हज़रत मुहम्मद (सल्लo) की नुबूवत के प्रमाण

थोड़ी देर के लिए शारीरिक ऑखें बन्द करके कल्पना की ऑखें खोल लीजिए और एक हजा़र चार सौं वर्ष पीछे के संसार को देखिए, यह कैसा संसार था? मनुष्य और मनुष्य के बीच विचार-विनिमय के साधन कितनें कम थें। देशों और जातियों के बीच सम्बन्ध के साधन कितने सीमित थें, मनुष्य की जानकारी कितनी कम थी, उसके विचार कितने संकीर्ण थे, उस पर भ्रम और असभ्यता कितनी छार्इ थी, अज्ञान के अंधेरे में ज्ञान का प्रकाश कितना धुधला था और अंधेरे को ढकेल-ढकेलकर कितनी कठिनाइयों के साथ फैल रहा था। संसार में न तार था, न टेलीफोन था, न रेडियों था और न टेलीविजन, न रेल और वायुयान थे, न प्रेस थें और न प्रकाशनगृह, न स्कूल, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की अधिकता थी, न समाचार-पत्र और पत्रिकाए प्रकाशित होती थी न पुस्तकें अधिक लिखी जाती थीं, न अधिक उनका प्रकाशन होता था। उस समय के एक विद्वान व्यक्ति की जानकारी भी कुछ पहलुओं से आधुनिक युग के एक साधारण व्यक्ति की अपेक्षा कम थी। उस समय की ऊॅची सोसायटी के व्यक्ति मे भी आधुनिक युग के एक मजदूर की अपेक्षा शिष्टता कम थी। उस समय का एक उदार विचार रखने वाला व्यक्ति भी आज के संकीर्ण चिचार वाले व्यक्ति से भी अधिक संकीर्ण विचार रखता था जो बाते आज हर एक को मालूम है उस समय वर्षो के परिश्रम, खोज और छान-बीन के पश्चात भी कठिनता से मालूम हो सकती थी। जो जानकारियॉ आज प्रकाश की तरह वातावरण में फैली हुर्इ हैं। और बच्चे को होश संभालतें ही प्राप्त हो जाती हैं, उनके लिए उस समय सैकड़ों मील के यात्राए की जाती थीं और जीवन उनकी खोज मे समाप्त हो जाते थें। जिन बातों को आज अंधविश्वास (superstition) और गप समझा जाता हैं वे उस समय की ‘‘सच्चाइयॉ’’ (Unquestionable truths) थीं। जिन कार्यो को आज अशिष्ट और बर्बरतापूर्ण कहा जाता है वे उस समय के दिन-प्रतिदिन के काम थें। जिन रीतियों से आज इन्सान का दिल नफ़रत करता हैं वे उस समय की नैतिकता में केवल उचित ही नही समझी जाती थीं बल्कि कोर्इ व्यक्ति यह सोच भी नही सकता था कि उनके विरूद्ध भी कोर्इ तरीका हो सकता हैं। मनुष्य की विलक्षण प्रियता इतनी बढ़ी हुर्इ थी कि वह किसी चीज में उस समय तक कोर्इ सच्चार्इ, कोर्इ महानता, कोर्इ पवित्रता मान ही नही सकता था जब तक कि वह अप्राकृतिक और अलौकिक न हो, अस्वाभाविक न हों, असाधारण न हों, यहॉ तक कि मनुष्य स्वयं अपने-आपकों इतना ही हीन समझता था कि किसी मनुष्य का र्इश्वर तक पहुचा हुआ होना और र्इश्वर तक किसी पहुचे हुए व्यक्ति का मनुष्य होना उसकी कल्पना से बाहर की चीज़ थी।

नुबूवत की समाप्ति

अब आपको जानना चाहिए कि इस समय इस्लाम का सीधा-सच्चा मार्ग मालूम करने का कोर्इ साधन हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) की शिक्षा और कुरआन मजीद के सिवा नही हैं। मुहम्मद (सल्ल0) समस्त मानव-जाति के लिए र्इश्वर की ओर से भेजे गए पैग़म्बर हैं। उन पर पैग़म्बरी का सिलसिला समाप्त कर दिया गया। र्इश्वर मनुष्य के मार्गदर्शन का जितना इन्तिजाम करना चाहता था वह उसने अपने अन्तिम पैग़म्बर के ज़रिए कर दिया। अब जो व्यक्ति सत्य का इच्छुक हो और र्इश्वर का मुस्लिम (आज्ञाकारी) बन्दा बनना चाहता हो, उसके लिए आवश्यक हैं कि र्इश्वर के इस आख़िरी पैग़म्बर पर र्इमान लाए। जो कुछ शिक्षा उन्होने दी हैं उसको माने और जो तरीक़ा उन्होने बताया हैं उसपर चलें।



नुबूवत की समाप्ति के प्रमाण

पैग़म्बरी की सत्यता हमने आपकों ऊपर बता दी हैं। उसको समझने और उसपर विचार करने से आपको स्वयं मालूम हो जाएगा कि पैग़म्बर प्रतिदिन पैदा नही होते, न यह आवश्यक हैं कि प्रत्येक जाति के लिए हर, समय एक पैग़म्बर हो। पैग़म्बर का जीवन वास्तव में उसकी शिक्षा और मार्गदर्शन  का जीवन हैं। जब तक उसकी शिक्षा और मार्गदर्शन जीवित हैं उस समय तक मानों वह स्वयं जिन्दा हैं। पिछले पैग़म्बर इस हैसियत से जीवित नही, क्योकि जो शिक्षा उन्होने दी थी दुनिया ने उसको बदल डाला। जो ग्रन्थ वे लाए थें उनमें से एक भी आज अपने वास्तविक रूप में मौजूद नहीं। स्वयं उसके माननेवाले भी यह दावा नही कर सकते कि हमारे पैग़म्बरों के दिए हुए मूल ग्रंथ मौजूद है। उन्होने अपने पैग़म्बरों के जीवन-चरित्र को को भी भुला दिया। पिछले पैग़म्बरों में से एक की भी सही और प्रमाणित जीवन-गाथा आज कही नही मिलती। यह भी विश्वासपूर्वक नही कहा जा सकता कि वे किस युग में पैदा हुए? क्या काम उन्होने किए? किस प्रकार जीवन बिताया? किन बातों की शिक्षा दी? और किन बातों से रोका? यही उनकी मौत हैं। इस हैसियत से वे जीवित नही, परन्तु मुहम्मद (सल्ल0) जीवित हैं, क्योकि उनकी शिक्षा और मार्गदर्शन जीवित हैं। जो कुरआन उन्होने दिया था वह अपने मूल शब्दों में मौजूद हैं। उसमें एक अक्षर, एक बिन्दु, एक मात्रा का भी अन्तर नही हुआ। उनकी जीवनचर्या, उनके वचन, उनके कार्य सब-के सब सुरक्षित हैं और तेरह सौ वर्ष से अधिक समय बीत जाने के पश्चात भी इतिहास में उनका चित्र ऐसा स्पष्ट दिखार्इ देता हैं कि मानों हम स्वयं आपको देख रहे हैं। संसार के किसी व्यक्ति का जीवन भी उतना सुरक्षित नही जितना पैग़म्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) का जीवन सुरक्षित हैं। हम अपने जीवन के हर मामले में हर समय आप (सल्ल0) के जीवन से शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं। यही इस बात का प्रमाण हैं कि आप (सल्ल0) के पश्चात् किसी दूसरे पैग़म्बर की आवश्यक नहीं।

एक पैग़म्बर के पश्चात  दूसरा पैग़म्बर आने के तीन कारण हो सकते हैं।

1-या तो पहले पैग़म्बर की शिक्षा और मार्गदर्शन मिट गया हो, और उसे फिर प्रस्तुत करने की जरूरतों हों।
2- या पहले पैग़म्बर की शिक्षा पूरी न हो, और उसमें संशोधन या कुछ बढ़ाने की आवश्यकता हो।
3-या पहले पैग़म्बर की शिक्षा एक विशेष जाति तक सीमित हो, और दूसरी जाति या जातियों के लिए दूसरे पैग़म्बर की आवश्यकता हों। ये तीनों कारण अब शेष नही रहें।

1-हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) की शिक्षा और मार्गदर्शन जीवित है। और वे साधन पूर्णतया सुरक्षित हंप जिनसे हर समय यह मालूम किया जा सकता हैं कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद(सल्ल0)  का दीन (धर्म) क्या था? कौन-सा मार्गदर्शन और आदेश लेकर आप आए थे? जीवन के किस तरीके़ को आपने प्रचलित किया? और किन तरीकों को आपने मिटाने और बन्द करने की कोशिश की? अत: जब आप (सल्ल0)  की शिक्षा और मार्गदर्शन मिटा ही नही, तो उसको नए सिरे से पेश करने के लिए किसी नबी के आने की आवश्यकता नही।

2- हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) के द्वारा संसार को इस्लाम की पूर्ण शिक्षा दी जा चुकी हैं। अब न इसमें कुछ घटाने की आवश्यकता है और न कोर्इ ऐसी कमी बाकी रह गर्इ हैं जिसको पूरा करने के लिए किसी नबी के आने की जरूरत हो। अत: दूसरा कारण भी दूर हो गया।

3- हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) किसी विशेष जाति के लिए नही बल्कि समूचे संसार के लिए नबी (पैग़म्बर) बनाकर भेजे गए हैं और सारे मनुष्यों के लिए आप (सल्ल0) की शिक्षा पर्याप्त हैं। अत: अब किसी विशेष जाति के लिए अलग किसी नबी के आने की आवश्यकता नही हैं। इस प्रकार तीसरा कारण भी दूर हो गया।
इसी लिए हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) को ‘‘ख़ातमुन्नबीयीन’’ (नबियों के समापक) कहा गया हैं, अर्थात नुबूवत के सिलसिलें को समाप्त कर देनेवाला। अब संसार को किसी दूसरे नबी की जरूरत नही हैं, बल्कि केवल ऐसे लोगो की आवश्यकता हैं जो हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) के तरीके पर स्वयं चलें और दूसरों को चलाएॅ। आपकी शिक्षाओं को समझे और उन्हे व्यवहार में लाएॅ और संसार में उस का़नून और सिद्धांत का राज्य स्थापित करें जिसे लेकर आप आए थें।

Author Name: इस्लाम धर्म: सैयद अबुल आला मौदूदी (रह0)