूं और बुरार्इ से रोकू।
यह कितनी व्यापक उच्चकोटि की शिक्षा हैं। पैगम्बर समस्त मनुष्यों के लिए मापदण्ड तथा आदर्श होते हैं और पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) कहते हैं कि यह उपरोक्त शिक्षा उनको र्इश्वर ने दी हैं, जिसका आचरण करने पर र्इश्वर स्वर्ग प्रदान करेगा और इस शिक्षा की अवहेलना करने पर नरक की दुखदायनी यातना देगा। इस दृष्टि से इस शिक्षा का महत्व और बढ़ जाता हैं।

2-    सुशीलता की शिक्षा
हदीस के प्रसिद्ध विद्धान हजरत अब्दुल्लाह-बिन-मुबारक कहते हैं कि सुशीलता यह हैं कि आदमी, आदमी के प्रति प्रसन्नचित तथा सद्भाव के साथ व्यवहार करे, और अपने हाथ और जबान से किसी को कष्ट न पहुचाए। हदीसों में सश्ुाीलता पर बहुत जोर दिया गया हैं।

एक व्यक्ति ने पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) से पूछा कि सबसे उत्तम कौन-सा काम हैं? आपने उत्तर दिया-सुशीलता। उस व्यक्ति ने बाएं ओर जाकर यही प्रश्न किया, हूजूर (सल्ल0) ने फिर वही उत्तर दिया। उसने पीछे जाकर यही बात पूछी। हूजूर (सल्ल0) ने फरमाया- ‘‘ तुझे क्या हुआ हैं जो इतनी बात भी नही समझता। सुशीलता यह हैं कि क्रोध न किया कर।’’
पैगम्बरे हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘ प्रलय के दिन (जब भले और बुरे कर्म तौले जाएंगी तो) सुशीलता से अधिक वजनी कोर्इ वस्तु तराजू पर न होगी। सुशील व्यक्ति अपनी सुशीलता के द्वारा (दिन को) रोजा (व्रत) रखनेवाले तथा (रात भर) नमाज पढ़ने वाले के पद को पहुंच जाता हैं।’’ (तिरमिजी)

पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया-

‘‘जहां भी रहो र्इश्वर से डरते रहो (अगर कोर्इ बुरार्इ हो जाए तो) बुरार्इ के बाद कोर्इ भलार्इ कर लिया करो। वह उस बुरार्इ को मिटा देगी और लोगो के साथ सुशीलता से पेश आया करो।’’     (अहमद, तिरमिजी)

Author Name: कुरआन मानवता का राजमार्ग:अबू-मुहम्मद इमामुद्दीन रामनगरी व मुहम्मद जै