रोज़ा

रोज़ा

ईस्लाम क चौथा स्तम्भ 'रोजा' है। इस्लमी कैलेन्डर के नवे मास रमाजान में हर बालिग, होशमंद, स्वस्थ, मुसलमान मर्द और औरत पर महीने भर लगातार रोजा रखना अनिवार्य किया गया है इसका मूल उदेद्श ईश्वर कि अवज्ञा और पापों से बचना बताया गया (कुरन्:२:१८३) यह एक महीने का प्रशिक्षण-कोर्से है अल्लाह कि नाफ़रमानी (झूट, बदी, पाप, दुष्कर्म, अत्याचार, उद्दन्ड, व्यभिचार, अन्याय, आदि) से बचने का और अल्लाह और उसके रसूल के आज्ञा पालन, नेकी, मानव सेवा, सुकर्म, ईशोपसना ईशोपसना करने का|


इस के अनुसार इस्लामी कैलेण्डर के नवें महीने में सभी सक्षम मुसलमानों के लिये सूर्योदय से सूर्यास्त तक वृत रख्नना अनिवार्य है। इस वृत को रोज़ा भी कहते हैं। रोज़े में हर प्रकार का खाना-पीना वर्जित है। अन्य व्यर्थ कर्मों से भी अपने आप को दूर रखा जाता है। यौनिक गतिविधियाँ भी वर्जित हैं। मजबूरी में रोज़ा रखना ज़रूरी नहीं होता। रोज़ा रखने के कई उद्देश्य हैं जिन में से दो प्रमुख उद्देश्य यह हैं कि दुनिया की बाक़ी आकर्षणों से ध्यान हटा कर ईश्वर से नज़दीकी महसूस की जाए और दूसरा यह कि ग़रीबों, फ़कीरों और भूखों की समस्याओं और मुश्किलों का एहसास हो।