जीने का अधिकार ‘‘ इन्सान’’ को सिर्फ इस्लाम ने दिया है

जीने का अधिकार ‘‘ इन्सान’’ को सिर्फ इस्लाम ने दिया है

अब आप देखिए कि जो लोग मानव-अधिकारों का नाम लेते हैं, उन्होने अगर अपने संविधानों में या ऐलानो ंमें कहीं मानव-अधिकारों का जिक्र किया हैं तो हकीकत में इस में यह बात छिपी (Implied) होती है कि यह हक या तो उनके अपने नागरिकों के हैं, या फिर वह उनको सफे़द नस्ल वालों के लिए खास समझते हैं। जिस तरह आस्ट्रेलिया में इन्सानों का शिकार करके सफेद नस्ल वालों के लिए पुराने बाशिन्दों से जमीन खाली करार्इ गर्इ और अमेरिका में वहॉ के पुराने बाशिन्दों की नस्लकुशी की गर्इ और जो लोग बच गये उन को खास इलाकों (Reservations) में कैद कर दिया गया और अफ्रीका के विभिन्न इलाको में घुस कर इन्सानों को जानवरों की तरह हलाक किया गया, यह सारी चीजे इस बात को साबित करती हैं कि इन्सानी जान का ‘‘ इन्सान’’ होने की हैसियत से कोर्इ आदर उन के दिल में नही हैं। अगर कोर्इ आदर हैं तो अपनी कौम या अपने रंग या अपनी नस्ल की बुनियाद पर हैं। लेकिन इस्लाम तमाम इन्सानों के लिए इस हक को तस्लीम करता हैं। अगर कोर्इ आदमी जंगली कबीलों से संबंध रखता हैं तो उसको भी इस्लाम इन्सान ही समझता हैं।

3.जान की हिफाजत का हक़

कुरआन की जो आयत मैने अभी पेश की है उसके फौरन बाद यह फरमाया गया हैं कि ‘‘ और जिसने किसी नफ़स को बचाया उसने मानों तमाम इन्सानों को जिन्दगी बख्शी ।’’(5:32) आदमी को मौत से बचाने की बेशुमार शक्ले हैं। एक आदमी बीमार या जख्मी हैं, यह देखे बगैर कि वह किस नस्ल, किस कौम या किस रंग का हैं, अगर वह आप को बीमारी की हालत में या जख्मी होने की हालत में मिला है तो आपका काम यह हैं कि उसकी बीमारी या उसके जख्म के इलाज की फिक्र करें। अगर वह भूख से मर रहा हैं तो आप का काम यह हैं कि उसको खिलायें ताकि उसकी जान बच जाये। अगर वह डूब रहा हैं या और किसी तरह से उसकी जान खतरे में हैं तो आप का फर्ज हैं कि उसको बचाएं। आपको यह सुनकर हैरत होगी कि यहूदियों की मजहबी किताब ‘‘ तलमूद’’ मे हुबहू इस आयत का मजमून मौजूद हैं, मगर उसके शब्द ये हैं कि ‘‘ जिस ने इस्राइल की एक जान को हलाक किया, अलकिताब (Scripture) की निगाह में उसने मानो सारी दुनिया का हलाक कर दिया और जिसने इस्राइल की एक जान को बचाया अलकिताब  के नजदीक उसने मानों सारी दुनिया की हिफाजत की।’’-तलमूद में यह भी साफ लिखा हैं,
अगर कोर्इ गैर इस्राइली डूब रहा हो और तुमने उसे बचाने की कोशिश की तो गुनहगार होगे। नस्ल परस्ती का करिश्मा देखिये । हम हर इन्सान की जान बचाने को अपना फर्ज समझते हैं, क्योकि कुरआन ने ऐसा ही हुक्म दिया हैं। लेकिन वह अगर बचाना जरूरी समझते हैं तो सिर्फ बनी इस्राइल की जान को, बाकी रहे दूसरे इन्सान, तो यहूदी-दीन मे वह इन्सान समझे ही नही जाते उनके यहॉ ‘गोयम’ जिसके लिए अंगे्रजी में  (Gentile) और अरबी में उम्मी का लफ़ज इस्तेमाल किया जाता हैं, यह हैं कि उनके कोर्इ इन्सानी अधिकार नही है। इन्सानी हुकूक सिर्फ बनी इस्राइल के लिए खास हैं। कुरआन में भी इस का जिक्र आया हैं कि यहूदी कहते है कि ‘‘ हमारे उपर उम्मियों के बारे में (यानी उनका माल मारखाने में) कोर्इ पकड़ नही हैं।’’ (3:75)

Author Name: इस्लाम में मानव अधिकार: सैयद अबुल आला मौदूदी (रह0)