इस्लाम मे पवित्र कमार्इ का महत्व

इस्लाम मे पवित्र कमार्इ पर बड़ा जोर दिया गया हैं और एक सम्पूर्ण जीवन-व्यवस्था में ऐसा होना अनिवार्य भी हैं। पवित्र कुरआन हैं-

    ‘‘ ऐ लोगो ! जो वस्तुएं धरती पर पार्इ जाती हैं, उनमें से अवर्जित (हलाल) और पवित्र वस्तुओं खाओं और शैतान का अनुसरण न करो। वास्तव में वह तुम्हारा खुला शत्रु हैं।’’             - कुरआन, 2:168

    ‘‘ ऐ र्इमानवालों। जो पवित्र वस्तुएं हमने तुमको प्रदान की हैं, उनमें से खाओं और अल्लाह की प्रशंसा व शुक्र करो, यदि वास्तव मे तुम उसी की उपासना करनेवाले हो’’।                    -कुरआन, 2:172

देखिए, ये कितने खुले और स्पष्ट र्इश्वरीय आदेश हैं। किन्तु आज हम इन्हे कितनी बुरी तरह ठुकरा रहे हैं? आज हम दूसरों के माल पर हाथ साफ करना, लूट-खसोट का धन प्र्राप्त करना उचित समझ रहे हैं। रसूल करीम (सल्ल0) ने तो इस बारे में इतना जोर दिया है कि मनुष्य पढ़कर चकित रह जाता हैं। आप पवित्र कमार्इ को अत्यन्त महत्व देते थे। इस विषय में आपके आदेश अनगिनत हैं। इन आदेशों का एक-एक शब्द पढ़ने के योग्य हैं। आप फरमाते हैं-

(1) अपने हाथ से प्राप्त की हुर्इ जीविका से अच्छी कोर्इ जीविका नही हैं।
(2) जो व्यक्ति पवित्र जीविका खाए, मेरे मार्ग पर चले और जन-साधारण को अपनी बुरार्इयों से सुरक्षित रखें वह स्वर्ग में जाएगा।
(3) अल्लाह पवित्र धन के अतिरिक्त किसी धन को स्वीकार नही करता ।

(4) पवित्र कमार्इ का दान चाहे एक खजूर ही हो तो अल्लाह उसको दाएं हाथ से ग्रहण करता हंझ और दान देनेवाले को इस प्रकार बढ़ाता हैं, जैसे कोर्इ आदमी अपने बछड़े को बढ़ाता हैं। यहॉ तक कि वह पहाड़ के बराबर हो जाता हैं।

(5) जो व्यक्ति अपने खाने के लिए, भीख मॉगने से बचने के लिए और अपने बाल-बच्चो के पालन-पोषण के लिए और अपने पड़ोसी के साथ उपकार करने के लिए पवित्र कमार्इ उचित रूप से प्राप्त करें तो वह कियामत के दिन अल्लाह से इस अवस्था में भेंट करेगा कि उस व्यक्ति का चेहरा चौदहवीं रात के चांद के समान चमकता होगा।
(6) आपके साथी अबू हुरैरा (रजि0) का बयान हैं कि एक बार रसूले करीम (सल्ल0) ने मेरा हाथ पकड़कर मुझे इन पांच बातों का उपदेश दिया-

(क) अपवित्र माल खाने से बचों। इससे तुम सबसे बड़े अल्लाह के उपासक बन जाओगे।
(ख)जो अल्लाह से प्राप्त हो, उस पर सन्तुष्ट रहो। इससे तुम सबसे ज्यादा मालदार हो जाओगे।
(ग) अपने पड़ोसी के साथ सद्व्यवहार करो, तुम मोमिन हो जाओगे।
(घ) दूसरे लोगो के लिए वही पसन्द करो जो तुम अपने लिए पसन्द करते हो तो तुम मुस्लिम हो जाओगे।
(च) अधिक हंसा न करो, अधिक हंसना दिल को बुझा देता हैं।

(7) हज़रत रसूले करीम (सल्ल0) से पूछा गया कि सन्यास क्या हैं? तो आपने फरमाया कि पवित्र जीविका प्राप्त करना और आशाओं को कम करना।

(8) रसूले करीम (सल्ल0) ने फरमाया कि मुसलमान केवल इसी प्रकार सदाचारी, संयमी और धार्मिक हो सकता हैं ज बवह उन वस्तुओं को हाथ न लगाए जिनके बारे मे उसे अपवित्र होने की आशंका हो।

(9) रसूले करीम (सल्ल0) ने फरमाया-’’ मकानों के निर्माण में वर्जित ढंग से प्राप्त धन न लगाओ, क्योकि वह बुरार्इ एवं विनाश का आधार हैं।’’
(10) जो व्यक्ति अपवित्र धन अपने घर लाएगा, वह उसके बाल-बच्चों की हानि का कारण होगा और कोर्इ पुरूष उस हानि की पूर्ति नही कर सकता। यदि एक मनुष्य के अच्छे कर्म पहाड़ के बराबर होंगे तो भी उसे कियामत (कर्मफल) के दिन तराजू के पास ठहराकर पूछेंगे कि तूने अपने बाल-बच्चों का पालन-पोषण कहॉ से किया? उसकी इस बात पर पकड़ की जाएगी और उसके समस्त पुण्य-कर्म अकारथ चले जाएंगे। उस समय फरिश्ता आवाज देगा कि देखों यह वह व्यक्ति हंा कि उसके परिवारवाले उसके समस्त पुण्य-कर्म खा गए और यह स्वयं पकड़ लिया गया।

(11) कियामत के दिन किसी मनुष्य से सर्वप्रथम उसके परिवारवाले झगलेंगे और कहेंगे कि हे अल्लाह! इसका और हमारा न्याय कर। इसने हमको वर्जित (हराम) भोजन खिलाया। हम इस बात को नही जानते थें, जो बाते हमको सिखाने की थी, वह हमको नही सिखार्इ, हम मूर्ख रह गए। इसलिए जो व्यक्ति पवित्र विरासत न पाए या पवित्र जीविका न कमाए, उसे विवाह ही न करना चाहिए, यदि वह अपने आपको व्यभिचार से सुरक्षि रख सकें।

(12) प्रतिदिन प्रात: समय उठकर अपने दिल में संकल्प कर लिया करो कि आज घर से इस विश्वास के साथ जाऊंगा कि पवित्र जीविका कमाकर लाऊंगा, ताकि लोगो की मोहताजी और उनकी आवश्यकता न रहे और इतना र्इश्वर-भय और अवसर प्राप्त हो कि अल्लाह की उपासना में लीन हो सकूं और यह संकल्प करके बाहर जाओ कि आज लोगो के साथ दया, सज्जनता, क्षमा और सत्यता से कम लूंगा और लोगो को अच्छे काम करने का आदेश और बुरे कामों से बचने की ताकीद करूंगा।


(13) जो व्यक्ति चालीस दिन तक निरन्तर पवित्र जीविका खाए, जिससे अपवित्र कमार्इ तनिक भी सम्मिलित न हो, अल्लाह उसके हृदय को अपनी ज्योति से परिपूर्ण कर देता हैं और ज्ञान के स्त्रोत उसकी अन्तरात्मा मे जारी कर देता हैं और लौकिक लोभ उसके मन से निकाल देता हैं।

(14) एक बार आपके एक साथी ने आपसे निवेदन किया कि ऐ अल्लाह के रसूल! आप मुझे ऐसा तरीका बता दे कि मै जिस उददेश्य से अल्लाह से प्रार्थना करूं, मेरी वह प्रार्थना स्वीकार हो जाए। आपने फरमाया-’’ पवित्र जीविका खाओं, तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार हो जाया करेगी।’’
(15)रसलू करीम (सल्ल0) ने फरमाया-’’ बहुत-से लोग ऐसे होते हैं कि उनका खाना-कपड़ा अपवित्र धन का होता हैं। फिर भी वह हाथ उठा-उठाकर प्रार्थनाकरते हैं। किन्तु इसी लिए उनकी प्रार्थना स्वीकार नही होती।’’ आपने यह भी फरमाया कि अल्लाह का एक दूत बैतुल मक्दिस में हैं, जो हर रात पुकारता हैं कि जो व्यक्ति अपवित्र माल खाएगा, अल्लाह उसकी न फर्ज उपासना स्वीकार करेगा न सुन्नत।

(16) रसलू करीम (सल्ल0) ने फरमाया-’’ जो व्यक्ति इसका विचार नही रखता कि माल कहां से कमाता हैं तो अल्लाह पाक भी इसकी परवाह नही करेगा कि उसे किधर से नरक मे डाल दें। जो मांस शरीर मे अपवित्र माल खाने से बढ़ेगा वह नरक में जलाया जाएगा।

(17) रसलू करीम (सल्ल0) ने फरमाया-’’उपासना के दस भाग हैं। इनमें से नौ भाग पवित्र जीविका की प्राप्ति का संकल्प हैं। जो व्यक्ति पवित्र जीविका ढूंढते-ढूढते रात को अपने घर खाली हाथ वापस जाता हैं, वह जब सोता हैं तो उसके सभी पाप माफ कर दिए जाते हैं औ जब प्रात: उठता हैं तो अल्लाह उससे प्रसन्न होता हैं।’’

(18) रसलू करीम (सल्ल0) ने फरमाया-’’ अल्लाह फरमाता हैं कि जो व्यक्ति अपवित्र माल से बचता हैं, मुझे लज्जा आती हैं कि उससे हिसाब लूॅ-

(17) रसलू करीम (सल्ल0) ने फरमाया-’’जो व्यक्ति अपवित्र माल खाएगा यदि दान देगा तो वह स्वीकार न होगा और यदि रख छोड़ेंगा तो नरक तो द्वार तक वह उसका पाथेय (सफर का खर्च) होगा।

Author Name: लाला काशी राम चावला, अनुवादक-मुहम्मद कमरूददीन