इस्लामी युद्ध-नियम व संधि की क्या हैसियत है?

इस्लामी युद्ध-नियम व संधि की क्या हैसियत है?

                            इस्लाम ने इसके विपरीत जंग के जो आदाब बताये हैं, उनकी सही हैसियत कानून की हैं, क्योकि वे मुसलमानों के लिए अल्लाह और रसूल के दिये हुए आदेश हैं, जिन की पाबन्द हम हर हाल में करेंगे, चाहे हमारा दुश्मन कुछ भी करता रहे। अब यह देखना हर इल्म रखने वाले का काम है कि जो जंगी-नियम तेरह सौ साल पहले तय किये गये थे, पश्चिम के लोगो ने उस की नक्ल की है या नही, और नकल करके भी वह जंग की सभ्य मर्यादाओं के उस दर्जे तक पहुंच सका हैं या नही, जिस पर इस्लाम ने हमे पहुचाया था।
पश्चिम वाले अक्सर यह दावा किया करते है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल0) ने सब कुछ यहूदियों और र्इसार्इयों से ले लिया हैं। इस लिए बाइबिल को भी पढ़ डालिए, ताकि आपको मालूूम हो जाये कि सभ्यता के इन दावेदारों की मुकद्दस किताब जंग के किन तरीको की हिदायत देती हैं।
शुरू ही मे यह बात भी समझ लीजिए कि इस्लाम मे इन्सान के इन्सान होने की हैसियत से जो अधिकार बयान किये गये हैं, उनको दोहराने की अब जरूरत नही हैं। इनको जेहन में रखते हुए देखिए कि इन्सान के दुश्मनों के क्या हुकूक इस्लाम में मुर्कर किये गये हैं।

युद्ध न करने वालो के अधिकार
इस्लाम में सबसे पहले दुश्मन मुल्क की जंग करती हुर्इ (Combatant) और जंग न करती हुर्इ (Non--Combatant) आबादी के बीच फर्क किया गया हैं। जहां तक जंग न करती हुर्इ आबादी का संबंध हैं (यानी जो लड़ने वाली नहीं हैं या लड़ने के काबिल नही हैं। मिसाल के तौर पर औरते, बच्चे, बूढ़े, बीमार, अंधे अपाहिज वगैरह) उसके बारे में अल्लाह के रसूल (सल्ल0) की हिदायते निम्नलिखित हैं।


जो लड़ने वाले नही हैं, उनको कत्ल न किया जाये 

‘‘किसी बूढ़े, किसी बच्चे और किसी औरत को कत्ल न करों।’’

‘‘ खानकाह मे बैठे राहिबो को कत्ल न करो।’’ या इबादतगाहो मे बैठे हुए लोगो को न मारों।

जंग मे एक मौके पर हूजूर (सल्ल0) ने एक औरत की लाश देखी तो फरमाया ‘‘ यह तो नही लड़ रही थी।’’ इस से इस्लामी कानूनदानों ने यह उसूल मालूम किया कि जो लोग लड़ने वाले न होंं उनको कत्ल न किया जाये।


युद्ध करने वालो के अधिकार
इसके बाद देखिये कि लड़ने वालो को क्या अधिकार इस्लाम ने दिये हैं।

1-    आग का अजाब न दिया जाये

हदीस मे हूजूर (सल्ल0) का इरशाद हैं कि ‘‘ आग का अजाब  देना आग के रब के सिवा किसी को जेबा नही देता।’’ इससे यह हुक्म निकला कि दुश्मन को जिन्दा न जलाया जाये।

2-    जख्मी पर हमला न किया जाये

‘‘ किसी जख्मी पर हमला न करो।’’ मुराद हैं वह जख्मी जो लड़ने के काबिल न रहा हो, न अमली तौर पर लड़ रहा हो।

3-    कैदी को कत्ल न किया जाय
‘‘ किसी कैदी को कत्ल न किया जाये।’’

4-    बांध कर कत्ल न किया जाये

‘‘ नबी (सल्ल0) ने बांध कर कत्ल करने या कैद की हालत में कत्ल करने से मना फरमाया।’’ हजरत अबू अय्यूब अन्सारी (रजि0) जिन्होने यह रिवायत हुजूर (सल्ल0) से नकल की हैं फरमाते है कि ‘‘जिस ख़्ाुदा के हाथ में मेरी जान हैं, उसकी कसम खा कर कहता हॅू कि मै किसी मुर्ग को भी बांध कर जिब्ह न करूंगा।’’

5-    दुश्मन कौम के देश में आम गारतगरी या लूटमार न की जाये

यह हिदायत भी की गर्इ कि दुश्मनों के मुल्क में दाखिल हो तो आम तबाही न फैलाओं। बस्तियों को वीरान न करो, सिवाये उन लोगो के जो तुम से लड़ते हैं और किसी आदमी के माल पर हाथ न डालो। हदीस में बयान किया गया हैं कि ‘‘नबी (सल्ल0) ने लूटमार से मना किया हैं। ‘‘और आप (सल्ल0) का फरमान था कि ‘‘लूट का माल मुरदार से ज्यादा हलाल नही हैं। ‘‘ यानी वह भी मुरदार की तरह हराम हैं। हजरत अबू बक्र सिद्दीक (रजि0) फौजो को रवाना करते वक्त हिदायत फरमाते थे कि ‘‘बस्तियों को वीरान न करना, खेतों और बागों को बरबाद न करना, जानवरों को हलाक न करना।’’ (ग़नीमत के माल का मामला इससे अलग हैं। इस से मुराद वह माल हैं, जो दुश्मन के लश्करो, उसके फौजी कैम्पों और उसकी छावनियों में मिले। उसको जरूर इस्लामी फौजे अपने कब्जे मे ले लेंगी। लेकिन आम लूटमार वह नहीं कर सकती।)

जीते हुये इलाके के लोगो से कोर्इ चीज मुफ्त या बिला इज़ाजत न ली जाये इस बात से भी मना कर दिया गया कि आम आबादी की किसी चीज से मुआवजा अदा किये बगैर फायदा न उठाया जाये। जंग के दौरान में अगर दुश्मन के किसी इलाके पर कब्जा करके मुसलमानों की फौज वहां ठहरी हो तो उसको यह हक नही पहुंचता कि लोगो की चीजों का बे रोक-टोक इस्तेमाल करें। अगर उसको किसी चीज की जरूरत हो तो खरीद कर लेना चाहिए या मालिकों की इजाजत लेकर, उस को इस्तेमाल करना चाहिए। हजरत अबूबक्र सिद्दीक (रजि0) फौजों को रवाना करते वक्त यहां तक फरमाते थे कि, ‘‘दूध देने वाले जानवरो का दूध भी तुम नही पी सकते, जब तक कि उनके मालिकों से इजाजत न ले लो।
   
1-    दुश्मन की लाशों पर ग़ुस्सा न निकाला जाये

इस्लाम मे पूरे तौर पर इस बात को भी मना किया गया हैं कि दुश्मन की लाशों का अनादर किया जाये या उनकी गत बिगाड़ी जाये। हदीस में आया हैं कि
‘‘नबी (सल्ल0) ने दुश्मनों की लाशों, की काट, पीट या गत बिगाड़ने से मना फरमाया हैं।’’ यह हुक्म जिस मौके पर दिया गया, वह भी बड़ा सबक आमोज हैं। उहद की जंग में जो मुसलमान शहीद हुये थे, दुश्मनों ने उनकी नाक काट कर उन के हार बनाये और गलों में पहने। हूजूर (सल्ल0) के चचा हजरत हम्जा (रजि0) का पेट चीर कर उनका कलेजा निकाला गया और उसे चबाने की कोशिश की गयी। उस वक्त मुसलमानों का गुस्सा हद को पहुंच गया था। मगर हूूजूर (सल्ल0) ने फरमाया कि तुम दुश्मन कौम की लाशो के साथ ऐसा सुलूक न करना। इसी से अन्दाजा किया जा सकता हैं कि यह दीन हकीकत में [+kqnk ही का भेजा हुआ दीन हैं। इसमें इन्सानी ज़ज़बात और भावनाओं का अगर दखल होता तो उहूद की जंग में यह मंजर देख कर हुक्म दिया जाता कि तुम भी दुश्मनों की फौजों की लाशों का इसी तरह अनादर करो।


2-    दुश्मन की लाशे उसके हवाले करना

अहजाब की जंग में दुश्मन का एक बड़ा मशहूर घुड़ सवार मर कर खन्दक में गिर गया। काफिरों ने अल्लाह के रसूल (सल्ल0)  के सामने दस हजार दीनार पेश किये कि उसकी लाश हमे दे दीजिए। आप  (सल्ल0)  ने फरमाया कि मै मुर्दे बेचने वाला नही हूं। तुम ले जाओ अपनी लाश।

3-    वादा-खिलाफी सख्ती से मना


इस्लाम में बदअहदी को भी सख्ती से मना कर दिया गया हैं। अल्लाह के रसूल (सल्ल0) फौजो को भेजते वक्त जो हिदायतें देते थे, उनमें से एक यह थी कि ‘‘ बदअहदी न करना। ‘‘ कुरआन और हदीस मे इस हुक्म को बार-बार दोहराया गया हैं कि दुश्मन अगर अहद व पैमान की खिलाफवर्जी करता हैं तो करे, लेकिन तुम को अपने अहद व पैमान की खिलाफवर्जी कभी न करना चाहिए।
हुदैबिया की सुलह की मशहूर घटना हैं कि सुलहनामा तय हो जाने के बाद एक मुसलमान नव जवान अबू जन्दल ़(रजि0) जिन का बाप सुलहनामे की शर्ते अल्लाह के रसूल ़(सल्ल0) से तय कर रहा था, बेड़ियों मे भागते हुये आये और उन्होने कहा मुसलमानों मुझे बचाओ!! अल्लाह के रसूल ़(सल्ल0) ने उन से फरमाया कि मुआहदा हो चुका है। अब हम तुम्हारी मदद नही कर सकते, तुम वापस जाओं। अल्लाह तुम्हारे लिये कोर्इ रास्ता खोलेगा। उनकी दयनीय दशा को देखकर मुसलमानों की पूरी फौज रो पड़ी, लेकिन अल्लाह के रसूल ़(सल्ल0) ने जब फरमा दिया कि अहद को हम तोड़ नही सकते, तो उनको बचाने के लिए एक भी आगे न बढ़ा और काफिर उनको जबरन घसीटते हुये ले गये यह अहद व पैमान की पाबन्दी की अनोखी मिसाल हैं और इस्लामी इतिहास मे ऐसी मिसाले बहुत सी मौजूद हैं।

4-    जंग से पहले जंग के ऐलान का हुक्म

कुरआन मे फरमाया गया हैं कि, ‘‘अगर तुम्हे किसी कौम से ख्यानत ़(यानी अहद तोड़ने) का खतरा हो तो उसका अहद खुल्लमखुल्ला उसके मुंह पर मार दो।’’ ़(8:58) इस आयत में इस बात से मना कर दिया गया हैं कि जंग के ऐलान के बगैर दुश्मन के ‘खिलाफ जंग छोड़ दी जाये, सिवाय इसके कि दूसरे फरीक ने आक्रामक कार्यवाइयां शुरू कर दी हो। अगर दूसरे फरीक ने ऐलान के बगैर आक्रामक कार्यवाइयों की शुरूआत कर दी हो तो फिर हम बगैर ऐलान किये उसके खिलाफ जंग कर सकते हैं, वरना कुरआन हमे यह हुक्म दे रहा है कि ऐलान करके उसे बता दो कि अब हमारे और तुम्हारे बीच कोर्इ अहद बाकी नही रहा हैं और अब हम और तुम बरसरे जंग हैं। अगरचे मौजूदा अन्तराष्ट्रीय कानून का तकाजा भी यह हैं कि जंग के ऐलान के बगैर जंग न की जाये, लेकिन इस बीसवीं सदी में भी तमाम बड़ी-बड़ी लड़ाइयां जंग के ऐलान के बगैर शुरू हुर्इ। वह उनका अपना बनाया हुआ कानून हैं, इसलिए वह अपने ही कानून को तोड़ने के मुख्यार हैं। मगर हमारे लिये यह ख़्ाुदा का दिया हुआ कानून है, हम उसकी खिलाफवर्जी नही कर सकते।

Author Name: इस्लाम धर्म: सैयद अबुल आला मौदूदी (रह0)