महात्मा गाँधी

महात्मा गाँधी

इस्लाम, जो हजरत मुहम्मद द्वारा पेश किया गया,पिछले तमाम उद्घाटित धर्मो का अविच्छिन्न तत्व और उन सबका उत्कर्ष बिन्दु हैं, इसलिए इसे हर युग के लोगो के लिए सर्वथा उचित धर्म समझा जा सकता हैं। इस्लाम के इस महत्व की पुष्टि के लिए कुछ तथ्य नीचे दिए जा रहे हैं।

एक यह कि अब कोई आसमानी किताब ऐसी नही हैं जो अपने मूलरूप में मौजूद हो । दूसरे यह कि अब कोई धर्म ऐसा नही हैं, जिसका यह दावा हो कि हर दौर के इन्सानों की जिन्दगी के हर मामले में रहनुमाई करेगा।

इसके मुकाबले में इस्लाम तमाम इन्सानों की पूरी जिन्दगी में बुनियादी रहनुमाई का दावा रखता हैं। यह चौदह सौ वर्ष से तमाम चुनौतियों का मुकाबला करता चला आ रहा हैं, इसमें एक आदर्श समाज की स्थापना की तमाम क्षमतायें मौजूद हैं, जैसा कि यह अन्तिम पैगम्बरे इस्लाम हजरत मुहम्मद के नेतृत्व में स्थापित कर भी चुका हैं।

’’इस्लाम अपने अत्यन्त विस्तार-काल में भी अनुद्वार नही था, बल्कि सारा संसार उसकी प्रशंसा कर रहा था। उस समय जबकि पश्चिमी दुनिया अंधकारमय थी, पूर्व क्षितिज में एक उज्जवल सितारा चमका, जिससे विकल संसार को प्रकाश और ‘शान्ति प्राप्त हुई । इस्लाम झूठा मजहब नही हैं, हिन्दुओं को भी इसका उसी तरह अध्ययन करना चाहिए जिस तरह मैंने किया हैं। फिर वे भी मेरे ही समान इससे प्रेम करने लगेंगे ।‘‘

’’मुझसे किसी ने कहा था कि दक्षिणि अफ्रीका में जो यूरोपियन आबाद हैं, वे इस्लाम के प्रचार से कांप रहे हैं, उसी इस्लाम से जिसने मोरक्कों में रोशनी फैलाई और संसारवासियों को भाई-भाई बन जाने का सुख-संवाद सुनाया। ऐसा हो सकता हैं ? वे डरते होंगे तो इस बात से कि अगर अफ्रीका के आदिवासियों ने इस्लाम कबूल कर लिया तो वे गोरो से बराबर का अधिकार मागने लगेंगे। आप उनको डरने दीजिए। अगर कोई भाई-भाई बनना पाप हैं, अगर वे इस बात से परेशान हैं कि उनका वान्शिक बड़प्पन कायम न रह सकेगा तो उनका डरना उचित हैं, क्योकि मैंने देखा हैं कि जो लोग ईसाई हो जाते हैं तो वह सफेद रंग के ईसाइयों के बराबर नही हो पाते, किन्तु जैसे ही वह इस्लाम ग्रहण करता हैं, बिल्कुल उसी वक्त वह उसी प्याले में पानी पीता हैं और उसी प्लेट में खाना खाता हैं, जिसमें कोई और मुसलमान पानी पीता और खाना खाता हैं सही हैं।