जबरदस्ती ज़िज़्या वसूल करना

जिहाद ही तरह जिज़्या को लेकर भी इस्लाम के विरूद्ध बड़ा दुष्प्रचार किया गया हैं और यह गलतफहमी उत्पन्न कर दी गर्इ हैं कि जिज्या का उद्देश्य भी कर-भारद्वारा गैर मुस्लिम को इस्लाम ग्रहण करने पर बाध्य करना हैं। हर प्रकार के इस्लाम-विरोधी प्रचार का स्रोत तो र्इसार्इ सम्प्रदाय हैं, परन्तु अंगे्रजो के शिष्या उनके चबाए ग्रास को चबानेवाले हमारे देश के विद्धानों ने भी जिहाद और जिज्या के प्रति बड़ा द्वेषपूर्ण प्रचार किया हैं। उन्ही विद्वानों में अंगे्रजी सरकार के सेवक तथा सम्मानित मुगल इतिहास के प्रसिद्ध इतिहासकार ‘सर यदुनाथ सरकार’ भी थे। उनकी एक हिन्दी पुस्तक ‘औंरगजेब’ हैं। यद्यपि वह हिन्दी नहीं जानते थें, परन्तु उन्ही की इच्छा के अनुसार उनके एक शिष्य ने उनकी अंगे्रजी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद कराके उनकी स्वीकृति के बाद उन्ही के नाम से प्रकाशित करार्इ हैं। किसी धर्म के विषय में प्रमाण उसी धर्म की पुस्तके हो सकती, है, विरोधियों, की लिखी हुर्इ पुस्तकें नही हो सकती, चाहे वह कितने बड़े विद्वान थे। उदाहरणत: वेद-शास्त्र सम्बन्धी पुस्तके काशी, अयोध्या, मथुरा आदि के पंडितों ही की प्रमाण होंगी, न कि इंग्लैण्ड के विद्वानों की। यदुनाथ सरकार ने उक्त पुस्तक में इस्लाम के विषय में जो कुछ लिखा हैं उसका आधार इस्लामी पुस्तके नही हैं, इस्लाम के शत्रु अंग्रेजी की ‘हयूज’ और ‘इनसाइक्लोपीडिया आफ इस्लाम ‘ आदि हैं, जिनका उद्देश्य इस्लाम के विरूद्ध भ्रम, घृणा, तथा द्वेष उत्पन्न करना था। इसलिए आवश्यकता हैं कि संक्षेप मे जिज्या की वास्तविकता भी गैर मुस्लिम भाइयों के सामने पेश कर दी जाए।
पहले हम यह बता दे कि जिज्या गैर मुस्लिमों ही पर क्यों हैं?

1-मुसलमानों पर एक धार्मिक अनिवार्य ‘कर’ लागू होता है, जिसको ‘जकात’ कहते हैं। इसकी दर ढार्इ प्रतिशत सालाना हैं, जो बचते के धन पर देना पड़ता हैं। यदि कोर्इ अरबपति हो तो उसको भी ढार्इ प्रतिशत के हिसाब से प्रति वर्ष जकात देनी पड़ती हैं और यदि देश पर कोर्इ संकट आ जाए तो इस्लामी शासन मुसलमानों से उनकी आर्थिक अवस्था के अनुसार विशेष धन भी प्राप्त कर सकता हैं। परन्तु गैर मुस्लिम प्रजा से जिज्या के अतिरिक्त एक पैसा नही ले सकता।

2. गैर मुस्लिम प्रजा देश की सुरक्षा के दायित्व से मुक्त होती हैं इसलिए सैनिक खर्च के लिए उससे हल्का-सा देश-सुरक्षा कर लिया जाता हैं, वही जिज्या कहलाता हैं। आवश्यकता पढ़ने पर जो गैर मुस्लिम प्रसन्नतापूर्वक सैनिक सेवा में भाग लेते हैं उनसे जिज्या नही लिया जाता। यदुनाथ सरकार ने इस विषय में जो कुछ लिखा हैं वह मिथ्या हैं।

3.इस्लामी राज्य की सब गैर मुस्लिम प्रजा पर जिज्या अनिवार्य नही हैं। इस्लामी राज्य की गैर मुस्लिम प्रजा तीन प्रकार की होती हैं। एक वे गैर मुस्लिम जिन्होने किसी प्रकार की संधि के द्वारा इस्लामी राज्य की अधीनता स्वीकार कर ली हो। उनके साथ इस्लामी शासन संधि की शर्तो के अनुसार व्यवहार करता हैं। यदि संधि मे जिज्या की शर्त न हो तो इस्लामी शासन को उनपर कदापि जिज्या लगाने का अधिकार नही है। दूसरी किस्म उन गैर मुस्लिमों की हैं, जिन्होने इस्लामी राज्य से युद्ध किया हो और युद्ध करते हुए पराजित हो गए हो तथा इस्लामी सेना ने उनके नगर और दुर्ग पर अधिकार प्राप्त कर लिया हो। केवल यही गैर मुस्लिम हैं, जिनके लिए नियम हैं कि वे इस्लाम स्वीकार कर ले तो उनके सब अधिकार इस्लामी समाज के बराबर हो जाते हैं और अपने धर्म पर रहना चाहें तो ‘सुरक्षाकर’ के रूप में उनपर जिज्या लगाया जाता हैं। तीसरे वे गैर मुस्लिम हैं, जो उन दोनो प्रकार के अतिरिक्त किसी और प्रकार से इस्लामी राज्य के नागरिक बन गए हों। उदाहरण स्वरूप पाकिस्तान के गैर मुस्लिम, उन पर किसी प्रकार से भी जिज्या नही लगाया जा सकता। क्योकि वे न युद्ध मे पराजित हुए हैं और न जिज्या स्वीकार करके पाकिस्तान की प्रजा बने हैं। वह मूलत: पाकिस्तान के नागरिक हैं।

इस्लामी परिभाषा में तीनों प्रकार की गैर मुस्लिम जनता ‘जिम्मी’ कहलाती हैं। जिम्मी कोर्इ अपमानजनक शब्द नही हैं। इसका अर्थ हैं वे गैर मुस्लिम जिनके प्राण, धन, धर्म, सम्मान, सुख, शान्ति, सबकी सुरक्षा का इस्लामी शासन जिम्मेदार होता हैं। इतना ही नही व्यावहारिक रूप से गैर मुस्लिमो की हर प्रकार की सुरक्षा का दायित्व इस्लाम शासन पर होता है, परन्तु इस्लाम के अनुसार गैर मुस्लिमों की रक्षा के वास्तविक जिम्मेदार अल्लाह और रसूल होते हैं। र्इश्वर दूत हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया हैं-

    ‘खबरदार! जो कोर्इ किसी गैर मुस्लिम प्रजा पर अत्याचार करेगा या अधिकार में कमी करेगा अथवा उसपर उसकी शक्ति से अधिक किसी प्रकार का भार डालेगा या उसकी प्रसन्नता के बिना उसकी कोर्इ वस्तु लोग तो कियामत के दिन उसके विरूद्ध उस गैर मुस्लिम प्रजा की ओर से खुदा के सम्मुख मैं वादी बनूंगा।’’


गै़र मुस्लिम भार्इ गम्भीरतापूर्वक महार्इश-दूत हजरत मुहम्मद (सल्ल0) की इस चेतावनी पर विचार करें जो उन्होने मुसलमानों को दी हैं। सुरक्षा की ऐसी गारन्टी तो हम भारतीय जनता को भी प्राप्त नही हैं। साम्प्रदायिक दंगों में मुसलमानों के साथ क्या होता हैं?

4.    जिज्या की दर इस प्रकार हैं-धनवान से धनवान पर चाहे वह लखपति और अरबपति ही क्यों न हो प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 12 रू0, मध्यम वर्ग पर 6 रू0, व्यापारी और नौकरी पेशा वर्ग पर 3रू0 सालाना। जिज्या के प्रति मूल सिद्धान्त यह है कि इतने ही धन के अनुसार जिज्या लिया जाए जो आवश्यकता से अधिक हो। यदि किसी गैर मुस्लिम प्रजा की आय कम हो जाए तो उससे तीन रूपया से भी कम लिया जाएगा, परन्तु आय बढ़ जाने पर जिज्या बढ़ाया नही जा सकता।

5.जिन पर जिज्या लागू होता हैं, उनमें भी स्त्रियां, बालक, पागल, अन्धे, अपाहिज, मन्दिरों और पूजागृहो के सेवक, साधु-समाज, गृहस्थ, जीवन से अलग होकर गुफाओं और मठो में रहने वाले लोग जिज्या से मुक्त होते हैं।

6.    जिज्या देने के लिए अधिकारियों के पास जाने का नियम नही हैं। अधिकारियों को स्वंय वसूली के लिए जाना पड़ता हैं। इनको आदेश हैं कि जिज्या की वसूली में नम्रता से काम लें। कठोरता का व्यवहार न करें। उनके वस्त्र इत्यादि आवश्यकता की वस्तुऐं नीलाम न करें।

7.    धनहीनों और भिक्षा मांगनेवाले गैर मुस्लिमों का सरकारी कोष में भी अधिकार हैं।

यदुनाथ सरकार की ‘औरंगजेब’ पुस्तक में इन नियमों की कोर्इ चर्चा नही है। यदि जिज्या गैर मुस्लिमों को अपमानित करने के लिए होता तो मन्दिरों के पुजारी, साधु, सन्याशी, मठो और गुफाओं में रहने वाले तथा स्त्रियां, बच्चे, बूढ़े और धनहीन जिज्या से मुक्त न होते।

यह बात तो हम इसी पुस्तिका में उपर लिख चुके हैं कि इस्लामी राज्य में गैर मुस्मि प्रजा को प्राण, धन, धर्म, सम्मान सबकी पूरी सुरक्षा प्राप्त होती हैं। यहां हम इतना और बता दें कि इस्लामी विधान मनुष्यों के बनाए हुए विधान के अनुसार नही होता, र्इश्वरीय ग्रन्थ कुरआन और महार्इशदूत हजरत मुहम्मद (सल्ल0) के आदेशों पर आधारित होता हैं। अत: उसकी अवहेलना उसी प्रकार पाप हैं जिस प्रकार दूसरी र्इश्वरीय आज्ञाओं तथा महार्इशदूत के आदेशों की अवज्ञा पाप है।

वास्तविकता के विरूद्ध कितना ही प्रचार किया जाए वह अपनी वास्तविकता मनवाकर ही रहती है। पश्चिम के विद्वानों ही में ऐसे विद्वान भी हुए जिन्होने दुराग्रह के दुष्प्रचारों का खण्डन किया। सर यदुनाथ सरकार जैसे विद्वानों को अंग्रेजों की राजनीति के अनुसार इस्लाम और मुसलमानों के विरूद्ध दुष्प्रचार करना था, वे ऐसे विद्वानों की पुस्तकों का अध्ययन क्यों करते जिन्होने दुष्प्रचार का खण्डन किया हैं? मान्य पाठक देखें-

Author Name: इस्लाम में बलात्धर्म परिवर्तन नहीं, जिहाद और ज़िज्या की वास्तविकता: अबू मुहम्मद इमामुद्दीन-रा