इस्लाम का अभ्युदय क्यों हुआ?

यह एक अटल प्राकृतिक नियम हैं कि जब पाप की अधिकता हो जाती हैं, अत्याचार और हिंसा करनेवालो की संख्या बढ़ जाती हैं: नेक और पवित्र मनुष्य सताए जाने लगते हैं, खुदा के बन्दे पुण्य के रास्ते से हटकर पाप के रास्ते पर चलने लगते हैं, अत्याचार और क्रूरता को धर्म बना लेते हैं, अपनी जिन्दगी के मकसद को भूलकर अपनी आत्माओं को अपवित्र और कलुषित कर लेते हैं, उस समय अत्याचार-पीड़ित और दुखी लोगो की सहायता करनेवाला और जोर-जबरदस्ती और हिंसा को खत्म करनेवाला सबका मालिक अपनी दया और अपनी कृपा से ऐसे पवित्र और महान व्यक्तियों को संसार के विभिन्न भागो मे वहॉ की अवस्था के अनुसार, इस उददेश्य से भेजा करता हैं कि सत्य-मार्ग से भटके हुए इंसानों को फिर उनका सही रास्ता दिखाया जाए और उनको पाप से बचाकर पुण्य की ओर आकर्षित किया जाए। हिन्दुओ की पवित्र पुस्तक श्रीमद्भगवतगीता में यह बात स्पष्ट रूप से लिखी गर्इ हैं।
इसी प्राकृतिक नियम के अनुसार अरब देश् में र्इश्वर ने हजरत मुहम्मद (सल्ल0) को अपने बन्दो के पथ-प्रदर्शन के लिए कुरैश खानदान में भेजा। काबा की कुंजिया इसी परिवार के पास रहती थी। यह भी एक सर्वमान्य सत्य है कि जब ऐसे महान व्यक्तियों का अवतरण होता हैं तो बड़े शुभ चिन्ह प्रकट होते हैं। इतिहास बताता है कि हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) के जन्म से पहले अरब मे बड़ा भारी अकाल पड़ा हुआ था, महामारी फैली हुर्इ थी, लेकिन महान रसूल (सल्ल0) के जन्म ग्रहण करते ही पानी बरसा, जिससे महामारी दूर हो गर्इ और अकाल का भी निवारण हो गया और ऐसे विभिन्न चिन्ह प्रकट हुए जो हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) के प्रमुख र्इश्वर-भक्त या र्इश्वर-दूत होने के प्रमाण प्रस्तुत करते थे, जिनके विस्तार की यहां जरूरत नहीं।

सवाल यह हो सकता हैं कि अरब जैसे बंजर और मरूभूमि मे इस पवित्र आत्मा का अवतरण क्यो हुआ? इसके बारे मे उस समय देश की जो दशा थी, उसका वर्णन कर देना काफी होगा-


(1) वहां के लोग उस समय अशिक्षित, असभ्य, अक्खड़, बर्बर, हठी, अड़ियल, झगड़ालू और भ्रांतियों के जाल में फंसे हुए थे। शिक्षा की इतनी कमी थी कि हजरत पैग़म्बर साहब के विकास के समय केवल सत्रह आदमी शिक्षित थे। इस संख्या से प्रकट होता है कि शिक्षा नही के बराबर थी।

(2)मदिरापान, जुआ, व्यभिचार का बाजार गर्म था। लोग अपनी दासियों से व्यभिचार करा के धन कमाया करते थे, और अपनी बहनों तक से विवाह कर लेते थे।

(3)पिता की पत्नी पर उत्तरधिकारी के रूप में पुत्र अधिकार कर लेता था।

(4) पत्नी-त्याग का बहुत अधिक रिवाज था। पति जब चाहता था पत्नी को छोड़ सकता था। कोर्इ नियम या सिद्धान्त न था। बहु-विवाह की कोर्इ सीमा न थी।

(5) लोग जात-पात पर बहुत गर्व करते थे। धन-दौलत और परिवार का घमंड करते थे। इसी कारण दास-प्रथा प्रचलित थी।

(6) एक स्त्री से कर्इ-कर्इ पुरूष सम्बन्ध रखते थे और बच्चा होने की अवस्था में वह स्त्री निर्णय कर देती थी कि बच्चा किसका हैं।

(7)कुसंस्कारों की भरमार थी। हर काम मे शगुन लिया जाता था।  मूर्तियों पर मनुष्य की बलि चढ़ार्इ जाती थी। समाधि के पास उंट बांधकर उसको भूखा-प्यासा मारना पुण्य का काम समझा जाता। लड़कियों को जीवित गाड़ दिया जाता था।

(8)यदि अकाल पड़ता तो गाय की पूंछ में घास बांधकर आग लगा दी जाती थी, इस विश्वास से कि यह आकाश से वर्षा खींच लेगी।

(9) बदले की भावना बहुत तेज थी। मामूली-मामूली बातों पर खून-खराबा हो जाता था। किसी इंसान की हत्या के बाद उसके नाक-कान भी काट लिए जाते थे। इस रिवाज को ‘मुसला’ कहा जाता था।

(10) युद्ध मे जो स्त्रियां और बालक बन्दी होकर आते थे, उनको भी मार डाला जाता था, गर्भवती औरत का गर्भपात करा दिया जाता था। छोटे-छोटे बच्चो को भालों पर लटकाया जाता था। सोते हुए आदमियों पर आक्रमण किया जाता था। मनुष्यों का सिर, कान आदि काट कर उनका हार बनाकर पहना जाता था।

लोगो का साधारण धर्म मूर्ति-पूजा था। दूसरे धर्मो के लोग आटे मे नमक के बराबर थे। हर परिवार का अलग-अलग देवता था। यह थी वहां के लोगो की दशा! अर्थात् वह मानवता से बहुत दूर जा पड़े थे। शिष्टता लेशमात्र को न थी। नैतिकता का दिवाला निकल चुका था। र्इमान-धर्म नाम मात्र को भी न थी, सहानुभूति और शुभकामना से उनके हृदय खाली हो चुके थे। वे अज्ञानता और बर्बरता में डूबे हुए थें। उनके हृदय द्वेष, शत्रुता, दुष्टता और पाप से भरे हुए थे। दूसरे को हानि पहुचाते हुए न उनको र्इश्वर का भय था और न मानवता के कर्तव्य का ध्यान। दूसरों को दुख देते हुए भी उनके हृदय में दया उत्पन्न न होती थी। वे कहने को मनुष्य थे, परन्तु उनका स्वभाव पशुओं का-सा था। वे देखने में मनुष्य थे और कर्म में पिशाच। वे हिंसक थे जो अपने सजाति मनुष्यों को भी क्षण भर में चीर-फाड़ डालते थे। अति तुच्छ बातों पर दूसरों के प्राण ले लेना खेल समझते थे। दूसरो की बहू-बेटियों के सतीत्व को नष्ट करना और उनसें बर्बरतापूर्ण व्यवहार करना उनके बाये हाथ का खेल था। दूसरों की मान-मर्यादा को नष्ट करने में उनको बड़ा आनन्द मिलता था। दूसरो के जान और माल की क्षति मे वे बड़ी खुशी महसूस करते थें दूसरों पर अत्याचार और ज्यादतीकरने में उनको बहुत खुशी महसूस होती थी। अबोध बालकों को पिताहीन और भली स्त्रियों को विधवा बना देना उनकी नीति थी। मासूम और असहाय लोगो पर आक्रमण करना उनका स्वभाव था। दूसरो के माल को लूट लेना वे अपना धर्म समझते थे। दूसरों के धन और सामग्री को किसी भी अनुचित उपाय से प्राप्त कर लेना पुण्य कार्य समझते थें। वे धर्म और शास्त्र का अर्थ भूल चूके थे। उन्हे ज्ञान तक न था कि मनुष्य होने के नाते दूसरे मनुष्यों के प्रति उनके क्या कर्तव्य हैं। उन्हे पता न था कि शिष्टता, मानवता और सभ्यता किस वस्तु का नाम हैं। उन्ही ज्ञान तक न था कि नेक काम, नैतिकता और सदाचार किसको कहते हैं और मनुष्यता किस चीज का नाम हैं।

यह थी उस समय के अरबवालों की दशा । र्इश्वर ऐसी दशा को पसन्द नही करता । उसे मनुष्यों की इतनी पथभ्रष्टता नही भाती। उन दुराचारी और शैतानी गुण रखनेवाले मनुष्यों के पथ-प्रदर्शन और शिक्षा के लिए अल्लाह ने अपनी दया से उन्ही के बीच एक पवित्र आत्मा को प्रकट किया और फरिश्ते हजरत जिबरील द्वारा लोगो के कुकर्मो और कुरीतियों पर अप्रसन्नता प्रकट की। महान पुण्य आत्मा हजरत मुहम्मद (सल्ल0) के पवित्र जीवन को उनके लिए आदर्श बनाया, जिसका फल यह हुआ कि वे पशुता और पैशाचिकता को छोड़कर मनुष्य बन गए। यह था उस ‘अहमद’ और हामिद को भेजने का उददेश्य, यह था उस ‘सययदुल मुर्सलीन (र्इशदूतो के सरदार) के भेजे जाने का अभिप्राय:यह था उस ‘‘रहमतुलूलिल आलमीन (सम्पूर्ण संसार के लिए र्इश्वरीय अनुकम्पा) के अवतरण का ध्येय, यही था दीने इस्लाम के विकासमान होने का कारण। यह धर्म उस प्रशंसित व्यक्ति द्वारा पुनर्जीवित किया गया जिसको मुनीर (प्रकाशमान), नजीर (र्इश्वर से डरानेवाला), हादी (सुपथ प्रदर्शक), मुस्तफा (पाप रहित और श्रेष्ठ), अजीज (प्रिय), इमाम (नेता), मुद्दस्सिर, (पवित्र वस्त्रधारी), मुज्जम्मिल (कमली वाला), मुजक्किर (उपदेशक), खैरूलबशर (पुण्यात्मा) और खैरो खल्किल्लाह (र्इश्वर की सृष्टि का उत्तम पुरूष) आदि पवित्र नाम दिए गए हैं। अत: इससे प्रकट होता है कि इस्लाम धर्म के आविर्भाव से र्इश्वर का उददेश्य और अभिप्राय यह था कि सारी बुराइयां दूर हो और इस धर्म के ऐसे अनुयायी पैदा हो, जो मानव जाति का कल्याण चाहने वाले , संसार मे शान्ति कायम करनेवाले और भलार्इ के मार्ग पर चलनेवाले हो, जो मानवता के गुणों से परिपूर्ण हो, जो मनुष्यों के हक को समझे। जो पड़ोसियों के हक से परिचित हो, जो सहृदय हो,न्यायी और न्याय रक्षक हो, र्इश्वर से डरनेवाले हो, स्त्रियों और बच्चो की रक्षा करनेवाले हो, बूढो और निर्बलो पर दया करनेवाले हो, शुद्ध जीविका (हलाल रोजी) कमानेवाले हो, किसी का हक छीननेवाले न हो, किसी पर अत्याचार और ज्यादती करनेवाले न हो। अपनी आमदनी पर सन्तोष करनेवाले हो, सदाचारी और संयमी हो, सांसारिक धन को संयम और र्इश्वर-भय के आगे तुच्छ समझनेवाले हो।



मुसलमान कौन हैं?  

यदि कोर्इ प्रश्न करे कि एक वाक्य मे बताया जाए कि मुसलमान किसे कहते हैं? तो इसका उत्तर यह हैं कि ‘‘ मुसलमान वह हैं जो इस्लाम का पालन करे ‘‘ और ‘’इस्लाम क्या हैं?’’ यह पहले सविस्तार बताया जा चुका हैं।
मुसलमान वह है जो पवित्र कुरआन का माननेवाला, उसके अनुसार कर्म करनेवाला हैं और र्इशदूत (सल्ल0) के आदर्श को अपने लिए मार्गदीप समझता हैं या जिस मार्ग पर आपके उत्तराधिकारी (खुलफा-ए-राशिदीन) और आपके वंशज चले, उसका अनुसरण करता हैं।
नीचे पवित्र कुरआन से भी मुसलमानों के कुछ गुण दर्शाए जा रहे हैं। जिसने अपनी इन्द्रियों को शुद्ध एवं स्वच्छ बनाया वह सफल हुआ और जिसने उनको अशुद्ध रखा, वह असफल रहा ।         - कुरआन, 91:9-10

इस से मालूम हुआ कि वही मुसलमान कहलाने के योग्य हैं जिसकी इन्द्रियो पर पाप की मैल न हो।
र्इशदूत (सल्ल0) के आदर्श जीवन से हमे क्या शिक्षा मिलती हैं। इसके बारे में भी कुरआन की गवाही पेश करना बहुत उचित होगा-

यह पैगम्बर उन (अनपढ़ जाहिलो) को शुद्ध एवं स्वच्छ बनाते हैं और उनको र्इश्वरीय पुस्तक और ज्ञान की बाते सिखाते हैं।         -कुरआन, 62:2

इस आयत में दो शब्दों पर ध्यान देने की आवश्यकता हैं अर्थात शुद्ध और स्वच्छ बनाना और ज्ञान की बाते सिखाना। जो मनुष्य इन दोनो बातों को अपने जीवन मे ेंसम्मिलित कर लेता हैं, वही मुसलमान कहलाने का अधिकारी हैं।

पवित्र कुरआन में भी मुसलमानों के लिए र्इशदूत हजरत मुहम्मद (सल्ल0) के जीवन को आदर्श बताया गया हैं-

लकद् का-न लकुम फी रसूलिल्लाहि उस्वतुन हसन : - कुरआन, 33:21

अर्थात तुम्हारे लिए र्इश्वर के दूत के जीवन में एक उच्च आदर्श रखा गया हैं। र्इशदूत के सदाचरण और नैतिक पुष्पों के संग्रह का यदि संक्षेप में वर्णन किया जाए तो यूं कह सकते हैं-

आप कभी किसी को बुरा न कहते थे। बुरार्इ के बदले मे बुरार्इ न करते थे, बल्कि बुरार्इ करनेवाले को क्षमा कर देते थें। किसी को अभिशाप नही देते थे। आपने कभी किसी दासी या दास या सेवक को अपने हाथ से सजा नही दी, किसी की नम्रतापूर्वक मांग को कभी अस्वीकार नही किया। आपकी जबान में बड़ी मिठास थी, कभी बुरी बात अपनी जबान से नही निकालते थें। शान्तिप्रिय थे, अति सत्यवादी और र्इमानदार थे। बडे़ ही नम्र स्वभाव के सुव्यवहारशील और मित्रों से प्रेम करनेवाले थें। किसी का अपमान नही करते थे, सदा सत्य का समर्थन करते थें। क्रोध को सह लेते थे। अपने व्यक्तिगत मामलों में कभी क्रोधित नही होते थे। जिन व्यक्तियों को बुरा समझते थे, उनसे भी सुशीलता एवं सुवचन का व्यवहार करते थे। जोर से हंसना बुरा समझते थे, परन्तु सदा हंसमुख और खुश रहते थें।

ये सभी गुण बिना किसी अतिश्योक्ति के वर्णित किए गए हैं, बल्कि इनका प्रमाण आपके जीवन की घटनाओं से भी मिलता हैं पवित्र कुरआन के एक वाक्य से पता लगता हैं कि इस्लाम मे नैतिकता को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया हैं। सूरा अ-ब-स में आता हैं कि एक बार र्इशदूत (सल्ल0) किसी विरोधी को समझा रह थे। कि इतने मे एक मुसलमान आया, जो अन्धा था और वह र्इशदूत को अपनी ओर आकर्षित करने लगा कि कुरआन का अमुक वाक्य किस प्रकार हैं, इसका अर्थ क्या हैं? आपको यह कुसमय का प्रश्न करना और वार्तालाप के बीच हस्तक्षेप बुरा मालूम हुआ और उस अन्धे पर आप नाराज हुए। उसी अवसर पर तुरन्त यह आयत उतरी, जिसका अनुवाद निम्नलिखित है-

‘‘ उसके माथे पर बल पड़ गए और ध्यान न दिया, इस कारण कि उसके पास अन्धा आया, और तुमको क्या पता कि शायद वह संवर जाता या उपदेश ग्रहण करता।’’
                                    -कुरआन, 80:1-4
इस आयत की व्याख्या की आवश्यकता नही अर्थात र्इश्वर ने इस्लाम में नैतिकता के स्तर को इतना उंचा स्थान दिया हैं कि किसी व्यक्ति पर अकारण त्योरी चढ़ाना भी र्इश्वर को अच्छा नही लगा।

मुसलमान मे कौन-से गुण होने चाहिए, इस्लाम के माननेवालों की वास्तविक विशेषता क्या होती है,ं सुनिए-

‘ऐसे लोगो जो अर्थदान करते हैं, अच्छीआर्थिक दशा में भी और कठिनार्इ में भी और गुस्से को पी जानेवाले और लोगो को क्षमा करनेवाले होते हैं, र्इश्वर ऐसे उपकार करनेवाले को प्रिय रखता हैं । और जब वे बुरा काम कर बैठते हैं या स्वयं अपने प्रति अन्याय कर बैठते हैं, तो वे र्इश्वर का स्मरण करते हैं और अपने दोषो के लिए र्इश्वर से क्षमा मांगते हैं।’’        - कुरआन, 3:134-135

यह है र्इश्वरीय आदेश, यह हैं इस्लाम की शिक्षा, जिसके आदेशनुसार चलकर इसकी शान को बढ़ाया जा सकता हैं।

अत: हर मुसलमान का यह कर्तव्य हैं कि वह अपने जीवन को इन गुणों से परिपूर्ण करे और देखे कि वह कहॉ र्इशदूत (सल्ल0) के पद-चिन्ह पर चल रहा है । कहां तक आपके आदेशों का पालन कर रहा हैं। एक मुसलमान सच्चा मुसलमान तभी हो सकता हैं, जब वह पूरी तरह से इस्लाम के अनुसार चले, जिसका आदर्श र्इशदूत (सल्ल0) ने अपने जीवन में स्थापित किया। यदि किसी मुसलमान का आचरण इसके विपरीत है तो वह समझे कि इस्लाम का अनुयायी नहीं। र्इशदूत (सल्ल0) तो वे थे जिन पर मानवता और शिक्षा शिष्टता को पूर्ण किया गया। इस्लाम की पूर्णता का अर्थ ही यह है कि मानवता और नैतिकता को उसके उच्च स्तर तक पहुचा दिया जाएगा।

Author Name: लाला काशी राम चावला, अनुवादक-मुहम्मद कमरूददीन