इस्लाम - शान्ति-मार्ग

पैदा करने वाले का वजूद
भाइयों! यदि कोर्इ व्यक्ति आपसे कहे कि बाजार में एक दुकान ऐसी हैं, जिसका कोर्इ दुकानदार नही हैं, न कोर्इ उसमें माल लानेवाला हैं न बेचनेवाला और न कोर्इ उसकी रखवाली करता है। दुकान आप-से-आप चल रही है।, आप-से-आप उसमें माल आ जाता हैं और आप-से-आप खरीदारों के हाथ बिक जाता है, तो क्या आप उस व्यक्ति की बात मान लेंगे? क्या आप स्वीकार कर लेंगे कि किसी दुकान में माल लानेवाले के बिना आप-से-आप माल आ भी सकता हैं? माल बेचनेवाले के बिना आप-से-आप बिक भी सकता हैं? हिफाजत करनेवाले के बिना आप-से-आप चोरी और लूट से बचा भी रह सकता हैं? अपने दिल से पूछिए, ऐसी बात आप कभी मान सकते है? जिसकी अक्ल और सूझबूझ ठिकाने हो क्या उसके दिमाग में कभी यह बात आ सकती हैं कि कोर्इ दुकान दुनिया में ऐसी भी होगी?

कल्पना कीजिए, एक आदमी आप से कहता हैं कि इस शहर में एक कारखाना हैं जिसका न कोर्इ मालिक है, न इंजीनियर, न मिस्त्री, सारा कारखाना आप-से-आप कायम हो गया हैं। सारी मशीने खुद ही बन गर्इ हैं। खुद ही सारे पुर्जे अपनी-अपनी जगह पर लग भी गए, खुद ही सभी मशीने चल भी रही हैं और खुद ही उनमें से अजीब-अजीब चीजे बन-बन कर निकल भी रही हैं। सच बताइए, जो आदमी आप से यह कहेगा, क्या आप हैरत से उसका मुंह न देखने लगेंगे? क्या आपको यह शक न होगा कि कहीं उसका दिमाग खराब तो नही हो गया हैं? क्या एक पागल के सिवा ऐसी गलत बात कोर्इ कर सकता हैं?
दूर की मिसालों को जाने दीजिए, यह बिजली का बल्ब जो आपके सामने जल रहा हैं, क्या किसी के कहने से आप यह मान सकते हैं कि रौशनी इस बल्ब में आप-से-आप पैदा हो जाती हैं? यह कुर्सी जो आपके सामने रखी है, क्या किसी बड़े-से-बड़े धुरन्धर दार्शनिक (फलसफी) के कहने से भी आप मान सकते हैं कि यह आप-से-आप बन गर्इ है? ये कपड़े आप जो पहने हुए हैं, क्या दुनिया के किसी बड़े-से-बड़े आलिम और पंडित के कहने से भी आप यह तस्लीम करने के लिए तैयार हो जाएॅगे कि उनको किसी ने बनाया नही हैं, ये आप-से-आप ही बुन गए हैं? ये घर जो आपके सामने खड़े हैं, यदि तमाम दुनिया की यूनिवर्सिटियों के प्रोफेसर मिलकर भी आपको यकीन दिलाना चाहे कि इन घरो को किसी ने नही बनाया हैं, बल्कि यह आप-से-आप बन गए हैं, तो क्या उनके यकीन दिलाने से आपको ऐसी गलत बात पर यकीन आ जाएगा? ये कुछ मिसालें तो आपके सामने की हैं, रात-दिन जिन चीजो को आप देखते है, उन्ही मे से कुछ को मैने बयान किया हैं। अब विचार कीजिए, एक मामूली दुकान के बारे में जब आपकी अक्ल यह नही मान सकती कि वह किसी दुकानदार के बिना कायम हो गर्इ और किसी चलाने वाले के बिना चल रही हैं, तो इतनी बड़ी सृष्टि के बारे में आपकी अक्ल इस पर किस प्रकार यकीन कर सकती हैं कि वह किसी बनानेवाले के बिना बन गर्इ हैं और किसी चलानेवाले के बिना चल रही हैं?

जब एक मामूली-से कारखाने के बारे में आप यह मानने के लिए तैयार नही हो सकते कि वह किसी बनानेवाले के बिना बन जाएगा और किसी चलानेवाले के बिना चलता रहेगा, तो धरती और आकाश का यह जबरदस्त कारखाना जो आपके सामने चल रहा हैं, जिसमें चॉद, सूरज और बड़े-बड़े नक्षत्र (सय्यारे) घड़ी के पुर्जो के समान चल रहे हैं, जिसमें समुद्रो से भापे उठती है, भापों से बादल बनते हैं, बादलो को हवाएॅ उड़ाकर धरती के कोने-कोने मे फैलाती हैं, फिर उनको ठीक समय पर ठंडक पहुचाकर दोबारा भाप से पानी बनाया जाता हैं, फिर वह पानी बारिश की बूदों के रूप में धरती पर गिराया जाता हैं, फिर उस बारिश की वजह से मरी हुर्इ धरती के पेट से तरह-तरह के लहलहाते हुए पेड़-पौधे निकाले जाते हैं, किस्म-किस्म के अनाज, रंग-बिरंग फूल और तरह-तरह के फल पैदा किए जाते हैं। इस कारखाने के बारे मे आप यह कैसे मान सकते हैं कि यह सब कुछ किसी बनानेवाले के बिना आप-से-आप बन गया और किसी चलानेवाले के बिना आप-से-आप चल रहा हैं? एक जरा-सी कुर्सी, एक गजभर कपड़े एक छोटी-सी दीवार के बारे मे कोर्इ कह दे कि ये चीजे खुद बनी हैं तो आप फौरन फैसला कर देंगे कि उसका दिमाग बिगड़ गया हैं, फिर भला उस व्यक्ति के दिमाग के खराब होने में क्या शक हो सकता है जो कहता हैं कि धरती आप-से-आप बन गर्इ, जानवर आप-से-आप पैदा हो गए, इन्सान जैसी अदभुत चीज आप-से-आप बनकर खड़ी हो गर्इ? आदमी का शरीर जिन पदार्थो से मिलकर बना है, उन सबको साइंसदानो ने अलग-अलग करके देखा तो मालूम हुआ कि कुछ लोहा हैं, कुछ कोयला, कुछ गन्धक, कुछ फास्फोरस, कुछ कैल्शियम, कुछ नमक, कुछ गैसे और बस ऐसी ही कुछ और चीजे हैं, जिनकी पूरी कीमत कुछ रूपयों से अधिक नही हैं। ये चीजे जितने-जितने वजन के साथ आदमी के शरीर मे शामिल हैं उतने ही वजन के साथ उन्हे ले लीजिए और जिस प्रकार जो चाहे मिलाकर देख लीजिए, आदमी किसी तरकीब से न बन सकेगा। फिर किस प्रकार आपकी अक्ल यह मान सकती हैं कि उन कुछ बेजान चीजो से देखता, सुनता, बोलता, चलता-फिरता इन्सान वह इन्सान जो हवार्इ जहाज और रेडियो बनाता हैं, किसी कारीगर की हिकमत और सूझबूझ के बिना आप-से-आप बन जाता है?

कभी आपने सोचा कि मॉ के पेट की छोटी-सी फैक्ट्री मे किस प्रकार आदमी तैयार होता हैं? बाप की कार्यसाधकता का इसमें कोर्इ हाथ नही, मॉ की हिकमत का इसमें कोर्इ काम नही। एक छोटी-सी थैली में दो कीड़े जो सूक्ष्म-दर्शक यंत्र (Microscope) के बिना देखे तक नही जा सकते, न जाने कब आपस मे मिल जाते हैं। मां के खून ही से उनको खुराक पहुचना शुरू होती हैं, वही लोहा, गन्धक, फास्फोरस वगैरह सब चीजे जिनको मैने उपर बयान किया, एक खास वजन और एक खास अनुपात के साथ वहॉ जमा होकर लोथड़ा बनती है, फिर उस लोथड़े मे जहॉ आंखे बननी चाहिए वहा आंखे बनती है, जहां कान चाहिए वहां कान बनते हैं, जहॉ दिमाग बनना चाहिए वहां दिमाग बनता है, जहा दिल बनना चाहिए वहां दिल बनता है, हडडी अपनी जगह पर, मांस अपनी जगह पर, रगें अपनी जगह पर, यानी एक-एक पुर्जा अपनी-अपनी जगह पर ठीक बैठता हैं। फिर उसमें जान पड़ती हैं, देखने की ताकत, सुनने की ताकत, चखने और सुघने की ताकत, बोलने की ताकत , सोचने और समझने की ताकत, और कितनी ही अनगिनत ताकते उसमें भर जाती हैं। इस प्रकार जब इन्सान पूर्ण हो जाता हैं तो पेट की वही छोटी-सी फैक्ट्री, जहा नौ महीने तक वह बन रहा था, खुद जोर लगाकर उसे बाहर ढकेल देती हैं और संसार यह देख कर चकित रह जाता हैं कि इस फैक्ट्री मे एक ही तरीके से लाखों इन्सान रोज बनकर निकल रहे हैं, किन्तु हर एक का नमूना भिन्न और अलग हैं, शक्ल अलग, रंग अलग, आवाज, ताकतें और सलाहियते अलग, स्वभाव और विचार अलग, आचार और खूबियॉ अलग, यानी एक ही पेट से निकले हुए दो सगे भार्इ तक एक-दूसरे से नही मिलते । यह ऐसा चमत्कार हैं जिसे देख कर अक्ल दंग रह जाती हैं इस चमत्कार हैं जिसे देख कर अक्ल दंग रह जाती हैं। इस चमत्कार को देख कर भी जो इन्सान यह कहता हैं कि यह काम किसी जबरदस्त हिकमत, सूझबूझ और जबरदस्त ताकतवाले और जबरदस्त ज्ञान रखनेवाले और अनुपम चमत्कार रखने र्इश्वर के बिना हो रहा हैं या हो सकता हैं, निश्चय ही उसका दिमाग ठीक नही हैं। उसको अक्लमंद समझना अक्ल का अपमान करना हैं। कम-से-कम मै तो ऐसे व्यक्ति को इस योग्य नही समझता कि किसी बौद्धिक और माकूल मसले पर उससे बात-चीत करूॅ।

एकेश्वरवाद

अच्छा अब थोड़ा और आगे चलिए। आप मे से हर व्यक्ति की अक्ल इस बात की गवाही देगी कि दुनिया में कोर्इ काम भी चाहे छोटा हो या बड़ा, कभी सुव्यवस्थित और नियमित रूप से और बाकायदगी के साथ नहीं चल सकता, जब तक कि कोर्इ एक व्यक्ति उसका जिम्मेदार न हो। एक स्कूल के दो हेडमास्टर, एक विभाग के दो डायरेक्टर, एक फौज के दो मकाण्डर, एक हुकूमत के दो बादशाह कभी आपने सुने हैं? और यदि कही ऐसा हो तो क्या आप समझते हैं कि एक दिन के लिए भी प्रबन्ध ठीक हो सकता हैं? आप अपने जीवन के छोटे-छोटे मामलों मे भी इसका तजुर्बा करते हैं कि जहॉ एक को एक से अधिक लोगों की जिम्मेदारी पर छोड़ा जाता हैं, वहॉ अत्यन्त अव्यवस्था पैदा हो जाती हैं।
लड़ार्इ-झगड़े होते हैं और अंत मे साझे की हंडिया एक दिन चौराहे मे फूटकर रहती हैं। सुप्रबंध, नियमितता, एकरूपता और सलीका संसार में जहॉ भी आप देखते हैं, वहॉ निश्चित रूप से किसी एक ताकत का हाथ होता हैं, कोर्इ ही वजूद इख्तियार और प्रभुत्ववाला होता हैं और किसी एक ही के हाथ में सारे कामों की बागडोर होती हैं, उसके बिना प्रबन्ध की आप कल्पना नही कर सकते।

यह ऐसी सीधी बात हैं कि कोर्इ व्यक्ति जो थोड़ी-सी अक्ल भी रखता हो इसे मानने में संकोच या हिचकिचाहट न करेगा। इस बात को ध्यान मे रखकर जरा अपने आस-पास की दुनिया पर नजर डालिए। यह विशाल संसार जो आपके सामने फैला हुआ हैं, ये करोड़ो नक्षत्र (सय्यारे) जो आपके ऊपर चक्कर लगाते दिखार्इ देते हैं, यह धरती जिस पर आप रहते हैं, यह चॉद जो रातों को निकलता हैं, यह सूरज जो प्रत्येक दिन उगता हैं, यह शुक्र, यह मंगल, यह बुध, यह बृहस्पति और ये दूसरे अनगिनत तारे जो गेंदो की तरह घूम रहे हैं, देखिए, इन सबके घूमने मे कैसी कठोर और अटल नियमितता हैं! कभी रात अपने समय से पहले आती हुर्इ आपने देखी? कभी दिन अपने समय से पहले निकला? कभी चाद धरती से टकराया? कभी सूरज अपना छोड़कर हटा? कभी किसी तारे को आपने एक बाल बराबर भी अपने गर्दिश की राह से हटते हुए देखा या सुना? ये करोड़ो ग्रह (सय्यारे) जिनमें से कुछ हमारी धरती से लाखों गुना बड़े हैं और कुछ सूरज से भी हजारों गुना बड़े। ये सब घड़ी के पुर्जो की तरह एक जबरदस्त जाब्ते में कसे हुए हैं और एक बंधे हुए हिसाब के अनुसार अपनी-अपनी निश्चित रफतार के साथ अपने-अपने निश्चित मार्ग पर चल रहे हैं। न किसी रफतार में जर्रा भर भी फर्क पड़ता हैं, न कोर्इ अपने रास्ते से बाल बराबर टल सकता हैं। उनके बीच जो सम्बन्ध और निस्बते कायम कर दी गर्इ हैं, अगर उनमें एक पल के लिए जरा-सी भी अन्तर आ जाए तो विश्व का समस्त प्रबन्ध ही छिन्न-भिन्न हो जाए, जिस प्रकार रेले टकराती हैं उसी प्रकार ग्रह एक-दूसरे से टकरा जाएॅ।
यह तो आकाश की बाते हैं। अब जरा धरती और खुद अपने उपर नजर डालकर देखिए, इस मिटटी की गेंद पर जीवन का यह सारा खेल जो आप देख रहे हैं, यह सब कुछ बंधे हुए नियमों और जाब्तो की बदौलत कायम हैं। धरती की आकर्षण-शक्ति ने सारी चीजों को अपने दायरे में बांध रखा हैं, एक सेकेण्ड के लिए भी अगर वह अपने बन्धन से मुक्त कर दे तो सारा कारखाना बिखर जाए, इस कारखाने मे जितने कल-पुर्जे काम कर रहे है, सबके सब एक नियम में बंधे हुए हैं और इस नियम मे कभी अंतर नही आता। हवा अपने नियम का पालन कर रही हैं, पानी अपने नियम में बंधा हुआ हैं, रौशनी के लिए जो नियम हैं, उस पर वह चल रही हैं, गर्मी और सर्दी के लिए जो नियम हैं उसकी वह पाबन्द है। मिटटी, पत्थर, धरती, बिजली, भाप, पेड़, जानवर किसी में यह मजाल नही कि अपनी हद से बढ़ जाए या अपनी प्रकृतियों और खासियतों को बदल दे या उस काम को छोड़ दे, जो उसे सौंपा गया हैं।

फिर अपनी हद के अन्तर अपने-अपने नियम का पालन करने के साथ इस कारखाने के सारे पुर्जे एक-दूसरे के साथ मिलकर काम कर रहे हैं और संसार में जो कुछ भी हो रहा हैं सब इसलिए हो रहा हैं कि ये सारी चीजे और सारी ताकतें मिलकर काम कर रही हैं। एक मामूली से बीज की ही मिसाल ले लीजिए, जिसको आप धरती मे बोते हैं, वह कभी विकसित होकर पेड़ बन ही सकता, जब तक कि धरती और आकाश की सारी शक्तिया मिलकर उसको पालने मे हिस्सा न लें। धरती अपने खजाने से उसको भोजन देती हैं, सूरज उसकी जरूरत के मुताबिक उसे गर्मी पहुचाता हैं, पानी से जो कुछ वह मांगता हैं, वह पानी दे देता है, हवा से वह जो कुछ चाहता है वह हवा दे देती हैं, राते उसके लिए ठण्डक और ओस का इंतिजाम करती हैं, दिन उसे गर्मी पहुचकर पुख्तगी की ओर ले जाता है, इस प्रकार महीनों और सालो तक लगातार एक नियम और कायदे के साथ ये सब मिल-जुल कर उसे पालते-पोसते हैं, तब जाकर कही पेड़ बनता है और उसमे फल आते हैं। आपकी ये सारी फसले जिनके बलबूते पर आप जी रहे है, इन्ही बेशुमार तरह-तरह की शक्तियों के सहयोग के साथ काम करने ही की वजह से तैयार होती है, बल्कि खुद आप जिन्दा इसी वजह से हैं कि धरती और आकाश की तमाम शक्तियॉ मिलकर आपके पालन-पोषण मे लगी हुर्इ हैं। यदि केवल एक हवा ही इस सहयोगपूर्ण कार्य-व्यवहार से अलग हो जाए तो आप तबाह हो जाएॅ,
यदि पानी, हवा और गर्मी के साथ सहयोग करने से इनकार कर दे तो आप पर बारिश की एक बूंद न बरस सके। यदि मिट्टी पानी के साथ सहयोग करना छोड़ दे तो आपके बाग सूख जाएॅ, आपकी खेतियॉ कभी न पके और आपके मकान कभी न बन सके। यदि दियासलार्इ की रगड़ से आग पैदा होने पर तैयार न हो तो आपके चूल्हे ठण्डे हो जाएॅ और आपके सारे कारखाने पूरे तौर पर ठप हो जाएॅ। यदि लोहा आग के संबंध रखने से इन्कार कर दे तो आप रेले और मोटरे तो दूर रही, एक छूरी और एक सूर्इ तक न बना सके। अर्थात यह सारी दुनिया जिसमें आप जी रहे हैं, यह केवल इस कारण कायम हैं कि इस विशाल जगत के सभी विभाग पूरी पाबन्दी के साथ एक-दूसरे से मिलकर काम कर रहे हैं और किसी विभाग के किसी कर्मचारी के यह मजाल नही हैं कि अपनी डयूटी से हट जाए या नियमानुसार अन्य विभाग के कर्मचारियो से कार्य-सहयोग न करे।

यह जो कुछ मैने आप से बयान किया हैं, क्या इसमे कोर्इ गलत या सत्य के विरूद्ध हैं? शायद आपमे से कोर्इ भी हरगिज असत्य न कहेगा। अच्छा यदि यह सब है तो मुझे बताइए कि यह जबरदस्त प्रबन्ध, यह आश्चर्यजनक नियमितता, यह उच्चकोटि की एकरूपता, यह आकाश और धरती की असीम एवं अनगिनत चीजों और शक्तियो में पूर्ण सामंजस्य का आखिरी कारण क्या हैं? करोड़ो सालों से यह सृष्टि यो ही कायम चली आ रही है, लाखों साल से इस धरती पर पेड़-पौधे उग रहे है, जीव-जन्तु हो रहे है और न जाने इस धरती पर कब से मनुष्य जी रहा हैं। कभी ऐसा न हुआ कि चांद जमीन पर गिर जाता, या जमीन सूरज से टकरा जाती, कभी रात और दिन के हिसाब में अन्तर न आया, कभी वायु विभाग की जल विभाग से लड़ार्इ न हुर्इ, कभी पानी मिट्टी से न रूठा, कभी गर्मी न आग से नाता न तोड़ा। आखिर इस सल्तनत के समस्त प्रांत, तमाम विभाग, हरकारे और कारिन्दे क्यों इस प्रकार कानून और नियम का पालन किए चले जा रहे है? क्यो उनमें लड़ार्इ नही होती? क्यो विद्रोह उत्पन्न नही होता? किस चीज की वजह से ये एक व्यवस्था मे बंधे हुए हैं? इसका उत्तर अपने दिल से पूछिए। क्या वह गवाही देता कि एक ही र्इश्वर इस सारे विश्व का प्रभु और शासक है, एक ही का आदेश सब पर चल रहा है, एक ही है जिसकी महान शक्ति ने सबको अपने नियम और जाब्ते में बांध रखा है? यदि दस-बीस नही, दो खुदा भी इस विश्व के मालिक होते तो यह व्यवस्था इस नियमित रूप से कभी न चल सकती। एक मामूली से स्कूल का प्रबन्ध तो दो हेडमास्टरी सहन नही कर सकता, फिर भला इतनी बड़ी जमीन और आकाश की सल्तनत दो प्रभुओ की प्रभुता में कैसे चल सकती थी?

अत: केवल इतना ही सत्य नही हैं कि यह विश्व किसी बनानेवाले के बिना नही बना है, बल्कि यह भी सत्य है कि इसको एक ही ने बनाया है, सत्य केवल इतना ही नही है कि इस विश्व का प्रबन्ध बिना किसी शासक के नही हो रहा है, बल्कि यह भी सत्य है कि वह शासक एक ही है। प्रबन्ध की सुव्यवस्था साफ कह रही है कि यहां एक के सिवा किसी के हाथ मे राज्य के अधिकार नही हैं। व्यवस्था की नियमितता मुॅह से बोल रही हैं कि इस राज्य मे एक हाकिम के सिवा किसी का हुक्म नही चलता। कानून की मजबूती गवाही दे रही है कि एक बादशाह का राज्य धरती से आकाश तक कायम है। चॉद सूरज और अन्य ग्रह उसी की शक्ति के अधीन है, जमीन अपनी तमाम चीजों के साथ उसी का आज्ञापालन कर रही हैं, हवा उसी की गुलाम है, पानी उसी का दास है, नदी और पहाड़ उसी के अधीनस्थ है, पेड़ और जीव-जन्तु उसी की आज्ञा का पालन कर रहे हैं, मनुष्य का जीना और मरना उसी के अधिकार मे हैं। उसकी मजबूत पकड़ ने सबको पूरी ताकत के साथ जकड़ रखा हैं और किसी मे इतना बल नही कि उसके राज्य मे अपना हुक्म चला सके। वास्तव मे इस सम्पूर्ण व्यवस्था में एक से अधिक हाकिमों के लिए गुंजाइश ही नही हैं। व्यवस्था की प्रकृति यह चाहती हैं कि आज्ञा लागू करने मे कण-मात्र भी कोर्इ उसका भागीदार न हो, अकेले वही हुक्म देनेवाला हो और उसके सिवा सब आश्रित हो। क्योकि किसी दूसरे के हाथ मे हुक्म देने या राज-कार्य का मामूली-सा अधिकार देने का मतलब ही यह होता है कि अव्यवस्था और फसाद पैदा हो । हुक्म चलाने के लिए केवल ताकत ही जरूरी नही हैं, ज्ञान भी जरूरी हैं इतनी व्यापक दृष्टि की जरूरत हैं जो समस्त विश्व को एक ही समय मे देख सके और उसके रहस्यों को समझकर आदेश जारी कर सके। अगर जगत-स्वामी के सिवा कुछ छोटे-छोटे खुदा ऐसे होते जो संपूर्ण विश्व को निरखनेवाली नजर तो न रखते किन्तु उन्हे संसार के किसी हिस्से या किसी मामले मे अपना हुक्म चलाने का अधिकार प्राप्त होता, तो यह धरती और आकाश का सारा कारखाना छिन्न-भिन्न होकर रह जाता। एक मामूली मशीन के बारे मे ंभी आप जानते हैं कि यदि किसी ऐसे व्यक्ति को उसमें हस्तक्षेप का अधिकार दे दिया जाए, जो उससे भली-भॉति परिचित न हो तो वह उसे बिगाड़कर रख देगा। इस लिए अक्ल यह फैसला करती हैं, और धरती और आकाश की सल्तनत की व्यवस्था अत्यंत नियमित रूप से चलना इस बात की गवाही देता है कि इस सल्तनत के राज-अधिकार मे एक र्इश्वर के सिवा और किसी का कण-मात्र भी हिस्सा नही हैं।
यह केवल एक वास्तविकता ही नही है, बल्कि सत्य यह हैं कि र्इश्वर के ऐश्वर्य में उसके अलावा किसी और का हुक्म चलने की कोर्इ वजह भी नही। जिनको उसने अपनी शक्ति के हाथ से बनाया हैं, जो उसकी रचना हैं, जिनका अस्तित्व उसकी दया से कायम हैं, जो इससे बेपरवाह होकर स्वयं अपने बलबूते पर एक क्षण के लिए भी मौजूद नही रह सकते, उनमें से किसी की यह हैसियत कब हो सकती है कि खुदार्इ में उसका हिस्सेदार बन जाए? क्या किसी नौकर को आपने मिल्कियत मे मालिक का साझीदार होते देखा हैं? क्या आपकी अक्ल मे यह बात आती हैं कि कोर्इ मालिक अपने गुलाम को अपना साझी बनाएगा? क्या खुद आप मे से कोर्इ व्यक्ति अपने नौकरी मे से किसी को अपनी जायदाद मे या अपने अधिकारों मे हिस्सेदार बनाता है? इस बात पर जब आप विचार करेंगे तो आपका दिल गवाही देगा कि खुदा के इस राज्य मे किसी बन्दे को आजाद रूप मे खुदमुख्तारी का कोर्इ अधिकार प्राप्त ही नही हैं। ऐसा होना न केवल वास्तविकता के विरूद्ध हैं, न केवल अक्ल और प्रकृति के विरूद्ध हैं, बल्कि सत्य के विरूद्ध भी हैं।

जुल्म की वजह 
            भाइयों! यहॉ केवल अधिकार ही का प्रश्न नही हैं। यह प्रश्न भी है कि र्इश्वर के इस ऐश्वर्य में क्या कोर्इ मनुष्य बादशाही करने या कानून बनाने या हुक्म चलाने के योग्य हो सकता हैं? जैसा कि अभी कह चुका हू कि एक मामूली मशीन के बारे मे भी आप यह जानते है कि यदि कोर्इ अनाड़ी आदमी जो उसकी मशीनरी का जानकार न हो, उसे चलाएगा तो उसे बिगाड़ देगा। जरा किसी अनाड़ी मनुष्य से एक मोटर ही चलवाकर देख लीजिए। अभी आपको मालूम हो जाएगा
कि इस बेवकूफी का क्या अंजाम होता है। अब स्वंय सोचिए कि लोहे की एक मशीन का हाल जब यह है कि सही जानकारी के बिना  उसका इस्तेमाल नही किया जा सकता, तो मनुष्य जिसकी मनोवृत्तियॉ अत्यंत उलझी हुर्इ हैं, जिसके जीवन के मामले बेशुमार पहलू रखते हैं और हर पहलू मे लाखों गुत्थियों है, उसकी उलझी हुर्इ मशीनरी को वे लोग क्या चला सकते हैं जो दूसरे को जानना और समझना तो एक तरफ, स्वंय अपने आपको भी अच्छी तरह नही जानते-नही समझते? ऐसे अनाड़ी जब विधान-निर्माता और कानूनसाज बन बैठेंगे और ऐसे नादान जब मनुष्य के जीवन की ड्राइवरी करने पर तैयार होगे, तो क्या इसका अंजाम किसी अनाड़ी आदमी के मोटर चलाने के अंजाम से कुछ भी भिन्न हो सकता हैं? यही वजह हैं कि जहॉ र्इश्वर के बजाए मनुष्यों का बनाया हुआ कानून माना जा रहा हैं और जहॉ र्इश्वर के आज्ञापालन से बेपरवाह होकर मनुष्य हुक्म और आदेश दे रहे हैं और मनुष्य उनका आज्ञापालन कर रहे हैं, वहां किसी जगह भी शांति नही हैं, किसी जगह भी आदमी को सुख प्राप्त नही हैं, किसी भी जगह इन्सानी जिन्दगी की कल सीधी नही चलती । रक्तपात और हत्याएं हो रही हैं, अत्याचार और अन्याय हो रहा है। लूटखसोट का बाजार गर्म हैं। आदमी का खून आदमी चूस रहा हैं। अख्लाकी और सदाचार तबाह हो रहे हैं, सेहत और तन्दुरूस्ती नष्ट हो रही है, सारी शक्तिया जो र्इश्वर ने मनुष्य को दी थी, मनुष्य के बजाए इसके बिनाश और बरबादी मे खर्च हो रही हैं। यह स्थायी नरक जो इसी संसार में मनुष्य ने अपने लिए स्यवं अपने हाथो बना लिया है, उसका कारण इसके सिवा और कुछ नही हैं कि उसने बच्चो के समान उल्लास में आकर इस मशीन को चलाने की कोशिश की, जिसके कल-पुर्जो से वह परिचित ही नही। इस मशीन को जिसने बनाया हैं, वही इसके रहस्यों को जानता हैं, वही इसकी प्रकृति से परिचित है, उसी को भली-भॉति मालूम हैं कि यह किस प्रकार ठीक चल सकती हैं। यदि मनुष्य अपनी बेवकूफी छोड़ दे और अपनी अज्ञानता स्वीकार करके उस नियम का पालन करने लगे जो स्वंय इस मशीन के बनानेवाले ने निश्चित किया हैं, तब तो जो कुछ बिगड़ा हैं वह फिर बन सकता हैं, नही तो इन संकटों को कोर्इ हल सम्भव नही हैं।

Author Name: सैयद अबुल आला मौदूदी (रहo)